नील स्वर्ग

नील स्वर्ग
प्रकृति हर रंग में खूबसूरत होती है , हरी, पीली , लाल या फिर नीली

Saturday, July 4, 2026

 

संयुक्त परिवार - एक कथा

 


पहले हमारे परिवार बहुत बड़े होते थे।  चाचा ताऊओं के परिवार इकट्ठा रहते थे।  सभी के बच्चे आपस में भाई बहन और दोस्त बन कर रहते थे।  ताऊ बन जाते थे बड़े पापा , और चाचा होते थे छोटे पापा।  पापा तो पापा थे ही।  दादा दादी पूरे परिवार के सिरमौर होते थे।  कोई बड़ा निर्णय उनकी अध्यक्षता के बिना नहीं लिया जाता था।  नयी दुकान खरीदना , घर का रंग रोगन , बड़े को इंजीनियरिंग के लिए दूसरे शहर भेजना , छोटे को गर्मी की छुट्टियों में स्कूल के ग्रुप टूर में भेजना , बिटिया के लिए सम्बन्ध ढूंढ़ना आदि निर्णय ऐसे ही लिए जाते थे।  कई बार कुछ निर्णय किसी के लिए अप्रिय भी होते , तो भी क्षण भर की प्रतिक्रिया के बाद सभी को सब कुछ मान्य हो जाता।  आज कहाँ गया वो संयुक्त परिवार ?

 

संयुक्त परिवार तभी तक संयुक्त रहता है , जब तक सबका दुःख और सबका सुख साझा होता है।  घर की सारी  दौलत साझी होती है।  जब कोई भी व्यक्ति अपना कुछ व्यक्तिगत बना लेता है , तो वहीं से दरार पड़नी शुरू हो जाती है।  स्वार्थ एक संक्रामक रोग की भांति घर में व्याप्त होता चला जाता है।  हर व्यक्ति अपने स्वार्थ को दूसरे  के उदाहरण से सही बताता है।  जब सबकी जमा पूंजी अपनी बनने लगती है , तब उसके बाद अगला नंबर आता है , संयुक्त जिम्मेवारियों का। हर व्यक्ति हर जिम्मेवारी को दूसरे पर डालने की कोशिश करता है।  ख़ास कर जहाँ कोई बड़ा खर्च आता है , तो सभी पल्ला झाड़ने लगते हैं।  फिर वही तर्क - हमारे समय में हमें कौन देने वाला है !

 

अगला विभाजन बच्चों में शुरू होता है।  मेरे बच्चे तो अच्छे अंग्रेजी स्कूल में पढ़ेंगे।  खर्चा हम खुद दे देंगे।  ताई जी घोषणा कर देती है , की उनका बिट्टू विदेश में पढ़ने जाना चाहता है।  अब कोई कैसे रोक सकता है ! पैसे का सवाल तो साझे खाते में खड़ा होता है।  बेटियों के विवाह में होने वाले खर्च बँट  जाते हैं। घर में १-२ की जगह ४-५ गाड़ियां आ जाती है।  ड्राइंग रूम के टेलीविजन की जगह सबके कमरों में अपना अपना टेलेविज़न आ जाता है।  रसोई भी एक नहीं रह पाती।  सबको अपनी अपनी पसंद के व्यंजन चाहिए।  चाची कहती है , मेरे बच्चे तो अंडा खाना चाहते हैं।  बस इस आधार पर उनका एक नया रसोई घर बन जाता है।  शुरू में इसे व्यक्तिगत पैंट्री कहा जाता है ; लेकिन धीरे धीरे वो व्यक्तिगत रसोई का रूप ले लेता है।  अब सबको चाहिए ऐसी व्यवस्था !

 

इस पूरे बिखराव का सबसे बड़ा शिकार होते हैं - घर के बुजुर्ग दादा दादी ! वो तो जीवन के संध्याकाल में परिवार के सौहार्द का आनंद ले रहे थे , लेकिन धीरे धीरे उनकी पैरों के नीचे से धरती कब खिसक जाती है , उन्हें पता ही नहीं चलता।  सबके भोजन अलग बन रहें हैं , ऐसे में  वो असहाय होकर प्रतीक्षा करते हैं अपने भोजन की।  जो बेटे शाम को दफ्तर से लौटकर उनके पास १-२ घंटे बिताते थे , वो अब थकान का बहाना बना कर सीधे अपने कमरे की तरफ बढ़ जाते हैं।  चाय उनके कमरे में ही चली जाती है।  कोई ये नहीं पूछता की घर के बुजुर्गों को क्या चाहिए।  बच्चे भी अब रामायण महाभारत की कहानियां सुनने नहीं आते।  दौड़ते दौड़ते कमरे में आते हैं और गुड मॉर्निंग , गुड नाईट बोलकर भाग जाते हैं। 

 

दादाजी को दिखाई कम देता है ; दादीजी को सुनाई कम देता है।  इसलिए उनके कमरे में टेलीविजन की क्या जरूरत !  लेकिन जो उनकी जरूरत है उसका क्या ? उनकी जरूरत है समय पर भोजन , दवायें , जरूरत के अनुसार डॉक्टर से मुलाकात , विशेष अवसरों पर मंदिर जाने का मन , और हाथ में थोड़े बहुत रुपये , जो वो बच्चों को जन्मदिन के उपहार के रूप में हाथ में पकड़ा देते। और सबसे बड़ी जरूरत होती हैं , उनके परिवार जनों का समय ; जो घटते घटते विलुप्त प्रायः हो जाता है।     जिन्होंने अपने जीवन के सारे साल , सारी  कमाई , सारा प्यार - अपने इस भरे पूरे परिवार पर लुटा दिया ,  वही अब खाली  हाथ , दुखी मन और बेबस निगाहों से अपनों की राह तकते हैं। 

 

और अंतिम कुठाराघात ! बेटों ने मिलकर निर्णय ले लिया , इस बड़े से घर को बेच कर तीन छोटे फ्लैट खरीद लेने चाहिए।  किसी ने उनसे सलाह नहीं ली।  उनसे उनकी मन की इच्छा नहीं पूछी। बस  फ़रमान जारी कर दिया।  उस रात ऐसा कार्यक्रम बना की पूरा परिवार एक साथ डाइनिंग टेबल पर दादा जी और दादीजी के साथ भोजन करेगा।  दादाजी की पसंद का भरवा करेला , और दादी की पसंद की पकोड़ियों वाली कढ़ी बनाई गयी। बच्चे भी प्यार से दादा दादी बोल कर उनकी गोद  में आ बैठे। 

 

भोजन के बाद मीठी खीर खाते  समय बड़े पापा ने पूरी बात बताई।  पहले तो सबके बढ़ते परिवार और बड़े होते बच्चों की समस्या बताई।  सबको अपना प्राइवेट स्पेस चाहिए - ये बताया।  फिर बताया की दूर दूर रहने से प्रेम ज्यादा बढ़ता है।  इन सारी  बातों पर गौर करके उन्होंने ये फैसला लिया है की इस घर को बेच कर आने वाली धन राशि के तीन भाग कर दिए जायें।  तीनों बेटे अपने अपने हिस्से के धन से अपना एक फ्लैट खरीद लें।  थोड़ा हिचक कर बड़े पापा बोले - इस व्यवस्था में आपका भी समुचित ध्यान रखा गया है।  आप जिस बेटे के साथ रहना चाहें , उस बेटे को बाकी दो भाई अपने हिस्से से थोड़ा धन दे देंगे , जिससे वो अपने फ्लैट में एक कमरा आपका भी रखें। 

 

खिसियानी सी मुस्कराहट के साथ बड़े ने कहा - क्यों ठीक है न पापा जी !

बाकी दोनों भाइयों ने हाँ में हाँ मिलाई - हाँ पापा , बहुत सूझ बूझ के साथ भैया ने ये रास्ता निकाला है। 

 

दादाजी ने खीर का प्याला पहले ही नीचे रख दिया था।  खड़े होकर बोले - दो दिन का समय दे दो।  सोच विचार कर बताऊँगा। 

तीनों भाइयों को दादाजी का ये उत्तर अच्छा नहीं लगा।  बहुओं के चेहरे से तो नाराजगी टपकने लगी थी।  बड़े भैया ने स्थिति संभाली - क्यों नहीं पिताजी , आपकी सम्पति है , आप पूरा सोच विचार कर लीजिये।  सबकी आपस में खुसुर पुसुर चल रही थी। 

 

दो दिनों बाद दादाजी ने तीनों बेटों और तीनों बहुओं को शाम के ५ बजे अपने कमरे में बुलाया।  बुलाकर कहा - मैंने तुम्हारी समस्याओं पर पूरा विचार किया।  सभी सही कहते हो। दुःख इस बात का है तुम लोगों ने हमारी समस्या पर कोई विचार नहीं किया।  तुम सब के साथ रहते हुए भी हम एक वृद्धाश्रम की तरह रह रहें हैं , तुम सब अलग अलग रहोगे , तो फिर कोई हमारी तरफ झाँक के भी नहीं देखेगा। 

 

बड़े  ने गंभीर आवाज में कहा - तो आपने क्या फैसला किया पापा जी। 

 

दादाजी बोले मेरा फैसला अभी आता ही होगा।  तभी दरवाजे की घंटी बजी।  दादाजी के परम मित्र अधिवक्ता ब्रिज मोहन पधारे। 

 

दादाजी बोले - बृजमोहन मेरा कागज लाये हों क्या ?

 

बृजमोहन ने हामी भरते हुए एक फाइल दादाजी को दे दी।  दादाजी ने पहले उसे पढ़ा , फिर उसपर अपना तथा दादीजी का साइन कर दिया। 

 

दादाजी उस कागज़ को देखते हुए बोले - मेरी सम्पति ये मकान है।  मैंने बृजमोहन की निगरानी में तुम लोगों को इस सम्पति को बेचने के लिया कहा है।  जितना पैसा आएगा , उसके पांच हिस्से होंगे।  चार हिस्सों से चार बराबर के फ्लैट ख़रीदे जाएंगे।  पांचवां हिस्सा तुम्हारी माँ और मेरे नाम की एफडी में निवेश किया जाएगा।  उसका मासिक ब्याज हमारे जॉइंट खाते में आता रहेगा , जिससे हमारा अपना जीवन चल सके।  तुम सब को एक एक फ्लैट मिलेगा और एक फ्लैट मुझे और तुम्हारी माँ को मिलेगा।  तुम्हारे पास तुम्हारी आमदनी के साधन हैं , उससे तुम अपना निर्वाह करोगे। 

 

हमारी मृत्यु के बाद हमारे फ्लैट का निर्णय हम करेंगे , तुम सब के व्यवहार के अनुरूप।  तुम्हारी कोई बाध्यता नहीं है , की तुम लोग हमसे कभी मिलने आओ, या हमारी देख भाल करो। 

 

मेरा ये फैसला मेरी उम्र के सभी माता पिता को भी राह दिखायेगा।  हमारे बच्चे हमारे अपने होते हैं।  हमारा सब कुछ उनके लिए ही होता है ; लेकिन ये सब सही है , जब की हमारे बच्चे भी हमें हमेशा अपना  समझें। हमारी ममता हमारे बच्चों के लिए सच्ची होती है , लेकिन जीवन की सच्चाई  ये भी है , कि ममता के प्रवाह में बिलकुल कंगाल होकर आप नहीं बैठें।  

Thursday, October 6, 2022

बौखलाहट !


कल शिवाजी पार्क में उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना ने दशहरा मनाया। शिवाजी पार्क और दशहरा तो हर साल की तरह ही था ; लेकिन उद्धव ठाकरे की परिस्थतियाँ  बदली हुई थी।  उनका सारा भाषण केंद्रित था , एकनाथ शिंदे और उनके शिव सेना से निकले सभी बाग़ी विधायकों के विरुद्ध ! अगर एक शब्द में इस भाषण का कोई  शीर्षक देना हो तो मैं दूँगा बौखलाहट !

रावण की जगह उन्हें एकनाथ शिंदे नजर आ रहा था। रावण के दस सिरों की जगह शिंदे के ४० विधायकों के सर नजर आ रहे थे। उन्हें शिंदे का बागपन तो नजर आ रहा था , लेकिन उन्होंने जो चुनाव में जीतने के बाद बीजेपी के साथ किया , वो नजर नहीं आ रहा था। सारे हिंदुत्व को छोड़ वो जा मिले अवसरवादी शक्तियों ले साथ , जहाँ सेक्युलर के नाम पर पालघर में साधुओं की हत्या किये जाने पर भी मौन था। 

सबसे घटिया बात थी , बाला साहेब ठाकरे को अपनी बपौती बताना ! बाला साहेब बाप तो जरूर थे उद्धव के , लेकिन बपौती नहीं ! जिस व्यक्ति को हमेशा हिन्दू ह्रदय सम्राट कहा जाता हो , वो एक व्यक्ति की बपौती कैसे हो सकता है ? ये तो कुछ ऐसा हुआ जैसे की महात्मा  गांधी के बेटे पूरे देश द्वारा उन्हें बापू कहे जाने पर ऐतराज करें ! रही सही कसर निकल गयी जब आधा ठाकरे परिवार नजर आया कल ही शाम को एकनाथ शिंदे के मंच पर , जहाँ वो भी अपनी दशहरा रैली निकल रहे थे ; एक अभूतपूर्व समूह  के समक्ष !


न मेरा व्यक्तिगत विरोध है उद्धव से और न ही विशेष लगाव है एकनाथ से ; लेकिन राजनीति में बौखलाहट के लिए कोई जगह नहीं होती। 

बहुत से मित्रों के फ़ोन आते रहते हैं ; उन्हें शिकायत है की आजकल ब्लॉग पर कुछ लिख क्यों नहीं रहे ? शिकायत दुरुस्त है। जब मैं अपने मन में कारण ढूंढता हूँ , तो मुझे बस एक ही कारण नजर आता है। वो कारण  है देश का माहौल।

नरेंद्र मोदी जैसा व्यक्ति हमें प्रधानमंत्री के रूप में मिला , देश की अपेक्षाएं बढ़ी। उन अपेक्षाओं को पूरा करने में मोदी ने अपना दिन रात एक कर दिया। दुनिया उनको एक विशेष सन्मान के साथ देख रही है। जितना काम उन्होंने अपने इस डेढ़ साल के कार्यकाल में किया है , मुझे नहीं लगता पिछली किसी प्रधानमंत्री ने इतना काम किया हो। एक ऐसा व्यक्ति जिसके भाषणों में हमेशा देश प्रेम की खुशबू आती है ; जो व्यक्ति हमेशा देश के १२२ करोड़ भारतीयों के लिए काम करता है , और जो व्यक्ति अमन के लिए बड़े से बड़ा जोखिम उठा कर एक फोन पर दिए गए निमंत्रण को स्वीकार कर दुश्मन देश पाकिस्तान चला जाता है - क्या बराबरी करेगा उसका कोई दूसरा प्रधामंत्री !

लेकिन वाह  रे भारत ! जिस व्यक्ति को देश ने पूर्ण बहुमत से अपना नेता चुना उन्हें ये स्वार्थ का चश्मा चढ़ाये हुए विरोधी दल चौबीस घंटे बदनाम करने पर तुले हैं। बेमतलब की बातों पर उन्हें प्रधानमंत्री का बयान  चाहिए।  राज्य स्तर पर हुए अपराधों पर उन्हें प्रधानमंत्री का इस्तीफ़ा चाहिए। इनका बस चलता तो वो मोदी की पाकिस्तानी दौरे को राष्ट्र विरोधी कार्यवाही घोषित कर देते ; लेकिन जिस ढंग से विश्व ने इस साहसिक कार्य को सराहा उसे देख कर दबी जुबान में बोलती रह गयी कांग्रेस।

देश की सबसे निकम्मी दिल्ली सरकार बात बात पर केंद्र सरकार को उल्टा सीधा कहती रहती है।  अपनी नाकामियों को छुपाने का के लिए केंद्र सरकार की आलोचना को अपना हथियार बनाया है आप ने।

बिहार के चुनाव को मापदंड बना लिया मोदी की सफलता और विफलता का। बिहार की हार मोदी की विफलता नहीं , बल्कि बिहार के मतदातों की विफलता है। उन्हें कोईबुराई नजर नहीं आती लालू जैसे अपराधियों  को अपना  सर्वेसर्वा बनाने में। उन्हें जरा भी विचित्र नहीं लगता जब लालूजी के दो अनुभवहीन बेटों को सरकार में उच्च पदों पर थोप दिया जाता है। नितीश की बोलती बंद है , क्योंकि अपने पुराने बड़बोलेपन के कारण उन्हें मोदी की जगह लालू को अपना भागिदार बनाना पड़ा।

ममता की तृणमूल कांग्रेस जूझ रही है अपने ही मंत्रियों के कारनामों से। दीदी ने अजीब लोगों का समूह पाल रखा है। एनसीपी किंकर्तव्यविमूढ़ है ; कहीं न कहीं उनके अंदर आशाएं है की शायद उन्हें बीजेपी अपने साथ ले ले।

देश में किसी मुस्लमान के साथ कुछ बुरा हो जाए तो सारे सेक्युलर वादी नाचने लगते हैं , और बिना किसी कारन के मोदी जी जिम्मेवार हो जाते हैं ; लेकिन हजारों हिन्दू लड़कियों का बलात्कार और हत्या हो जाए उनके लिए किसी का मुंह नहीं खुलता। एक दलित छात्र ने आत्महत्या कर ली तो सारी केंद्र सरकार जिम्मेवार हो गयी , लेकिन आई एस आई से जुड़े दर्जनों आतंकवादी पकडे गए तो सबकी बोलती बंद। कहाँ  चला जाता है ये सेक्युलर वाद का नाटक।

मिडिया भी चिताओं की अग्नि पर पूरियां सेक रही है। हत्या मार काट के वीडियो दिन भर में सैंकड़ों बार दिखाए जाते हैं ; फिर एक कहानी शुरू कर दी जाती है

Thursday, May 25, 2017

पीपल , गंगा और गाय


पीपल , गंगा और गाय

कई बार मन में आता है ; क्यों महत्व है इन सब का हिन्दुओं के जीवन में ! यूँ तो महत्व बहुत सारी  वस्तुओं का है , लेकिन क्यों कुछ वस्तुओं या जीवों का विशेष महत्व है ? इस चिंतन में मन में एक बात आयी। हम जीवन पर्यन्त संसार की जिस सामग्री का उपयोग करते हैं , उनका हम किसी न किसी रूप में मूल्य चुकाते हैं।  मसलन हमने एक ग्वाले से दूध खरीदा तो उसे दूध का मूल्य दिया , जिससे वो अपनी गायों के लिए चारे की व्यवस्था करता है।  यानी अपरोक्ष रूप से हमने गाय को उसके दूध का पूरा नहीं तो आंशिक मूल्य चुकाया। अगर हम अपने बाग़ से फल तोड़ कर कहते हैं , तो हम उस बाग़ की रख रखाव का दायित्व निभाते हैं।


लेकिन मृत्यु के बाद क्या ? विदेशों में आजकल एक नयी व्यवस्था निकली हुई है। ऐसी ऐसी कम्पनियाँ खुल गयी हैं , जो एक ऐसी सेवा बेचती है , जिसका उपयोग खरीदने वाला व्यक्ति मरणोपरांत ही कर पाता है। वह सेवा है मनचाहा अंतिम संस्कार ! ये कम्पनियाँ अपने ग्राहक से पूछती हैं - १. किस कब्रिस्तान में उसे दफनाया जाय। २. उसकी कब्र कैसी हो ? ३. क्या उस कब्र पर कोई मकबरा बनाया जाय ? ४. उसके शव को कैसा सूट और टाई पहनाई जाए। ५. उसका ताबूत कैसा बनाया जाय।६. उसकी शोक सभा के लिए किस किस को बुलाया जाय। इत्यादि।  हर वस्तु की फोटो दिखाकर उसका मॉडल नंबर लिख कर कॉन्ट्रैक्ट तैयार कर लिया जाता है। उन सेवाओं का जो भी मूल्य होता है वो उस व्यक्ति को कॉन्ट्रैक्ट बनने के समय चुकाना होता है।  सम्भवतः कोई व्यक्ति इन सब चीजों के भविष्य में सुचारु और इच्छानुसार किये जाने के लिए गवाह भी नियुक्त होता होगा।

भारत के परिपेक्ष्य में अगर हम सोचें तो इस हद की मानसिकता हमारे देश में नहीं है ; क्योंकि हम परिवारवादी लोग हैं। बेटे कितने भी नालायक क्यों न हों , मरणोपरांत रीति रिवाज जग दिखावे के लिए ढंग से पूरे करते हैं।  लेकिन सवाल रीति रिवाज का नहीं है।  सवाल है , उस कर्ज का जो हमारे शव के साथ जुड़ा है। आर्य समाज की अंतिम संस्कार पद्धति के अनुसार एक सामान्य मनुष्य के शव के दाह कर्म के लिए १० मन (३७३ किलो) लकड़ी और ४ मन (१५० किलो घी ) की आवश्यकता होती है। शव के पूरी तरह जल जाने के बाद उसकी अस्थियां गंगा या किसी अन्य नदी में बहा दी जाती है।

इस प्रकार हमारे ऊपर मृत्योपरांत तीन कर्ज होते हैं - पेड़ का कर्ज , गाय का कर्ज और गंगा (नदी) का कर्ज। हर व्यक्ति को ये कर्ज अपने जीवन काल में अग्रिम भुगतान के रूप में चुका देने चाहिए।

१. जीवन में एक पेड़ अवश्य लगाएं।

२. एक गाय को जीवन पर्यन्त पालने की व्यवस्था करें।

३. नदियों को दूषित न करें। और आज के समय में तो हम प्रधान मंत्री मोदी के गंगा सफाई अभियान में भी भाग ले सकते हैं।

जीवन के ये चिंतन हमें प्रेरित करते हैं समाज , देश और प्रकृति के प्रति अपने दायित्व का वहन करने की !

Saturday, April 22, 2017

इति विपक्ष एकता प्रकरणम

विपक्षी दलों की एकता

आपने भी पढ़ा होगा की दो दिन पहले नितीश कुमार  श्रीमती सोनिया गाँधी से मिलने गए । मुद्दा था - राष्ट्रपति चुनाव में पूरा विपक्ष एक होकर अपना उम्मीदवार उतारे। सब कुछ तो मीडिया को भी पता नहीं होता। ये रही अंदर की बात -

नितीश - सोनिया जी , आज मैं एक खास मुद्दे पर आपसे बातचीत करने आया हूँ ; मेरा प्रस्ताव है की हम सभी विपक्ष के लोग एकजुट होकर राष्ट्रपति पद का एक उम्मीदवार चुने और मोदी जी के कैंडिडेट को हरा कर उनका घमंड चकनाचूर करें।
सोनिया - आपका विचार अच्छा है , लेकिन क्या मेरे को कैंडिडेट बनाने से मेरा फोरेन रूट का प्रॉब्लम नहीं आएगा ?
नितीश - बिलकुल आएगा , वर्ना आपसे अच्छा कैंडिडेट कौन होता ! वैसे लालूजी भी बहुत इंटरेस्टेड हैं , लेकिन उनको सबका समर्थन नहीं मिलेगा।  मेरे बारे में आपका क्या ख्याल है ? लोग मुझको पसंद करते हैं।

( तभी लालू का प्रवेश )
लालू - क्यों नितीश भाई , आपने चर्चा कर ली हमारे नाम की ?
नितीश - (फुसफुसा कर ) - मैडम ने ना कर दिया है।
लालू - क्यों मैडम ? जब भी कांग्रेस पर संकट पड़ा है , हमने आपका साथ दिया है।
सोनिया - संकट भी तो आपके कारण पड़ा है !

( अखिलेश का प्रवेश )
अखिलेश - सब को पिताजी की तरफ से नमस्ते !
लालू - और तुम्हारी तरफ से ?
अखिलेश - अंकल , हमारी नमस्ते कौन सुनता है ? यू पी  के चुनाव के बाद से ही हम दोनों नौजवानो के सितारे गर्दिश  में है।
सोनिया - तुमने राहुल को बिना मतलब फँसाया !
अखिलेश - आंटी , जाने दें , किसको किसने फँसाया। फिलहाल मैं एक दरख्वास्त लेकर आया हूँ। जब से हम यू पी चुनाव हारे हैं , पिताजी बौखला गये हैं। हारने का कारण मुझे बताते हैं ; जबकि सच्चाई ये है कि मेरे कारण उनकी इज्जत बच गयी ; वर्ना मुख्यमंत्री वो भी होते तो हारना निश्चित था। जहाँ तहाँ मेरे बारे में उल्टा सुलटा बकते हैं। उनके साथ बैठकर शिवपाल अंकल उन्हें भड़काते हैं।
लालू - भैया , ये तो तुम्हारा आतंरिक मामला है तुम्ही निपटो। ऐसे सभा सोसाइटी में समधी जी की टोपी मत उछालो।
अखिलेश - अरे नहीं लालू अंकल , हम तो बस ये अनुरोध लेकर आये हैं , की  आप सब मिलकर उनको राष्ट्रपति का कैंडिडेट बना दो , तो हमारी जान छूट जाये।
सोनिया - इम्पॉसिबल ! मुलायम वाज  वैरी हार्ड ऑन  राहुल। उसने कांग्रेस के  बारे भी  ग़लत बोलै।

( सीताराम येचुरी का प्रवेश )

सीताराम - कम्युनिस्ट पार्टी का कैंडिडेट बनूँगा मैं। कम्युनिस्ट पार्टी ने कभी कोई पद नहीं माँगा।  बल्कि ज्योति बाबू को प्रधानमन्त्री  बनने से भी रोका।  हमेशा आप लोगों का साथ दिया।  हमारा पोलितब्यूरो ने फैसला किया है ,  कि देश का राष्ट्रपति मुझे बनाया जाय।

(अचानक ममता का प्रवेश )

ममता - अच्छा अब गुण्डो की पार्टी को भी राष्ट्रपति बनना है।  तुमलोगों ने पश्चिम बंगाल को बरबाद कर दिया , अब क्या हिंदुस्तान को बर्बाद करोगे।

(मायावती का प्रवेश )

मायावती - कभी तो दलितों की महिला को भी चांस दो ! मैंने फैसला किया है,  कि अब मैं यूपी की चुनावी राजनीति से सन्यास ले लूँ।
अखिलेश - अरे बुआ , सन्यास तो तुम्हे मोदी जी ने दिला दिया। तुम अपने  भतीजे को गलियाती रह गयी , वो हम दोनों की बजा के चला गया।

तभी सम्बित पात्रा का प्रवेश -

संबित - मुझे मोदीजी ने एक सन्देश देकर भेजा है , की इस बार हमलोग एक नयी मिसाल पेश करेंगे।  हमलोग इस बार किसी विरोधी पार्टी के किसी समझदार वरिष्ठ  नेता को राष्ट्रपति  उम्मीदवार बनाएंगे।  अगर आप लोगों ने कोई उम्मीदवार चुन लिया हो तो उन्हें खबर कर देना।

ऐसा सुनते ही सारे नेता भाग लिए सभा से।  अपनी चिर परिचित कुटिल मुस्कान के साथ संबित्त भी वहां से निकल लिए।
                                          
इति विपक्ष एकता प्रकरणम

Wednesday, October 12, 2016

खेल ख़त्म पैसा हजम !

  1. लो जी हमने कल फूंक दिए देश के सारे रावण ! कोई भी नहीं बचा। खेल ख़त्म पैसा हजम ! किसे भुलावा देते हैं हर साल ? जिसे जलाते हैं , वो तो सिर्फ एक पुतला था , जिसे बनाकर किसी गरीब के घर का चूल्हा जला होगा। सड़कों पर बाजार लगते हैं रावण के पुतलों के। छोटा रावण , बड़ा रावण , मूंछ वाला रावण , दस सर वाला रावण ! रावण जितना बड़ा - पैसे उतने ज्यादा। छोटे बच्चे , बूढी औरतें , सभी मिलकर बनाते हैं वो बेंत और कागज वाले रावण। भरण पोषण होता है उनके परिवारों का । ऐसे रावणों को मैं क्यों बुरा कहूँ , जो स्वयं जल कर भी गरीब को रोटी देते हैं।                                       
  2. उन रावणों को कौन जलाएगा , जो निर्भया जैसी मासूम बच्चियों का बलात्कार करते हैं ! उन पुलिस के वेश में बैठे जल्लादों को कौन जलाएगा जो गरीब आदमी को फंसा कर थाने में मार डालते हैं। शहाबुद्दीन जैसे खूंखार हत्यारों को जो बेल पर छुड़ा लेते हैं - उनको कौन जलाएगा ? नगर नगर में रावणों की भरमार है ; लेकिन उनके वध के लिए कोई विजयादशमी नहीं आती।

Wednesday, October 5, 2016

देश की प्रतिक्रिया



देश की प्रतिक्रिया

उरी हमले के बाद पाकिस्तान सोशल मिडिया में छाया हुआ है। ब्रह्मपुत्र के जल की धारा में रुकावट डालने से चीन ने अपना खुला समर्थन पाकिस्तान को दे दिया। तब से लगातार ऐसे सन्देश और संवाद व्हाट्सप्प , ट्विटर और फेसबुक पर घूम रहें हैं , की भारत के लोगों को इन दोनों देशों से व्यापारिक या अन्य किसी प्रकार का रिश्ता नहीं रखना चाहिए। यहाँ तक की दिवाली की खरीददारी में चीनी माल का बहिष्कार करना चाहिए।
इस तरह के संवाद देने वाले तो बहुत है , लेकिन इन पर अमल करने वाले ज्यादातर लोग शांत हैं। मेरे एक मित्र सुशील पोद्दार ने उत्तर दिया कि पिछले कई महीनों की खोजबीन और मोलभाव के बाद उन्होंने एक चीनी कंपनी से अपनी फैक्ट्री के लिए कुछ मशीने खरीदने का निर्णय लिया हुआ था ; लेकिन उरी के बाद के घटनाक्रम ने उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने चीन से मशीन  खरीदने का अपना निर्णय बदल दिया। अब उन्हें नए सिरे से किसी और देश के साथ मोलभाव करना है , और ऊंचे दाम देकर वो मशीन लेनी है। मेरे एक अन्य मित्र श्रवण सुरेका ने भी लिखा की उनकी एक व्यापारिक डील करोड़ों रुपये की एक चीनी कंपनी से तय हो चुकी थी ; लेकिन उन्होंने अपनी डील कैंसिल कर दी।

सुशील पोद्दार और श्रवण सुरेका के निर्णय की किसी ने चाहे वाहवाही नहीं की हो , लेकिन ये लोग हमारे देश के असली देशभक्त हीरो हैं  ; मैं इन्हें सैलूट करता हूँ।
दूसरी तरफ हमारे सामने हैं उदहारण स्वरुप करण  जोहर जो पाकिस्तान की और इसके निंदनीय कलाकारों की वकालत इसलिए कर रहें हैं , क्योंकि उनकी आगामी फिल्म ' ऐ दिल है मुश्किल ' उन पाकिस्तानी सितारों के साथ है और पाकिस्तान उनका बहुत बड़ा मार्केट है। .उसी तरह सलमान खान भी वक़ालत कर रहें हैं ये कह कर की कलाकार कोई आतंकवादी नहीं होता। इन दोनों से एक प्रश्न है - क्या उरी के शहीदों में से एक नाम तुम्हारे सगे भाई का होता , तो भी क्या यही फ़रमाते !

मुम्बई हमले के पहले क्या उन पाकिस्तानियों ने लोगों से पूछा था की तुम में से कोई कलाकार तो नहीं है न ? और न हीं देश के जांबाज कमांडो ने पुछा था , की वो लड़ाई किसके लिए लड़ रहे थे।  मैं निंदा  करता हूँ - ऐसे स्वार्थी लोगों की जो कला की आड़ में देश से ऊपर अपने व्यक्तिगत स्वार्थ को महत्व देते हैं।
एक हैं श्रीमान अरविन्द केजरीवाल ! उनका शौक है , मोदी के प्रति दैनिक अपशब्द कहना। सर्जिकल स्ट्राइक से उनकी बोलती बंद हो गयी थी। कई दिन हो गए, चुप बैठे। जब पेट में ज्यादा दर्द हो गया तो टेलीविजन पर आये ; पहले तो मोदी जी को उनकी राजनैतिक इच्छा शक्ति पर सैलूट ठोका और फिर आ गए अपने असली रंग में। कहने लगे की पाकिस्तान हमारे सर्जिकल स्ट्राइक को झूठ बता रहा है , आप उन्हें इसका प्रूफ क्यों नहीं दे देते ! भाई वाह ! पाकिस्तान के प्रचार की वजह तो सर्वविदित थी ; लेकिन आपके विचलित होने की वजह आपका राजनैतिक घटिया चिंतन है।  आपको लगता है , की ये सर्जिकल स्ट्राइक पंजाब के चुनाव में कहीं मोदी जी हीरो न बना दे। मोदी जी तो हीरो हैं जनाब , पंजाब के ही नहीं , देश के ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के। हीरो तो आप भी हैं लेकिन सिर्फ  पाकिस्तानी अखबारों के ! बधाई हो ! दिल्ली सबकुछ देख रही है।

दुसरे महान नेता कांग्रेस से फूटे - श्रीमान संजय निरुपम । उन्हें तो मानो केजरीवाल ने शब्द दे दिए।  आनन फानन में उन्होंने अपनी नापने वाली इंची टेप निकाल ली , मोदी जी का ५६ इंच का सीन नापने के लिए ; कांग्रेस को अपनी जान बचाने  के लिए इस महापुरुष से किनारा करना पड़ा। ऐसे पप्पू ब्रांड नेताओं की कांग्रेस में कमी नहीं।

बोले तो कुछ और भी लेकिन फिर जल्दी जल्दी फैला हुआ रायता समेत लिया। देश की जनता ऐसे राजनीति की आड़ में देशद्रोह करने वालों को कभी माफ़ नहीं करेगी।
अंत में चर्चा एक और व्यक्ति की - मिडिया के महानायक सुभाष चंद्र जी की! उन्होंने खुल कर कहा की उनका  ज़ी टीवी सूत्रधार था पाकिस्तानी सीरिअल्स को जिंदगी नाम के नए चैनल के माध्यम से भारत में लाने का लेकिन वर्तमान स्थिति को देखते हुए उन्होंने सभी पाकिस्तानी कॉन्ट्रैक्ट कैंसल कर दिए हैं और अब कोई भी पाकिस्तानी कार्यक्रम यहाँ प्रसारित नहीं होगा। आर्थिक हानि तो सुभाष चंद्र की भी हुयी है ; लेकिन उन्होंने कला की दुहाई देकर पाकिस्तानी कार्यक्रमों की वकालत नहीं की  !

और अंत  में एक सन्देश हमारे प्रिय प्रधानमंत्री श्री मोदी जी को !

आदरणीय मोदीजी ! पूरा देश हर कदम पर आपके साथ है। पाकिस्तान के साथ जैसा सलूक किया जाना उचित है , वैसा करें। चंद  लोगों बकवास इस देश के सवा सौ करोड़ देश वाशियों के सामने नक्कार खाने की तूती मात्र है।  उन्हें अनसुना कीजिये और विजय पथ पर बढिए - चाहे शांति के मार्ग से और चाहे युद्ध के मार्ग से !
शत शत वंदन !

Wednesday, September 14, 2016

Priya Kaun ?

प्रिय कौन ?

कल एक रिश्तेदार की मृत्यु हो गयी।  जब उनके घर पहुंचा , तो देखा की मृत शरीर एक अर्थी पर लेटाया हुआ था। परिवार के पुरुष उस अर्थी के ऊपर कपडा और रस्सी आदि बाँध रहे थे। महिलाएं शोक विह्वल होकर एक तरफ खड़ी थी। मृत व्यक्ति के पुत्र शोकाकुल होकर रो रहे थे।  समाज के लोग तथा रिश्तेदार अंतिम विदा देने के लिए पहुंचे हुए थे।

मृत व्यक्ति के भाई ,चाचा , साले  तथा अन्य रिश्तेदार अर्थी तैयार करते हुए निर्देश दे रहे थे -

' बॉडी के ऊपर पहले सफ़ेद कपडा डालो फिर रस्सी बांधो '

' बॉडी के शरीर पर कोई आभूषण तो नहीं है न ?'

'बॉडी को जरा आगे सरकाओ। '

यानि की जीवन का एक प्रिय व्यक्ति अब सिर्फ एक शरीर था - एक बॉडी ! जो प्रिय था जिसे हम नाम लेकर बुलाते थे वो तो चला ही गया था।

यही है शायद आत्मा का रहस्य। आत्मा ही प्रियजन है , आत्मा ही पिता , पति या भाई है।  शरीर तो एक अस्थायी पहचान है उस आत्मा की।

मन की बहुत सी गुत्थियां सुलझ गयी !


Tuesday, July 26, 2016

कुंठा : फ़िल्मी गानों के माध्यम से

कुंठा जीवन की एक सच्चाई है।  असफलता जन्म देती है , निराशा को और निराशा ह्रदय की कुढ़न बन कर बन जाती है - कुंठा। असफलता के कई कारण हो सकते है - खेल कूद , पढ़ाई , व्यापार या प्यार।  फिल्मों से मिलने
 वाले उदाहरण प्रायः प्रेम की असफलता के कारण ही होते हैं। 

इस गीतों भरी बातचीत में हम देखेंगे कुंठा के बदलते हुए स्वरुप।  जब कोई व्यक्ति अपने प्रिय या प्रिया को अपने आप से दूर करने का प्रयास करते हुए देखता है , तो जिस कुंठा का जन्म होता है , उसे कहते हैं ईर्ष्या ! कुंठित मन चीत्कार कर उठता है - और नहीं बस और नहीं , ग़म के प्याले और नहीं !

और जब वह दुराव जीवन के सबसे बड़े नुक्सान में बदल जाता है ; जब उसकी प्रियतमा किसी और की हो जाती है ; तब कुंठा अपने पूरे प्रचंड स्वरुप में आ जाती है। वो समाज चिंता छोड़ कर सीधे सीधे दोष देता है अपनी प्रियतमा को उसका नाम लेकर - ओ मेरी महुआ  तेरे वादे क्या हुए ?


और फिर वो विदा होती है अपने गाँव से , उस समय उस प्रेमी का ह्रदय टुकड़े टुकड़े हो जाता है। उसे अपने टूटे हुए सपने टूटे हुए फूल से और अपनी मीत आँखों में शूल सी चुभती है !


उसकी कुंठा उसे दीवाना बना देती है। वो गली गली भटकता है - ये दुनिया ये महफ़िल मेरे काम की नहीं !


थक हार कर रातों को सोने की कोशिश में अपनी तन्हाई में आवाज देता है - कोई लौट दे मेरे बीते हुए हुए दिन !


और कुंठा का अंतिम स्वरुप उभरता है , पूरे समाज और पूरी दुनिया के प्रति आक्रोश के रूप में। वो चीत्कार कर उठता है - जला दो इसे फूंक डालों ये दुनिया , मेरे सामने से हटालो ये दुनिया ; तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनिया !







Sunday, July 10, 2016

सिंगापुर : पर्यावरण



पर्यावरण की सुरक्षा जीवन के हर काम में निहित होनी चाहिए। एक मजेदार बात ; ख़ास कर हम भारत में रहने वालों के लिए। एक दिन मैंने देखा की हमारी गली में एक मकान के सामने के एक कंक्रीट मिक्सर की गाडी आकर खड़ी थी।  उसका मिक्सर वाला टैंक घूम रहा था।  हमारे देश में इस तरह की गाडी खड़ी होती है किसी निर्माणाधीन ईमारत के पास। मुझे समझ में नहीं आया की ये यहाँ क्या कर रही है !

बाद में जब मैं नीचे गया और उस ईमारत के सामने से गुजरा तो देखा की उसके अहाते में एक मिस्त्री अपने औजार लेकर जमीन की सतह एक हिस्से को ठीक कर रहा था। तब मुझे समझ में आया की इस देश में चाहे कोई छोटी सी मरम्मत ही क्यों न करनी हो , सीमेंट ओर कंक्रीट का गारा खुले में नहीं बनाया जाता है।  ये डिपो से कंक्रीट मिक्सर में डाल कर भेजा जाता है।

अब बताइए , ऐसे देश में कहाँ से किसी प्रकार का प्रदुषण फैलेगा !

Monday, July 4, 2016

सिंगापुर : कुछ और अनुभव


किसी भी देश को महान बनते हैं वहां के नागरिक और वहां का प्रशासन ! सिंगापुर में ये दोनों ही इतने चुस्त हैं की जन जीवन में किसी प्रकार की बुराई नजर ही नहीं आती।

फेरीवाले प्रायः हर देश में पाये जाते हैं। अंग्र्जी में इन्हे हॉकर्स कहते हैं। सस्ते दर पर तैयार भोजन खिलते हैं ये हॉकर्स। प्रायः इनका बनाया हुआ भोजन स्वादिष्ट भी होता है। लेकिन समस्या ये होती है की ये सड़कों पर जहाँ तहाँ अपना डेरा जमा लेते हैं। वहां गंदगी फैलाते हैं। इसके अलावा इनके भोजन की स्वच्छ्ता पर हमेशा प्रश्न खड़ा रहता है। भारत में तो ये दोनों बातें बिल्किल साफ़ नजर आती हैं।

सिंगापुर की सड़कों पर मुझे कोई हॉकर खाने पीने की सामग्री बेचता हुआ नहीं दिखा। मैंने अपनी बेटी पल्लवी से पुछा इसके बारे में। उसने बताया की पहले सिंगापुर में भी हॉकर्स हुआ करते थे ; लेकिन सफाई और स्वच्छ्ता के कारण वहां की सरकार ने कई जगहों पर हॉकर सेंटर बना दिए हैं। ये सेंटर पूरी तरह से व्यवस्थित हैं।  यहाँ बैठने के लिए कुर्सियां और टेबल आदि की व्यवस्था है। सरकार के निरीक्षक निश्चित अवधि पर इन हॉकर्स के स्टाल्स का निरिक्षण करते हैं। उनकी सफाई की अवस्था के अनुरूप उनकी रेटिंग की जाती है और वो रेटिंग वहां सामने एक सर्टिफिकेट की तरह दिखना अनिवार्य होती है।

कितना आसान समाधान ! कौन हॉकर चाहेगा की उसकी रेटिंग ख़राब हो , क्योंकि उसकी दुकान पर आने वाला व्यक्ति रेटिंग देख कर ही खायेगा।

क्या ये छोटी छोटी बातें - जो मुझे आकर्षित करती है , हमारी  सरकार के लोगों को नजर नहीं आती ?

Tuesday, June 28, 2016

सिंगापुर : कुछ नए अनुभव



ये मेरी तीसरी यात्रा है सिंगापुर की। हर यात्रा में यहाँ के जीवन की विशेषताएं सीख कर जाता हूँ।  छोटी छोटी बातें जो यहाँ के जीवन को कितना सुरक्षित , सुखद और आरामदायक बन देती है।

मेरी बेटी यहाँ अकेली रहती है ; उसे डेढ़ साल पहले एक अच्छी मल्टी नेशनल कंपनी में यहाँ काम मिल गया।  इसके पहले भी उसे लन्दन तथा शंघाई शहरों से जॉब के ऑफर मिले थे।  मैंने मना कर दिया था।  एक अकेली बिटिया को किसी अनजाने देश में अकेले रहने की अनुमति कैसे दे देते।  लेकिन बात जब सिंगापुर की आई , तो मुझे हाँ कहना ही पड़ा। सिंगापूर में किसी अकेली लड़की के लिए रहना, भारत में कहीं भी रहने से ज्यादा सुरक्षित है। यहाँ के अखबार में कभी कोई अपराध की खबर नहीं आती , क्योंकि ये देश जीरो क्राइम देश है। 

उसके यहाँ रहने के बाद पहली बार उसके पास आया। वो एक बहु मंजिली ईमारत में पांचवे माले पर रहती है।  जब हम उसके साथ उसकी लिफ्ट में चढ़े , उसने अपना कार्ड एक रीडर के सामने घुमाया तो उसमे पांचवे माले का नंबर रोशन हो गया। लिफ्ट सीढ़ी पांचवे माले पर रुकी। उसकी लिफ्ट के सामने मात्र उसका फ्लैट है। यानि की कोई भी व्यक्ति उस ईमारत के पांचवे माले पर तब तक नहीं आ सकता जब तक उसके पास उस माले ले लिए बन हुआ कार्ड न हो। किसी दूसरी मंजिल वाला व्यक्ति सिर्फ अपने नियत माले तक ही जा सकता है , किसी अन्य माले पर नहीं।

टैक्सी ३-४ मिनट के अंदर आपके मकान पर हाजिर हो जाती है।  यहाँ भी उबेर और उसके जैसी अन्य सेवाएं उपलब्ध हैं। टैक्सी वाले को आप बिल्डिंग का नाम या नंबर बता देते हैं तो वो आपको सीधा पहुंचा देता है। एक मजेदार बात ये है , की जैसे हमारे देश में हर मोहल्ले का एक पिन कोड होता है , वैसे यहाँ हर बिल्डिंग का ज़िप कोड होता है। कितना आसान हो जाता है पता। मात्र ६ संख्याओं का एक कोड !

एक और दिलचस्प बात ! जब हम किसी सड़क पर जाते हैं तो उस पर इलेक्ट्रॉनिक बोर्ड लगे होते हैं जिस पर हर बड़ी बिल्डिंग खास कर मॉल आदि वाली बिल्डिंगों के अंदर की पार्किंग के लिए उपलब्ध जगह की संख्या होती है।  यानि की अगर कैथे मॉल के सामने ७ लिखा है तो उसका अर्थ है की उसके अंदर ७ गाड़ियां पार्क करने की जगह बची है। इस सुचना के आधार पर लोग ये फैसला कर पाते हैं की उन्हें गाडी कहाँ पार्क करनी है।

सिंगापुर में आम तौर पर कोई पुलिस वाला नजर नहीं आता।  इसका कारन है की , यहाँ के सामान्य नागरिकों में बहुत से लोगों को पुलिस के सारे अधिकार होतें हैं। आपकी टैक्सी का ड्राइवर , होटल का वेटर , या एक छोटा सा दुकानदार भी पूरे पावर के साथ पुलिस वाला  हो सकता है। अगर कोई कहीं भी किसी प्रकार का अपराध करता है , उसे पकड़ने वाला कोई न कोई पुलिस अफसर भी कहीं आस पास जरूर होगा।

सचमुच एक अद्भुत शहर है सिंगापुर !

Monday, April 4, 2016

मीडिया क्या कर रहा है ?

देश बड़े नए किस्म के ज्वलंत प्रश्नों से जूझ रहा है -

१. नेताजी सुभाष की मौत कैसे हुयी ? कब हुयी ?

२. शनि मंदिर में महिलाएं क्यों न जाएँ ?

३. भारत माता की जय क्यों बोलें ?

४. भाजपा को देशभक्ति करने का क्या अधिकार है ?

५. जम्मू कश्मीर में भारतीय सेना बलात्कार क्यों करती है ?

६. मौलाओं के पास हर प्रश्न के उत्तर में फतवा क्यों होता है ?

७. मुस्लिम महिलाओं का तीन तलाक का विरोध क्यों जायज नहीं है ?

८. आर एस एस - हर मुद्दे पर अपनी राय क्यूँ देती है ?

९. राहुल गांधी हर दुर्घटना पर क्यों अवतरित हो जाते हैं ?

१०. हर सेलिब्रिटी की मृत्यु , हत्या और ख़ुदकुशी - हफ्ते भर की सुर्खियां क्यों खा जाती है ?

११. भारत ने वर्ल्ड कप क्यों नहीं जीता।

१२. भुजबल का क्या होगा ?

१३. कोलकाता में फ्लाई ओवर पल गिरने से राजनैतिक लाभ या हानि किस पार्टी की होगी ?

ये सारे प्रश्न पिछले २ हफ़्तों में प्रतिदिन टेलीविजन का ९५ % समय खा चुके हैं। बच्चे हुए ५ % समय में ये मुद्दे उठते हैं -

१. ये किसान पूरे देश में क्यों आत्महत्या करते हैं ?

२. चीन ने आतंकवाद में मामले में पाकिस्तान का साथ क्यों दिया ?

३. विदेश मंत्रालय के प्रयासों से ४ भारतीय नागरिक सीरिया की जेल से छूट कर भारत कैसे आये।

४. पठानकोट आतंकी हमले की जांच कर रहे , एनआईए के एक अफसर की हत्या क्यों हुयी ?

५. आसाम और पश्चिम बंगाल में विधान सभा के चुनाव शुरू।


फैसला कीजिये , मीडिया क्या कर रहा है ?

Sunday, April 3, 2016

पुल और पार्टियां



पुल टूटने से पहले -

भले ही इस पुल की नींव पिछली सरकार ने रखी थी , लेकिन पूरा किसने किया ? हमने !!!

पुल टूटने के बाद -

इस पुल का ठेका पिछली सरकार ने दिया था , आज अगर ये गिर गया तो कौन जिम्मेवार होगा ? हम ???


Tuesday, March 8, 2016

कन्हैया और अनुपम

 कन्हैया और अनुपम ! व्यंजन और स्वर - दोनों प्रकार के अक्षरों का  प्रथम अक्षर - क और अ ! किसी शब्द के पहले क या क की कोई मात्रा  दीजिये , तो बन  जाता है एक अपशब्द - जैसे कुरूप , कुशासन , कुदृष्टि और क की जगह अ लगा दें तो बन जाता है अति सुन्दर जैसे की - अद्वितीय , अप्रतिम, अनुपम ! खैर ये तो थी एक अलंकारात्मक तुलना ; लेकिन दोनों की तुलना भी कुछ इसी प्रकार की बैठती है।

कन्हैया बिहार के  गाँव से आकर जेएनयु में पढ़ने के लिए दाखिला लेता है , लेकिन कैंपस की राजनीति में हिस्सा लेकर बन जाता है छात्र नेता। देश की खैरात के ऊपर चलने वाले जे ऍन यु में देश को ही गालियां देने वाले लोगों सरगना बन जाता है।

अनुपम उन कश्मीरी पंडितों का प्रतिनिधि है , जिन्हे कश्मीर से रातों रात विस्थापित कर दिया गया था। अनुपम ने अपने जीवन में संघर्ष किया और अपने लिए एक स्थान बनाया भारत के चलचित्र जगत में।

कन्हैया अंग बन जाता है उस सोच  का जो देश को बर्बाद कर देना चाहती है। वो गुट  जो अफजल गुरु और मकबूल बट्ट जैसे देश द्रोहियों को अपना आदर्श मानता है। अफजल गुरु की शहादत को मनाने के लिए वाईस चांसलर पर दबाव डालता है। देशद्रोहियों के साथ मिल कर नारे लगाता है -' भारत की बर्बादी तक जंग चलेगी ', 'अफजल हम शर्मिंदा है , तेरे कातिल जिन्दा है '. इतना ही नहीं इस देश से आजादी के नारे लगाता  है। ये अलग बात है , की जब पुलिस द्वारा पकड़ लिया जाता है तो बहाने बाजी करता है।  अपने कहे हुए नारों को नकारता है। नए फर्जी नारे बनाये जाते हैं।  आजादी - गरीबी से , आजादी - बेरोजगारी से। कन्हैया जरा ये बताये की गरीबी से आजादी पाने के लिए अफजल गुरु की शहादत का क्या सम्बन्ध है ?

अनुपम कश्मीर से पंडितों के विस्थापन दिवस को मनाने के लिए एक अपना वक्तव्य जारी करता है।  पूरे देश द्वारा वो सुना जाता है ; कश्मीरी पंडितों की समस्या पर पूरी  चर्चा  होती है। अनुपम का एक नया रूप देश के सामने आता है।

कन्हैया को जेल से निकलने के लिए जमानत बनती है दस हजार रुपैयों और बहुत सारी  शर्तों पर जो किसी सामान्य अपराधी पर लागू होती है ; लेकिन कन्हैया को हीरो बनाने वाले, इसे कन्हैया की विजय मान  लेते हैं। कन्हैया जेल से निकल कर फिर एक बार जे एन यू में भाषण देता है। एक निरर्थक भाषण - जिसमे मोदी को  कोसने के अलावा कुछ नहीं था।  गरीबी के लिए जिम्मेवार पार्टियां - कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी कन्हैया को अपना हीरो बना लेते हैं। बिकी हुयी मिडिया कन्हैया को बुला कर उसका लम्बा लम्बा इंटरव्यू  लेती है ; जिसे कन्हैया अपनी नयी नयी बनी पहचान का इनाम समझ कर चटखारे लेता है। मतलब  साफ़ है - कन्हैया ने राजनीति में घुसने का  रास्ता बना लिया है।

कुछ दिनों पहले टेलीग्राफ अखबार ने देश में बढ़ती हुयी तथाकथित असहिषुण्ता पर एक चर्चा का कार्यक्रम रखा।  जस्टिस गांगुली और कांग्रेस के सुरजेवाला ने जी भर कर असहिष्णुता के गीत गाये , मोदी सरकार को कोसा।  लेकिन जब अनुपम ने उनकी बातों का स्पष्ट और सीधा उत्तर देना शुरू किया तो सबके तोते उड़ गए। ७-८ मिनट के अपने बेबाक और निर्भीक भाषण से  अनुपम देश की   सोच पर छा  गया।

आज कन्हैया और अनुपम दोनों ही शायद एक राजनैतिक जीवन के दो विपरीत छोरों से अपनी शुरुवात कर  रहे हैं,  लेकिन दोनों के स्तर में वही अंतर है जो राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी में है।






Friday, January 1, 2016

Shortest Story

एक अति लघु कथा

मैंने एक अनजान व्यक्ति से कहा - नया साल मुबारक हो !

उसने उत्तर दिया - क्यों ?

मैं निरुत्तर हो गया।


Wednesday, July 15, 2015

असली सेक्युलर ! - एक लघु कथा



बड़ा विचित्र किस्म का भिखारी था वो। सुबह सुबह उठ कर गले में एक रुद्राक्ष की माला डाल  कर शिव मंदिर के सामने बैठ जाता था। आते जाते लोग उसकी चटाई पर कुछ छुट्टे कुछ रुपैये डाल देते  थे। दोपहर में  गुरूद्वारे के पास  बैठ जाता था ,  सिखों वाली पगड़ी पहन कर।  लोग काफी  पैसे दे जाते थे।  कई बार  वहीँ लंगर में खाना खा लेता था।  शाम को इबादत की  सफ़ेद जाली की टोपी पहन किसी मस्जिद बाहर बैठ जाता था , वहां  भी अच्छी कमाई हो जाती थी। रमजान के दिनों में बिना रोजा रखे शाम के खाने का जुगाड़ हो जाता था। रविवार के दिन  चर्च  के बाहर ईसाई क्रॉस की माला काम आती थी। सबसे बड़ी मौज तो ये थी की उसके दान दाता उसके सभी ठिकानों में से सिर्फ  एक पर जाते थे , इसलिए किसी को उसके मजहब पर कोई शक नहीं होता था। 

एक दिन उसके एक प्रोफ़ेसर  पडोसी ने उससे पुछा - तुम ये अलग अलग भेष बना कर लोगों को और उनके भगवान को ठगते हो ; तुम्हे ऐसा नहीं लगता की भगवान किसी दिन तुमसे बहुत नाराज हो जाएंगे ?

उसने हँसते हुए उत्तर दिया - मैं कहाँ ठगता हूँ ? ठगते तो वो लोग हैं जिन्होंने  भगवान की   अपनी  मनचाही कल्पना से सूरत बना दी ; अपने आपको भक्त दिखाने  के लिए अजीब अजीब वस्तुएं बना ली - जैसे की रुद्राक्ष , इबादत की टोपी और क्रॉस की माला। यहाँ तक की सभी जगह व्यापक निराकार भगवान के रहने के भी घर बना दिए - जैसे की मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे और चर्च।  क्या भगवान  यही सब देखते हैं ? ये सारा दिखावा अपने आप के लिए ही तो होता है। मैं भी वही करता हूँ जो उनको अच्छा लगता है। मेरा गुजारा हो जाता है ; उनकी दान दक्षिणा पूरी हो जाती है। फर्क इतना है की वो दूसरे  धर्मों के लिए बुरा भला कहते हैं , मैं सबका सन्मान करता हूँ, सबको आशीर्वाद और दुवाएँ देता हूँ । अब बताइये की भगवान किससे ज्यादा खुश होंगे , उनसे ये मुझसे !

प्रोफ़ेसर साहब निरुत्तर थे। 




Sunday, June 28, 2015

ललित मोदी का बवंडर



कमाल का देश है हमारा ! नरेंद्र मोदी के निरंतर चल रहे एक के बाद एक देश के उत्थान के कार्यक्रम न मिडिया को दिखते  हैं न विपक्ष को ; लेकिन एक बेमतलब के बेकार से गुजरे हुए इतिहास ललित मोदी की एक एक ट्वीट हेडलाइन बन रहा है।

वो कांग्रेस जो भ्रष्टाचार के कारनामों के नीचे दब कर मर चुकी है ; आज बेमतलब के आरोप लगाते  नहीं थकती।  देश के प्रधानमंत्री के लिए अभद्र शब्दों का प्रयोग करना उन्होंने दिनचर्या बना लिया है।  खीज उठती है जब प्रगति के हर काम में वो रोड़ा अटका रहें हैं।  देश के जीवन के मूल्यवान साठ साल उनके परिवारवाद की भेंट चढ़ गए।  हम दुनिया की रफ़्तार के सामने निरंतर पिछड़ते चले गए। अब जब एक नया प्रशासन देश को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील है , तब उनके पास एक ही काम बचा है - वर्तमान सरकार को नीचा  दिखाने  के लिए ऊल -जुलूल बाते करना।

ललित मोदी प्रकरण को ही लेवें।  पूरी दुनिया में क्रिकेट खेलने वाले देश जानते है , कि  कैसे ललित मोदी ने क्रिकेट के खेल को एक पैसा छापने वाली मशीन 'आई पी एल' के नाम से बनायीं। ललित मोदी इसके कमिश्नर के रूप में देश के हीरो बन गए। इनके साथ सहयोग कर रहा  था , कांग्रेस सरकार का पूरा तंत्र। बहुत से मंत्रियों ने इसका आर्थिक लाभ उठाया। शशि थरूर अगर ज्यादा पैसे बनाने के चक्कर में अपनी एक अलग टीम नहीं बनाते , तो शायद कहानियां नहीं खुलती।

शायद ललित मोदी ने किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति को नाराज कर दिया , जिसके कारण  वो अपनी अति शक्तिशाली अवस्था से हटा दिए गए।  उसके बाद शुरू हो गया उनके खिलाफ आरोपों का सिलसिला।  धीरे धीरे सब पल्ला झाड़ने लगे। ललित देश छोड़ कर लन्दन जा बैठे। वो सारे नेता जिनके ललित से सम्बन्ध थे , देश में उसका विरोध करते लेकिन लन्दन में उनसे मिलकर सहानुभूति करते थे।

अब लीजिये सुषमा स्वराज और वसुन्धरा राजे का प्रकरण।  सुषमा ने कहा की ललित को वो जानती थी और वो उनकी पत्नी की बीमारी के समय ललित की इतनी मदद कर रही थी की वो पुर्तगाल जाकर अपने पत्नी से मिल सके। वसुंधरा राजस्थान से हैं और उनकी पारिवारिक मित्रता मोदी परिवार से रही है ; उस मित्रता के निमित उन्होंने उस समय ललित की मदद करने के लिए सिफारिश की जब वो राजस्थान  की मुख्यमंत्री नहीं थी। दोनों देवियों ने सच्चाई देश के सामने रख दी। लेकिन कांग्रेस को इनका इस्तीफा चाहिए क्योंकि उन्होंने बकौल कांग्रेस एक अपराधी की मदद की है। पहली बात तो ये की क्या ये मदद अपराध की श्रेणी में आती है ? और अगर आती भी है तो क्या इसका दंड पदत्याग है।

अब जरा कांग्रेस अपनी मदद का इतिहास देखे -
१. मायावती पर बहुत आरोप थे आर्थिक और राजनैतिक भ्रष्टाचार के , क्या कांग्रेस ने उनके साथ सौदेबाजी कर के उनकी मदद नहीं की।
२. मुलायम सिंह के खिलाफ बहुत कुछ था , क्या वही सौदेबाजी उनके साथ नहीं हुई।
३. चारा घोटाले के सबसे बड़े अपराधी लालू यादव को तो कांग्रेस ने गोद  ही ले रखा है।
५ . कांग्रेस के तो बहुतेरे मंत्री ही दागदार हैं , उनका क्या ?

ये सारे उदहारण तो सौदे बाजी के हैं लेकिन क्या सोनिया गांधी ने अपने पति की हत्यारिन के लिए सिफारिश कर उनकी फांसी को आजीवन कारावास में नहीं बदलवाया ? उनका तर्क  भी यही था की मानवता के नाते उन्होंने उसकी मदद की। क्या मानवता के लिए इतने जघन्य अपराध के अपराधी की मदद तो उनकी महानता  है , लेकिन उसी मानवता के लिए अगर सुषमा या वसुंधरा ने किसी सामान्य आर्थिक अभियोगी की मदद बिना किसी व्यक्तिगत लाभ इ लिए कर दी तो अपराध हो गया ?

गलती और अपराध  में एक महीन दूरी  है। सुषमा और वसुंधरा के कृत्य उनके  राजनैतिक कद को देखते हुए गलती तो कहला सकती है लेकिन कोई अपराध नहीं। उनकी ये गलती उतनी ही बड़ी गलती है जितनी दिग्विजय सिंह का अंतरराष्ट्रीय अपराधी ओसामा को ओसामाजी कहना। ऐसी गलतियों की सजा उनकी जग हंसाई तो हो सकती है लेकिन इसके अतिरिक्त और कोई दंड नहीं।

कुछ टीवी चैनेल तो आजकल चिता पर भी रोटियां सेकने का प्रयास करते हैं। उनका उद्देश्य है उनका व्यक्तिगत लाभ यानी टी आर पी ! उन्हें उनका लाभ तो जरूर मिल रहा है लेकिन वो लोग देश का बहुत बड़ा नुक्सान कर रहें हैं। पत्रकारिता के चोले में एक डिक्टेटर जैसा रूप अपना कर बैठे हैं ऐसे लोग। समय ही ऐसे लोगों का हिसाब किताब करेगा।