नील स्वर्ग

नील स्वर्ग
प्रकृति हर रंग में खूबसूरत होती है , हरी, पीली , लाल या फिर नीली

Saturday, July 4, 2026

 

संयुक्त परिवार - एक कथा

 


पहले हमारे परिवार बहुत बड़े होते थे।  चाचा ताऊओं के परिवार इकट्ठा रहते थे।  सभी के बच्चे आपस में भाई बहन और दोस्त बन कर रहते थे।  ताऊ बन जाते थे बड़े पापा , और चाचा होते थे छोटे पापा।  पापा तो पापा थे ही।  दादा दादी पूरे परिवार के सिरमौर होते थे।  कोई बड़ा निर्णय उनकी अध्यक्षता के बिना नहीं लिया जाता था।  नयी दुकान खरीदना , घर का रंग रोगन , बड़े को इंजीनियरिंग के लिए दूसरे शहर भेजना , छोटे को गर्मी की छुट्टियों में स्कूल के ग्रुप टूर में भेजना , बिटिया के लिए सम्बन्ध ढूंढ़ना आदि निर्णय ऐसे ही लिए जाते थे।  कई बार कुछ निर्णय किसी के लिए अप्रिय भी होते , तो भी क्षण भर की प्रतिक्रिया के बाद सभी को सब कुछ मान्य हो जाता।  आज कहाँ गया वो संयुक्त परिवार ?

 

संयुक्त परिवार तभी तक संयुक्त रहता है , जब तक सबका दुःख और सबका सुख साझा होता है।  घर की सारी  दौलत साझी होती है।  जब कोई भी व्यक्ति अपना कुछ व्यक्तिगत बना लेता है , तो वहीं से दरार पड़नी शुरू हो जाती है।  स्वार्थ एक संक्रामक रोग की भांति घर में व्याप्त होता चला जाता है।  हर व्यक्ति अपने स्वार्थ को दूसरे  के उदाहरण से सही बताता है।  जब सबकी जमा पूंजी अपनी बनने लगती है , तब उसके बाद अगला नंबर आता है , संयुक्त जिम्मेवारियों का। हर व्यक्ति हर जिम्मेवारी को दूसरे पर डालने की कोशिश करता है।  ख़ास कर जहाँ कोई बड़ा खर्च आता है , तो सभी पल्ला झाड़ने लगते हैं।  फिर वही तर्क - हमारे समय में हमें कौन देने वाला है !

 

अगला विभाजन बच्चों में शुरू होता है।  मेरे बच्चे तो अच्छे अंग्रेजी स्कूल में पढ़ेंगे।  खर्चा हम खुद दे देंगे।  ताई जी घोषणा कर देती है , की उनका बिट्टू विदेश में पढ़ने जाना चाहता है।  अब कोई कैसे रोक सकता है ! पैसे का सवाल तो साझे खाते में खड़ा होता है।  बेटियों के विवाह में होने वाले खर्च बँट  जाते हैं। घर में १-२ की जगह ४-५ गाड़ियां आ जाती है।  ड्राइंग रूम के टेलीविजन की जगह सबके कमरों में अपना अपना टेलेविज़न आ जाता है।  रसोई भी एक नहीं रह पाती।  सबको अपनी अपनी पसंद के व्यंजन चाहिए।  चाची कहती है , मेरे बच्चे तो अंडा खाना चाहते हैं।  बस इस आधार पर उनका एक नया रसोई घर बन जाता है।  शुरू में इसे व्यक्तिगत पैंट्री कहा जाता है ; लेकिन धीरे धीरे वो व्यक्तिगत रसोई का रूप ले लेता है।  अब सबको चाहिए ऐसी व्यवस्था !

 

इस पूरे बिखराव का सबसे बड़ा शिकार होते हैं - घर के बुजुर्ग दादा दादी ! वो तो जीवन के संध्याकाल में परिवार के सौहार्द का आनंद ले रहे थे , लेकिन धीरे धीरे उनकी पैरों के नीचे से धरती कब खिसक जाती है , उन्हें पता ही नहीं चलता।  सबके भोजन अलग बन रहें हैं , ऐसे में  वो असहाय होकर प्रतीक्षा करते हैं अपने भोजन की।  जो बेटे शाम को दफ्तर से लौटकर उनके पास १-२ घंटे बिताते थे , वो अब थकान का बहाना बना कर सीधे अपने कमरे की तरफ बढ़ जाते हैं।  चाय उनके कमरे में ही चली जाती है।  कोई ये नहीं पूछता की घर के बुजुर्गों को क्या चाहिए।  बच्चे भी अब रामायण महाभारत की कहानियां सुनने नहीं आते।  दौड़ते दौड़ते कमरे में आते हैं और गुड मॉर्निंग , गुड नाईट बोलकर भाग जाते हैं। 

 

दादाजी को दिखाई कम देता है ; दादीजी को सुनाई कम देता है।  इसलिए उनके कमरे में टेलीविजन की क्या जरूरत !  लेकिन जो उनकी जरूरत है उसका क्या ? उनकी जरूरत है समय पर भोजन , दवायें , जरूरत के अनुसार डॉक्टर से मुलाकात , विशेष अवसरों पर मंदिर जाने का मन , और हाथ में थोड़े बहुत रुपये , जो वो बच्चों को जन्मदिन के उपहार के रूप में हाथ में पकड़ा देते। और सबसे बड़ी जरूरत होती हैं , उनके परिवार जनों का समय ; जो घटते घटते विलुप्त प्रायः हो जाता है।     जिन्होंने अपने जीवन के सारे साल , सारी  कमाई , सारा प्यार - अपने इस भरे पूरे परिवार पर लुटा दिया ,  वही अब खाली  हाथ , दुखी मन और बेबस निगाहों से अपनों की राह तकते हैं। 

 

और अंतिम कुठाराघात ! बेटों ने मिलकर निर्णय ले लिया , इस बड़े से घर को बेच कर तीन छोटे फ्लैट खरीद लेने चाहिए।  किसी ने उनसे सलाह नहीं ली।  उनसे उनकी मन की इच्छा नहीं पूछी। बस  फ़रमान जारी कर दिया।  उस रात ऐसा कार्यक्रम बना की पूरा परिवार एक साथ डाइनिंग टेबल पर दादा जी और दादीजी के साथ भोजन करेगा।  दादाजी की पसंद का भरवा करेला , और दादी की पसंद की पकोड़ियों वाली कढ़ी बनाई गयी। बच्चे भी प्यार से दादा दादी बोल कर उनकी गोद  में आ बैठे। 

 

भोजन के बाद मीठी खीर खाते  समय बड़े पापा ने पूरी बात बताई।  पहले तो सबके बढ़ते परिवार और बड़े होते बच्चों की समस्या बताई।  सबको अपना प्राइवेट स्पेस चाहिए - ये बताया।  फिर बताया की दूर दूर रहने से प्रेम ज्यादा बढ़ता है।  इन सारी  बातों पर गौर करके उन्होंने ये फैसला लिया है की इस घर को बेच कर आने वाली धन राशि के तीन भाग कर दिए जायें।  तीनों बेटे अपने अपने हिस्से के धन से अपना एक फ्लैट खरीद लें।  थोड़ा हिचक कर बड़े पापा बोले - इस व्यवस्था में आपका भी समुचित ध्यान रखा गया है।  आप जिस बेटे के साथ रहना चाहें , उस बेटे को बाकी दो भाई अपने हिस्से से थोड़ा धन दे देंगे , जिससे वो अपने फ्लैट में एक कमरा आपका भी रखें। 

 

खिसियानी सी मुस्कराहट के साथ बड़े ने कहा - क्यों ठीक है न पापा जी !

बाकी दोनों भाइयों ने हाँ में हाँ मिलाई - हाँ पापा , बहुत सूझ बूझ के साथ भैया ने ये रास्ता निकाला है। 

 

दादाजी ने खीर का प्याला पहले ही नीचे रख दिया था।  खड़े होकर बोले - दो दिन का समय दे दो।  सोच विचार कर बताऊँगा। 

तीनों भाइयों को दादाजी का ये उत्तर अच्छा नहीं लगा।  बहुओं के चेहरे से तो नाराजगी टपकने लगी थी।  बड़े भैया ने स्थिति संभाली - क्यों नहीं पिताजी , आपकी सम्पति है , आप पूरा सोच विचार कर लीजिये।  सबकी आपस में खुसुर पुसुर चल रही थी। 

 

दो दिनों बाद दादाजी ने तीनों बेटों और तीनों बहुओं को शाम के ५ बजे अपने कमरे में बुलाया।  बुलाकर कहा - मैंने तुम्हारी समस्याओं पर पूरा विचार किया।  सभी सही कहते हो। दुःख इस बात का है तुम लोगों ने हमारी समस्या पर कोई विचार नहीं किया।  तुम सब के साथ रहते हुए भी हम एक वृद्धाश्रम की तरह रह रहें हैं , तुम सब अलग अलग रहोगे , तो फिर कोई हमारी तरफ झाँक के भी नहीं देखेगा। 

 

बड़े  ने गंभीर आवाज में कहा - तो आपने क्या फैसला किया पापा जी। 

 

दादाजी बोले मेरा फैसला अभी आता ही होगा।  तभी दरवाजे की घंटी बजी।  दादाजी के परम मित्र अधिवक्ता ब्रिज मोहन पधारे। 

 

दादाजी बोले - बृजमोहन मेरा कागज लाये हों क्या ?

 

बृजमोहन ने हामी भरते हुए एक फाइल दादाजी को दे दी।  दादाजी ने पहले उसे पढ़ा , फिर उसपर अपना तथा दादीजी का साइन कर दिया। 

 

दादाजी उस कागज़ को देखते हुए बोले - मेरी सम्पति ये मकान है।  मैंने बृजमोहन की निगरानी में तुम लोगों को इस सम्पति को बेचने के लिया कहा है।  जितना पैसा आएगा , उसके पांच हिस्से होंगे।  चार हिस्सों से चार बराबर के फ्लैट ख़रीदे जाएंगे।  पांचवां हिस्सा तुम्हारी माँ और मेरे नाम की एफडी में निवेश किया जाएगा।  उसका मासिक ब्याज हमारे जॉइंट खाते में आता रहेगा , जिससे हमारा अपना जीवन चल सके।  तुम सब को एक एक फ्लैट मिलेगा और एक फ्लैट मुझे और तुम्हारी माँ को मिलेगा।  तुम्हारे पास तुम्हारी आमदनी के साधन हैं , उससे तुम अपना निर्वाह करोगे। 

 

हमारी मृत्यु के बाद हमारे फ्लैट का निर्णय हम करेंगे , तुम सब के व्यवहार के अनुरूप।  तुम्हारी कोई बाध्यता नहीं है , की तुम लोग हमसे कभी मिलने आओ, या हमारी देख भाल करो। 

 

मेरा ये फैसला मेरी उम्र के सभी माता पिता को भी राह दिखायेगा।  हमारे बच्चे हमारे अपने होते हैं।  हमारा सब कुछ उनके लिए ही होता है ; लेकिन ये सब सही है , जब की हमारे बच्चे भी हमें हमेशा अपना  समझें। हमारी ममता हमारे बच्चों के लिए सच्ची होती है , लेकिन जीवन की सच्चाई  ये भी है , कि ममता के प्रवाह में बिलकुल कंगाल होकर आप नहीं बैठें।  

Thursday, October 6, 2022

बौखलाहट !


कल शिवाजी पार्क में उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना ने दशहरा मनाया। शिवाजी पार्क और दशहरा तो हर साल की तरह ही था ; लेकिन उद्धव ठाकरे की परिस्थतियाँ  बदली हुई थी।  उनका सारा भाषण केंद्रित था , एकनाथ शिंदे और उनके शिव सेना से निकले सभी बाग़ी विधायकों के विरुद्ध ! अगर एक शब्द में इस भाषण का कोई  शीर्षक देना हो तो मैं दूँगा बौखलाहट !

रावण की जगह उन्हें एकनाथ शिंदे नजर आ रहा था। रावण के दस सिरों की जगह शिंदे के ४० विधायकों के सर नजर आ रहे थे। उन्हें शिंदे का बागपन तो नजर आ रहा था , लेकिन उन्होंने जो चुनाव में जीतने के बाद बीजेपी के साथ किया , वो नजर नहीं आ रहा था। सारे हिंदुत्व को छोड़ वो जा मिले अवसरवादी शक्तियों ले साथ , जहाँ सेक्युलर के नाम पर पालघर में साधुओं की हत्या किये जाने पर भी मौन था। 

सबसे घटिया बात थी , बाला साहेब ठाकरे को अपनी बपौती बताना ! बाला साहेब बाप तो जरूर थे उद्धव के , लेकिन बपौती नहीं ! जिस व्यक्ति को हमेशा हिन्दू ह्रदय सम्राट कहा जाता हो , वो एक व्यक्ति की बपौती कैसे हो सकता है ? ये तो कुछ ऐसा हुआ जैसे की महात्मा  गांधी के बेटे पूरे देश द्वारा उन्हें बापू कहे जाने पर ऐतराज करें ! रही सही कसर निकल गयी जब आधा ठाकरे परिवार नजर आया कल ही शाम को एकनाथ शिंदे के मंच पर , जहाँ वो भी अपनी दशहरा रैली निकल रहे थे ; एक अभूतपूर्व समूह  के समक्ष !


न मेरा व्यक्तिगत विरोध है उद्धव से और न ही विशेष लगाव है एकनाथ से ; लेकिन राजनीति में बौखलाहट के लिए कोई जगह नहीं होती। 

बहुत से मित्रों के फ़ोन आते रहते हैं ; उन्हें शिकायत है की आजकल ब्लॉग पर कुछ लिख क्यों नहीं रहे ? शिकायत दुरुस्त है। जब मैं अपने मन में कारण ढूंढता हूँ , तो मुझे बस एक ही कारण नजर आता है। वो कारण  है देश का माहौल।

नरेंद्र मोदी जैसा व्यक्ति हमें प्रधानमंत्री के रूप में मिला , देश की अपेक्षाएं बढ़ी। उन अपेक्षाओं को पूरा करने में मोदी ने अपना दिन रात एक कर दिया। दुनिया उनको एक विशेष सन्मान के साथ देख रही है। जितना काम उन्होंने अपने इस डेढ़ साल के कार्यकाल में किया है , मुझे नहीं लगता पिछली किसी प्रधानमंत्री ने इतना काम किया हो। एक ऐसा व्यक्ति जिसके भाषणों में हमेशा देश प्रेम की खुशबू आती है ; जो व्यक्ति हमेशा देश के १२२ करोड़ भारतीयों के लिए काम करता है , और जो व्यक्ति अमन के लिए बड़े से बड़ा जोखिम उठा कर एक फोन पर दिए गए निमंत्रण को स्वीकार कर दुश्मन देश पाकिस्तान चला जाता है - क्या बराबरी करेगा उसका कोई दूसरा प्रधामंत्री !

लेकिन वाह  रे भारत ! जिस व्यक्ति को देश ने पूर्ण बहुमत से अपना नेता चुना उन्हें ये स्वार्थ का चश्मा चढ़ाये हुए विरोधी दल चौबीस घंटे बदनाम करने पर तुले हैं। बेमतलब की बातों पर उन्हें प्रधानमंत्री का बयान  चाहिए।  राज्य स्तर पर हुए अपराधों पर उन्हें प्रधानमंत्री का इस्तीफ़ा चाहिए। इनका बस चलता तो वो मोदी की पाकिस्तानी दौरे को राष्ट्र विरोधी कार्यवाही घोषित कर देते ; लेकिन जिस ढंग से विश्व ने इस साहसिक कार्य को सराहा उसे देख कर दबी जुबान में बोलती रह गयी कांग्रेस।

देश की सबसे निकम्मी दिल्ली सरकार बात बात पर केंद्र सरकार को उल्टा सीधा कहती रहती है।  अपनी नाकामियों को छुपाने का के लिए केंद्र सरकार की आलोचना को अपना हथियार बनाया है आप ने।

बिहार के चुनाव को मापदंड बना लिया मोदी की सफलता और विफलता का। बिहार की हार मोदी की विफलता नहीं , बल्कि बिहार के मतदातों की विफलता है। उन्हें कोईबुराई नजर नहीं आती लालू जैसे अपराधियों  को अपना  सर्वेसर्वा बनाने में। उन्हें जरा भी विचित्र नहीं लगता जब लालूजी के दो अनुभवहीन बेटों को सरकार में उच्च पदों पर थोप दिया जाता है। नितीश की बोलती बंद है , क्योंकि अपने पुराने बड़बोलेपन के कारण उन्हें मोदी की जगह लालू को अपना भागिदार बनाना पड़ा।

ममता की तृणमूल कांग्रेस जूझ रही है अपने ही मंत्रियों के कारनामों से। दीदी ने अजीब लोगों का समूह पाल रखा है। एनसीपी किंकर्तव्यविमूढ़ है ; कहीं न कहीं उनके अंदर आशाएं है की शायद उन्हें बीजेपी अपने साथ ले ले।

देश में किसी मुस्लमान के साथ कुछ बुरा हो जाए तो सारे सेक्युलर वादी नाचने लगते हैं , और बिना किसी कारन के मोदी जी जिम्मेवार हो जाते हैं ; लेकिन हजारों हिन्दू लड़कियों का बलात्कार और हत्या हो जाए उनके लिए किसी का मुंह नहीं खुलता। एक दलित छात्र ने आत्महत्या कर ली तो सारी केंद्र सरकार जिम्मेवार हो गयी , लेकिन आई एस आई से जुड़े दर्जनों आतंकवादी पकडे गए तो सबकी बोलती बंद। कहाँ  चला जाता है ये सेक्युलर वाद का नाटक।

मिडिया भी चिताओं की अग्नि पर पूरियां सेक रही है। हत्या मार काट के वीडियो दिन भर में सैंकड़ों बार दिखाए जाते हैं ; फिर एक कहानी शुरू कर दी जाती है

Thursday, May 25, 2017

पीपल , गंगा और गाय


पीपल , गंगा और गाय

कई बार मन में आता है ; क्यों महत्व है इन सब का हिन्दुओं के जीवन में ! यूँ तो महत्व बहुत सारी  वस्तुओं का है , लेकिन क्यों कुछ वस्तुओं या जीवों का विशेष महत्व है ? इस चिंतन में मन में एक बात आयी। हम जीवन पर्यन्त संसार की जिस सामग्री का उपयोग करते हैं , उनका हम किसी न किसी रूप में मूल्य चुकाते हैं।  मसलन हमने एक ग्वाले से दूध खरीदा तो उसे दूध का मूल्य दिया , जिससे वो अपनी गायों के लिए चारे की व्यवस्था करता है।  यानी अपरोक्ष रूप से हमने गाय को उसके दूध का पूरा नहीं तो आंशिक मूल्य चुकाया। अगर हम अपने बाग़ से फल तोड़ कर कहते हैं , तो हम उस बाग़ की रख रखाव का दायित्व निभाते हैं।


लेकिन मृत्यु के बाद क्या ? विदेशों में आजकल एक नयी व्यवस्था निकली हुई है। ऐसी ऐसी कम्पनियाँ खुल गयी हैं , जो एक ऐसी सेवा बेचती है , जिसका उपयोग खरीदने वाला व्यक्ति मरणोपरांत ही कर पाता है। वह सेवा है मनचाहा अंतिम संस्कार ! ये कम्पनियाँ अपने ग्राहक से पूछती हैं - १. किस कब्रिस्तान में उसे दफनाया जाय। २. उसकी कब्र कैसी हो ? ३. क्या उस कब्र पर कोई मकबरा बनाया जाय ? ४. उसके शव को कैसा सूट और टाई पहनाई जाए। ५. उसका ताबूत कैसा बनाया जाय।६. उसकी शोक सभा के लिए किस किस को बुलाया जाय। इत्यादि।  हर वस्तु की फोटो दिखाकर उसका मॉडल नंबर लिख कर कॉन्ट्रैक्ट तैयार कर लिया जाता है। उन सेवाओं का जो भी मूल्य होता है वो उस व्यक्ति को कॉन्ट्रैक्ट बनने के समय चुकाना होता है।  सम्भवतः कोई व्यक्ति इन सब चीजों के भविष्य में सुचारु और इच्छानुसार किये जाने के लिए गवाह भी नियुक्त होता होगा।

भारत के परिपेक्ष्य में अगर हम सोचें तो इस हद की मानसिकता हमारे देश में नहीं है ; क्योंकि हम परिवारवादी लोग हैं। बेटे कितने भी नालायक क्यों न हों , मरणोपरांत रीति रिवाज जग दिखावे के लिए ढंग से पूरे करते हैं।  लेकिन सवाल रीति रिवाज का नहीं है।  सवाल है , उस कर्ज का जो हमारे शव के साथ जुड़ा है। आर्य समाज की अंतिम संस्कार पद्धति के अनुसार एक सामान्य मनुष्य के शव के दाह कर्म के लिए १० मन (३७३ किलो) लकड़ी और ४ मन (१५० किलो घी ) की आवश्यकता होती है। शव के पूरी तरह जल जाने के बाद उसकी अस्थियां गंगा या किसी अन्य नदी में बहा दी जाती है।

इस प्रकार हमारे ऊपर मृत्योपरांत तीन कर्ज होते हैं - पेड़ का कर्ज , गाय का कर्ज और गंगा (नदी) का कर्ज। हर व्यक्ति को ये कर्ज अपने जीवन काल में अग्रिम भुगतान के रूप में चुका देने चाहिए।

१. जीवन में एक पेड़ अवश्य लगाएं।

२. एक गाय को जीवन पर्यन्त पालने की व्यवस्था करें।

३. नदियों को दूषित न करें। और आज के समय में तो हम प्रधान मंत्री मोदी के गंगा सफाई अभियान में भी भाग ले सकते हैं।

जीवन के ये चिंतन हमें प्रेरित करते हैं समाज , देश और प्रकृति के प्रति अपने दायित्व का वहन करने की !

Saturday, April 22, 2017

इति विपक्ष एकता प्रकरणम

विपक्षी दलों की एकता

आपने भी पढ़ा होगा की दो दिन पहले नितीश कुमार  श्रीमती सोनिया गाँधी से मिलने गए । मुद्दा था - राष्ट्रपति चुनाव में पूरा विपक्ष एक होकर अपना उम्मीदवार उतारे। सब कुछ तो मीडिया को भी पता नहीं होता। ये रही अंदर की बात -

नितीश - सोनिया जी , आज मैं एक खास मुद्दे पर आपसे बातचीत करने आया हूँ ; मेरा प्रस्ताव है की हम सभी विपक्ष के लोग एकजुट होकर राष्ट्रपति पद का एक उम्मीदवार चुने और मोदी जी के कैंडिडेट को हरा कर उनका घमंड चकनाचूर करें।
सोनिया - आपका विचार अच्छा है , लेकिन क्या मेरे को कैंडिडेट बनाने से मेरा फोरेन रूट का प्रॉब्लम नहीं आएगा ?
नितीश - बिलकुल आएगा , वर्ना आपसे अच्छा कैंडिडेट कौन होता ! वैसे लालूजी भी बहुत इंटरेस्टेड हैं , लेकिन उनको सबका समर्थन नहीं मिलेगा।  मेरे बारे में आपका क्या ख्याल है ? लोग मुझको पसंद करते हैं।

( तभी लालू का प्रवेश )
लालू - क्यों नितीश भाई , आपने चर्चा कर ली हमारे नाम की ?
नितीश - (फुसफुसा कर ) - मैडम ने ना कर दिया है।
लालू - क्यों मैडम ? जब भी कांग्रेस पर संकट पड़ा है , हमने आपका साथ दिया है।
सोनिया - संकट भी तो आपके कारण पड़ा है !

( अखिलेश का प्रवेश )
अखिलेश - सब को पिताजी की तरफ से नमस्ते !
लालू - और तुम्हारी तरफ से ?
अखिलेश - अंकल , हमारी नमस्ते कौन सुनता है ? यू पी  के चुनाव के बाद से ही हम दोनों नौजवानो के सितारे गर्दिश  में है।
सोनिया - तुमने राहुल को बिना मतलब फँसाया !
अखिलेश - आंटी , जाने दें , किसको किसने फँसाया। फिलहाल मैं एक दरख्वास्त लेकर आया हूँ। जब से हम यू पी चुनाव हारे हैं , पिताजी बौखला गये हैं। हारने का कारण मुझे बताते हैं ; जबकि सच्चाई ये है कि मेरे कारण उनकी इज्जत बच गयी ; वर्ना मुख्यमंत्री वो भी होते तो हारना निश्चित था। जहाँ तहाँ मेरे बारे में उल्टा सुलटा बकते हैं। उनके साथ बैठकर शिवपाल अंकल उन्हें भड़काते हैं।
लालू - भैया , ये तो तुम्हारा आतंरिक मामला है तुम्ही निपटो। ऐसे सभा सोसाइटी में समधी जी की टोपी मत उछालो।
अखिलेश - अरे नहीं लालू अंकल , हम तो बस ये अनुरोध लेकर आये हैं , की  आप सब मिलकर उनको राष्ट्रपति का कैंडिडेट बना दो , तो हमारी जान छूट जाये।
सोनिया - इम्पॉसिबल ! मुलायम वाज  वैरी हार्ड ऑन  राहुल। उसने कांग्रेस के  बारे भी  ग़लत बोलै।

( सीताराम येचुरी का प्रवेश )

सीताराम - कम्युनिस्ट पार्टी का कैंडिडेट बनूँगा मैं। कम्युनिस्ट पार्टी ने कभी कोई पद नहीं माँगा।  बल्कि ज्योति बाबू को प्रधानमन्त्री  बनने से भी रोका।  हमेशा आप लोगों का साथ दिया।  हमारा पोलितब्यूरो ने फैसला किया है ,  कि देश का राष्ट्रपति मुझे बनाया जाय।

(अचानक ममता का प्रवेश )

ममता - अच्छा अब गुण्डो की पार्टी को भी राष्ट्रपति बनना है।  तुमलोगों ने पश्चिम बंगाल को बरबाद कर दिया , अब क्या हिंदुस्तान को बर्बाद करोगे।

(मायावती का प्रवेश )

मायावती - कभी तो दलितों की महिला को भी चांस दो ! मैंने फैसला किया है,  कि अब मैं यूपी की चुनावी राजनीति से सन्यास ले लूँ।
अखिलेश - अरे बुआ , सन्यास तो तुम्हे मोदी जी ने दिला दिया। तुम अपने  भतीजे को गलियाती रह गयी , वो हम दोनों की बजा के चला गया।

तभी सम्बित पात्रा का प्रवेश -

संबित - मुझे मोदीजी ने एक सन्देश देकर भेजा है , की इस बार हमलोग एक नयी मिसाल पेश करेंगे।  हमलोग इस बार किसी विरोधी पार्टी के किसी समझदार वरिष्ठ  नेता को राष्ट्रपति  उम्मीदवार बनाएंगे।  अगर आप लोगों ने कोई उम्मीदवार चुन लिया हो तो उन्हें खबर कर देना।

ऐसा सुनते ही सारे नेता भाग लिए सभा से।  अपनी चिर परिचित कुटिल मुस्कान के साथ संबित्त भी वहां से निकल लिए।
                                          
इति विपक्ष एकता प्रकरणम