नील स्वर्ग

नील स्वर्ग
प्रकृति हर रंग में खूबसूरत होती है , हरी, पीली , लाल या फिर नीली

Thursday, September 16, 2010

नेता , नीति और नीयत : सचित्र कहानियां


भारत में नेता एक घटिया शब्द बन चुका है . जितने हास्य कवि हैं , कॉमेडी शो  के मसखरे हैं या फिर कार्टूनकार हैं , किसी का काम नहीं चलता बिना नेता . गालियाँ देने का मन करता है तो लोग नेता को दे लेते हैं. किसी को  नौकरी नहीं मिली तो नेता , किसी को कोलेज में दाखिला नहीं मिला तो नेता , किसी की दुकान बंद हो गयी तो नेता और अगर सड़क पर गड्ढे हैं तो नेता. ऐसा क्या किया है बेचारे नेताओं ने ?
 
उत्तर आसान है . बात है बात की . नेता का हथियार है बात , बात यानी वादे , वादे यानि सब्जबाग , सब्जबाग यानि जो पुरे  न हो वो वादे. वोट मिलने के बाद कसमे वादे प्यार वफ़ा सब बातें है और बातों का क्या ? आइये कुछ चित्र देखें . चित्र में जो दीखता है उससे कुछ ज्यादा देखें .



पहला चित्र है आदरणीय श्री करुणानिधिजी  का . आपको याद है न श्रीमानजी ने २००९ ने में भूख हड़ताल की घोषणा की थी. यह भूख हड़ताल आम भूख हड़तालों जैसी नहीं थी . सार्वजनिक स्थान पर की गयी यह हड़ताल आदरणीय श्री करुणानिधिजी   ने घर से सुबह का नाश्ता कर  के आने के बाद शुरू की. गर्मी के दिन थे इसलिए वहां सड़क पर शामियाना लगाया गया , गर्मी कुछ ज्यादा ही थी इसलिए दो एयर कुलर भी लगवाए गए . और यह ऐतिहासिक हड़ताल समाप्त हो गयी चार घंटों में क्योंकि   श्री करुणानिधिजी का लंच का समय हो गया . मीडिया में दिखने का उद्देश्य पूरा हुआ .


अगला चित्र अप्रैल २००४ का , उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर का . बी जे पी के वरिष्ठ नेता श्री लालजी टंडन ने अपना जन्म दिन मनाया एक चुनावी सभा में . सभा तो २.३० बजे समाप्त हो गयी , लेकिन उसके बाद शुरू हुआ एक शर्मनाक जलसा . माइक  पर घोषणा की गयी की टंडन साहब के जन्मदिन के उपलक्ष्य में गरीब औरतों को साड़ियाँ दी जाएँगी . एक गरीब देश की अति गरीब महिलाओं को अगर आप मुफ्त साड़ियाँ बांटने का मेला लगायेंगे तो क्या होगा ? हुआ वही जो होना था . जोरदार अफरा तफरी - परिणाम २५ महिलाएं और बच्चे कुचल कर मारे गए और पचास से भी अधिक हस्पताल पहुँच गए .




एक ताजा चित्र और मिला है , किसी मित्र ने इ मेल से फॉरवर्ड किया है . चित्र दिलचस्प बन गया है उस पर अंकित शब्दों और निशानियों के कारण . चित्र है हमारे देश के कांग्रेसी भविष्य युवराज राहुल गाँधी का , जब उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान किसी निर्माण स्थल पर गरीब मजदूरों ( या मजदूरनों ) से कन्धा से कन्धा मिला कर काम किया. कितनी देर काम किया यह तो ये चित्र नहीं बता पायेगा पर काम करने में क्या अंतर था उसे समझाने के लिए मेरे शब्दों की जरूरत नहीं .     
 
ऐसे चित्रों से या यूँ कहिये ऐसे दिखावे से हमारा देश भरा पड़ा है , फिर क्यों न आजादी हो इस देश में जनता को नेताओं को गलियाने की !!!!!!!!!!!!

Saturday, September 11, 2010

नेता उवाच : एक हरयाणवी लघु कथा

चुनाव की सरगर्मी जोरों पर थी . गाँव में नेता आ रहे थे जा रहे थे . हर नेता का जोरदार भाषण होता ; गाँव के भोले भाले लोग मनोरंजन समझ कर सुनने आ जाते थे .

सत्ता पार्टी के नेता ने गाँव वालों को अपनी पांच सालों की उपलब्धियों के बारे में बताते हुए कहा - "भाइयों और बहनों , म्हारी  सरकार ने आप को लगातार बिजली देने के लिए एक हैडरो पावर का निर्माण किया सै . इसमें हमने  बिना आपसे कुछ लिए,  नदी के पानी से ही बिजली  पैदा  कर दी . आपको हुआ दूना फायदा - पानी का पानी और बिजली की बिजली . .................. "

विपक्ष के नेता पधारे . उन्हें पता चला की सत्ता पक्ष ने किस पॉइंट पर गाँव वालों को प्रभावित किया था . उन्होंने उन्ही मुद्दों पर अपना भाषण कुछ यूँ दिया - " भाइयों और बहनों ! मैं आपको असलियत बताऊँगा इस भ्रष्टाचारी सर्कार की . ये कहते हैं की इन्होने नदी के पानी से आपको बिजली निकाल कर दी . तो भाइयों अगर आप दूध से मलाई निकाल लो तो क्या बचता है - निरा सफ़ेद पानी , जिसके गुण सारे निकाल गए हों . सारा माखन घी तो बाहर चला जाता है , छाछ रह जाती है. उसी तरह ये सर्कार हमारे पाणी की सारी बिजली निकाल लेती है और हमें देती है पोका पाणी . ऐसा पाणी पीकर म्हारे टाबर (बच्चे) बड़े होंगे , तो क्या होगी शक्ति उनमे और क्या होगा दिमाग . और तो और हमारी फसल जो होगी उसमे क्या बचेगा ? इसलिए भाइयों उनके झांसे में मत अइयो . ................."

और विरोधी पक्ष का उमीदवार जीत गया , हरयाणा के उस गाँव से .

Monday, September 6, 2010

जीवन की ज्यामिति




बिंदु = व्यक्ति , एक अकेला जिसका अस्तित्व बहुत सूक्ष्म होता है







सरल रेखा = जीवन , जिसका प्रारंभ है तो अंत भी निश्चित है .











वृत = आत्मा , जिसका न कोई प्रारंभ है न अंत .











समानांतर रेखाएं = सुख और दुःख , दोनों जीवन में साथ चलती है लेकिन आपस में मिल नहीं सकती .







कोण = घर , दो रेखाएं- यानि दो जीवन जब मिलते हैं तो अपने लिए बनाते है, एक कोना, जिसे घर कहते हैं .









त्रिकोण - परिवार , दो रेखाओं से मिलती है जब तीसरी रेखा तब पति पत्नी के साथ होती है उनकी संतान ; और बनता है परिवार .तीनों रेखाओं का झुकाव आपस में कैसा भी हो लेकिन उनके तीनों कोणों का योग होगा १८० डिग्री . यानि परिवार में आपस में कितने भी परिवर्तन आयें लेकिन परिवार का प्रेम उतना ही रहने वाला है .





चतुर्भुज - वृहत परिवार - एक और सदस्य का आना परिवार के प्रेम के जोड़ को दुगुना देता है , क्योंकि चारों कोणों का योग हो जाता है ३६० डिग्री .

Sunday, September 5, 2010

इमोशनल अत्याचार या ग्लैडीयेटर शो


इमोशनल अत्याचार - आजकल यूटीवी पर बड़े जोर शोर से ये रियलिटी शो प्रसारित हो रहा है . इस रियलिटी शो की ख़ास बात ये है की इसमें कुछ ज्यादा ही रियलिटी है . आज के इस फ़िल्मी युग में ये स्कूल कोलेज जाने वाले लड़के लड़कियों को स्टिंग ऑपरेशन कर के टेस्ट करते हैं कि ये अपने साथी के लिए वफादार हैं या नहीं . तरीका भी कमाल का है . जो इनका सस्पेक्ट यानि कि खोज का विषय होता है उस पर डोरे डालने के लिए इनकी अत्याकर्षक आधुनिक लड़कियां ( या लड़के ) मेनका कि तरह अपने आप को पूरी तरह समर्पित कर देती हैं हमारे आधुनिक युग के विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के लिए ; और मिस्टर विश्वामित्र फंस जाते हैं .ये सारा वाकया कैमरों के माध्यम से रिकॉर्ड किया जाता है . सारी रेकॉर्डिंग दिखाई जाती है उस लड़की (या लड़के) को जो इस तरह का परीक्षण अपने प्रेमी पर करवाना चाहती है . और इस सारे घटना क्रम का ग्रांड फिनाले होता है जब शिकार अपने शिकारी के साथ किसी पूर्व निर्धारित स्थान पर मौजूद होता है और वहां इस शो के एंकर उस पीड़ित प्रेमिका ( या प्रेमी) के साथ आधा दर्जन कैमरा और साउंड रेकॉर्डिंग वालों को लेकर छापा मरते हैं .वहां प्रस्तुत होता है एक दृश्य जिसमे एक तरफ निराश प्रेमिका (या प्रेमी) का क्रोध , निराशा, हताशा और मानसिक तूफ़ान का मिश्रित रूप और दूसरी तरफ होता है उस हारे हुए व्यक्ति का चेहरा जिस पर भय , आक्रोश , ग्लानि और हार का मिश्रण . थोड़े बहुत थप्पड़ , ढेर सारी गालियाँ, बीच बचाव और एंकर महोदय की संवेदना. शो को और मसालेदार बनाने के लिए आजकल इसमें शामिल किये जा रहे हैं बड़े बड़े सितारे जैसे की अजय देवगन , इमरान हाशमी , सलमान खान आदि .

ये तो था चित्र जो हमें दिखाई देता है . लेकिन वास्तव में हुआ क्या , कभी इस पर सोचते हैं हम ? आइये कुछ प्रश्नों का उत्तर खोजे हम -

१. युवावस्था के कच्चे प्रेम का अर्थ विश्वामित्र जैसी कठिन साधना है ? इन बच्चों को छोडिये, क्या वर्षों के शादी शुदा लोग भी पास होंगे इस एसिड टेस्ट में ?

२. क्या लोयाल्टी टेस्ट करने का यह सही तरीका है ? व्यक्ति की लोयाल्टी का अर्थ है की उसकी सामान्य दिनचर्या में वो किस तरह रहता है , जो बहुत लोग करवाते भी हैं- इस तरह का काम करने वाली खुफिया कम्पनिओं से . असामान्य पारिस्थिति पैदा कर के टेस्ट करना - उस व्यक्ति की कमजोरी को विकटतम स्थिति में ले जाकर टेस्ट करना है . जिसका परिणाम एक ही होता है . और जो मजबूत लोग इन पारिस्थितियों में भी कमजोर नहीं पड़ते उनकी तो एपीसोड बनती ही नहीं , क्योंकि उसकी व्यावसायिक कीमत कुछ भी नहीं .

३. इस सारे घटनाक्रम का उस लड़के और लड़की के भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है ? एक एपिसोड पूरे महीने भर ( बल्कि हमेशा ) छोटे बड़े रूप में लगातार दिखाई जाती है . व्यापारिक लाभ के लिए उन हिस्सों का प्रोमो बनता है जिसमे या तो विषय (शिकार) के अन्तरंग दृश्य होते हैं , या फिर निराश लड़की का रोता हुआ चेहरा और या फिर उसके आक्रोश, भद्दी गलियों और थप्पड़ों के बीच शिकार का सहमा हुआ चेहरा .

उन दोनों का सम्बन्ध तो जीवन भर के लिए भरपूर कड़वाहट के साथ ख़तम होता ही है , लेकिन इसके साथ ख़तम हो जाती है उन दोनों के लिए भविष्य की तमाम राहें. ये भारत है जहाँ विवाह से पहले लड़के और लड़की का चाल चलन , उनकी सामजिक प्रतिष्ठा आदि पूरी तरह जाँची परखी जाती है . ऐसे राष्ट्रीय स्तर के हलके प्रदर्शन के बाद क्या उन दोनों को ही मिल पायेगा कोई जीवन साथी . कम से कम उनका मनपसंद तो नहीं और आसानी से भी नहीं .

४. क्या ऐसी सम्भावना नहीं है के इतनी छीछालेदर के बाद दोनों में से कोई भी आत्म- हत्या का मन बना ले ?

५. दोनों बच्चों के परिवारों के जीवन पर इस सब का क्या असर पड़ेगा ? उनके मा बाप कहीं डिप्रेसन में तो नहीं चले जायेंगे ; उनके बहन भाई की शादी विवाह में क्या अडचने नहीं आएगी ? क्या रिश्तेदार और पडोसी अपने बच्चों से ये नहीं कहेंगे कि इनसे दूर ही रहना ?

६. टेलीविजन का यह घिनौना खेल खेला जा रहा है सिर्फ जोरदार टी आर पी और ढेर सारे पैसे कमाने के लिए . हर ब्रेक के बाद में पिछले एपिसोड या अगली एपिसोड के दृश्य या विवरण शामिल किये जाते हैं .

क्या ऐसे रियलिटी शो भारत जैसे देश के परिवेश में सही हैं ? दूसरे रियलिटी शो दिखाते हैं बच्चों की प्रतिभाएं नाचने की, गाने की, खतरों से खेलने की या फिर कोई अन्य विलक्षण प्रतिभा ; और ये सारे शो उस बच्चे को देते हैं एक प्लेटफोर्म जहाँ से वो अपनी प्रतिभा के आधार पर अपने भविष्य का निर्माण कर सके . वहीँ इमोशनल अत्याचार एक ऐसा रियलिटी शो है जहाँ बच्चों की सारी प्रतिभाओं को ताक पर रख कर उनकी भावनाओं का बलात्कार किया जाता है या यूँ कहिये की इमोशनल अत्याचार किया जाता है ; और उन्हें धकेल दिया जाता है एक ऐसे अँधेरी खाई में जहाँ से फिर वापस उजाले में आना आसान नहीं होता .

मेरी इस सीरियल के निर्मातों से दरखास्त है की अगर इसी तरह से पैसा कमाना हो तो ये सारे परीक्षण करें उन लोगों पर जो समाज के सामने आते हैं रोल मोडल के रूप में - हमारे नेता , फिल्म स्टार, टीवी पर प्रवचन देने वाले साधु संत , ऐसे लोग जो समाज के सामने दम भरते हैं अपनी सच्चाई और पवित्रता का . बक्श दो नौजवान पीढ़ी को - जिनके लिए प्यार मोहब्बत एक हलकी फुलकी दोस्ती का अगला कदम भर है - जिसका प्रशिक्षण उन्हें मिलता है बॉलीवुड की फिल्मों से . सम्भावना है कि उनमे से कोई गलत चुनाव कर बैठे लेकिन आपके इस टेस्ट में तो तय है कि दो व्यक्तिओं का जीवन दांव पर लगेगा ही .

और हम टीवी पर चटखारे लेकर देखने वाले दर्शकों की अवस्था  उस तरह की है जैसे किसी ज़माने में रोम में प्राणों को दांव पर लगा कर मनोरंजन करने वाले ग्लैडीयेटरों के दर्शकों की होती थी ! अगला ग्लैडीयेटर हमारा या आपका बच्चा भी हो सकता है !

Thursday, September 2, 2010

शाम ढले - हम कितने एकाकी

कड़ाके की ठण्ड पड़ रही थी . बाहर सब कुछ बर्फ में ढका था. तापमान माइनस पांच डिग्री सेल्सिअस था. बफलो वैसे भी कुछ ज्यादा ठंडा रहता है - शायद निआग्रा फाल की वजह से . होटल में बहुत ज्यादा मेहमान नहीं थे . वैसे भी ये सैलानियो के आने का सीजन नहीं था . होटल के पीछे एक नदी थी जो पूरी तरह जम  चुकी थी।

सत्तर वर्षीय अमृता अलाव के और नजदीक होकर बैठ गयी . धर्मवीर भारती का उपन्यास पढने की कोशिश कर रही थी. कोशिश इस लिए की खिड़की के बाहर तो दिन में भी अँधेरा था . लॉबी की रौशनी मध्यम थी. कुछ न करने से ये कोशिश करना ही ठीक लग रहा था . दरअसल इस सीजन में ये भी पता नहीं चलता कि कब शाम हुई , कब रात और फिर कब दिन ! अमृता सोच रही थी - सैलानियों के लिए ये सीजन शायद सही नहीं था ,  लेकिन उसके जैसे  अन्तर्मुखी एकाकी जीवन चाहने वाले लोगों के लिए यह जगह और ये ऋतु - दोनों ही बहुत अच्छी थी।

तभी एक बुजुर्ग व्यक्ति थोडा लंगड़ाते लंगड़ाते अलाव के पास आये . पूछा - इफ यु डोंट माइंड , कैन आई सिट हियर ?

अमृता ने उनकी और देखा . लम्बा कद , सफ़ेद भरपूर दाढ़ी , आँखों पर पावर वाला चश्मा, उम्र पचहत्तर से कम नहीं होगी . अमृता ने जवाब दिया - "ऑफ़ कोर्स , इट इज सो कोल्ड टुडे ."
बुजुर्ग ने अपना ओवर कोट और हैट उतार कर पास ही लगे एक स्टैंड पर टांग दिए . और एक कुर्सी अलाव के पास खींच कर बैठ गया .

अमृता ने बुजुर्ग के चेहरे की और देखा और कहा - आर यु एन इंडियन ?

बुजुर्ग ने कहा - जी हाँ , मैं तो समझ ही गया था , आप के हाथ में ये किताब देख कर . धर्मवीर भारतीजी का कौन सा उपन्यास है ?

अमृता ने कहा - गुनाहों का देवता। 

बुजुर्ग ने कहा - क्या मैं देख सकता हूँ ?

" हाँ हाँ क्यों नहीं " - यह कह कर अमृता ने पुस्तक उनकी और बढ़ा दी. बुजुर्ग ने पलट के कुछ पन्ने पढ़े . फिर लौट के दूसरे पन्ने पर आ गए . कहा - "चंदर और सुधा की  ये कहानी जितनी बार भी पढ़ो कितनी अपनी सी लगती है। "

" तो आपका नाम है अमृता गुजराल . कहाँ की हैं आप ?"

" मैं हूँ , रोहतक की ." अमृता ने कहा . फिर  पूछा - "आप कहाँ से हैं ?"

" जी मैं ............अब यहीं का समझिये. इसी होटल का मनेजर हूँ. "

" बहुत सुन्दर है आपका ये होटल . कब से हैं यहाँ ?"

" पचास साल से ज्यादा हो गए ." - बुजुर्ग ने उत्तर दिया .

" फिर तो आप पूरे अमरीकन ही हो चुके ?................. क्या आपका परिवार भी यहाँ रहता है ?" अमृता ने पूछा.

" अब कोई नहीं है . पिताजी का देहांत मेरे बचपन में हो चुका था. माँ  साथ रहती थी लेकिन बारह साल पहले वो भी चल बसी ." बुजुर्ग ने बताया . फिर पूछा - " और आप का परिवार ?"

" मैंने शादी नहीं की . लिखने पढने का शौक है , उसी में जीवन बीत रहा है ." अमृता ने बताया .

बुजुर्ग बोले- "अजीब बात है , भारत में लड़कियां इस तरह कुंवारी नहीं रहती . फिर आपने ..................., सॉरी , पर्सनल बातें हैं , चाहें तो न बताएं ."

अमृता ने उत्तर दिया - " जीवन के इस पड़ाव पर कुछ भी ऐसा नहीं होता जो बताया न जा सके, और एक लेखिका के पास अपने जीवन के अनुभवों के अलावा कुछ नहीं होता , जिसे वो लोगों से शेयर कर सके. बस मैंने शादी नहीं की ."

" क्या कोई लड़का पसंद नहीं आया ? ....लेकिन ऐसा नहीं हो सकता - क्योंकि आपकी किताब में ही लिखा है - प्रिय अमृता को मधुर यादों के साथ - पंचम रल्हन . क्या हुआ रल्हन साहब का ?" बुजुर्ग ने जरा मजा लेके पूछा .

अमृता शरमा गयी और बोली- "अरे ऐसी कोई बात नहीं थी . पंचम को मेरे माता पिता ने पसंद किया था मेरे लिए . हमारी मुलाकात हुई . बल्कि एक सप्ताह वो रोहतक में रहे . मुझे पसंद आने लगे थे .ये किताब भी उन्होंने उस छोटी सी कोर्टशिप के दौरान मुझे भेंट की. "

बुजुर्ग ने कहा - " वाह, देखो उगलवा लिया न आपसे आपके दिल का राज . लेकिन जब वो मिस्टर पंचम आपको पसंद आ गए थे तो आपने उनसे शादी क्यों नहीं की ? ............देखिये अगर आप न चाहें तो इस बात का उत्तर न दें. "

अमृता ने कहा - " बहुत बड़ी लव स्टोरी की उम्मीद न रखें . हुआ ये कि पंचम कहीं विदेश में नौकरी करते थे . हमसे कह कर गए कि नौकरी से एक महीने की  छुट्टी लेकर आयेंगे शादी करने , और फिर हमें भी ले जायेंगे . लेकिन हमारी लव स्टोरी पर यहीं फुल स्टॉप लग गया . उस भले आदमी ने जाकर न कोई ख़त लिखा न लौट कर आया . कुछ महीनों बाद मेरे मां बाप ने कहा कि उसकी तरफ से ना आ गयी थी . हाँ ये मलाल जरूर रहा कि अगर उसे ना ही कहनी थी तो मुझे ही कह जाता . झूठे वादों की क्या जरूरत थी ."

" ये तो बुरा हुआ आपके साथ !  ऐसा नहीं करना चाहिए था उस व्यक्ति को आपके साथ ." बुजुर्ग व्यक्ति ने अफ़सोस जाहिर किया .

अमृता को इस बातचीत में मजा आने लगा था . उसने पूछ ही लिया - "मेरी कहानी तो आपने पूरी निकाल ली , कुछ अपनी बताइए . आपने क्यों नहीं की शादी ? "

बुजुर्ग ने हलकी सी मुस्कान के साथ कहा - " मेरी कहानी तो तुम से भी ज्यादा बकवास है . अमरीका में रहने वाले भारतीयों को शादी करने के लिए भारत जाना पड़ता है . कुछ दिनों के सफ़र में जिनसे मिल पाते हैं उनमे से एक चुननी होती है................"

"और आप को अपनी पसंद की कोई मिली नहीं ? क्यों यही न ?" अमृता ने चुटकी ली .

हँसते हुए उसने उत्तर दिया - " नहीं इतनी ज्यादा बुरी भी नहीं अपनी कहानी . एक पसंद आ गयी . उस समय मैंने सोचा कि मैं भी उसे पसंद आ गया . मेरी मां ने दो महीने बाद की तारीख भी तय कर ली थी . लेकिन इस बीच एक दुर्घटना हो गयी. एक रोड एक्सिडेंट में मेरा बायाँ पैर इतना जख्मी हो गया कि घुटने से नीचे का हिस्सा काटना पड़ा . चोंकिये मत मेरा बायाँ पैर लकड़ी का है . "

अमृता ने अफ़सोस के साथ पूछा - " ओह, ये तो बहुत बुरा हुआ आपके साथ. क्या उस लड़की ने इंकार कर दिया ? "

" पता नहीं . लेकिन मैंने सारी बात एक ख़त में लिख कर उस लड़की के माता पिता को बता दी थी .मैंने लिख दिया था कि इस हादसे के कारण उन पर कोई दबाव नहीं है . मैंने ये भी लिख दिया था कि अगर वो उचित समझे तो अपनी बेटी की  राय ले लें. माता पिता से तो उम्मीद नहीं थी लेकिन मुझे ऐसा लगा था कि वो लड़की शायद सब कुछ हो जाने के बाद भी मुझे स्वीकार कर लेगी." बुजुर्ग ने जरा दर्द भरी आवाज में कहा .

अमृता ने फिर अफ़सोस जाहिर किया - " बड़ा मुश्किल फैसला रहा होगा बेचारी के लिए ? अगर उसने ना किया हो तो भी आपको बुरा नहीं मानना चाहिए ."

" मैंने बिलकुल बुरा नहीं माना , हाँ एक बात की हूक रह गयी . उसने अपने पिता के माध्यम से अपनी ना का समाचार दिया . अगर एक बार बात कर के कह देती तो शायद जीवन की  सच्चाई को स्वीकार कर पाना और सहज हो जाता . लेकिन शायद ऐसी सच्चाई अपने मुह से बोल पाना आसान नहीं होता ." बुजुर्ग ने कहा .

"हम सब अपने अपने जीवन में कोई ना कोई चोट खाए होते हैं . अच्छा लगता है जब किसी से ये बातें शेयर कर पातें हैं . बहुत अच्छा लगा आपसे मिलकर." अमृता ने कहा .

बुजुर्ग ने उठने की मुद्रा में कहा -" मुझे भी बहुत अच्छा लगा आपसे बात करके . जीवन के इस मोड़ पर भी किसी का साथ कितना अच्छा लगता है . आप चाहें तो आज डिनर आप मेरे साथ ले सकती हैं ."

" क्यों नहीं ? वर्ना अकेले तो शायद मेरी डिनर लेने की नौबत ही ना आये ." हँसते हुए अमृता ने उत्तर दिया .

बुजुर्ग अपना ओवर कोट  पहन चुके थे - " तो फिर ठीक है शाम के सात बजे रेस्तौरेंट में मिलते हैं "
बुजुर्ग सज्जन अपने दफ्तर की और कदम बढ़ाते हैं , तभी पीछे से अमृता की आवाज आयी - " अरे मैंने आपका नाम तो पूछा ही नहीं ? "

बुजुर्ग पलटे थोडा मुस्कुराये और बोले - " पंचम रल्हन "

अमृता देखती रह गयी .जीवन के वो सबसे अच्छे सात दिन दिमाग में कौंध गए।