नील स्वर्ग

नील स्वर्ग
प्रकृति हर रंग में खूबसूरत होती है , हरी, पीली , लाल या फिर नीली

Tuesday, March 8, 2016

कन्हैया और अनुपम

 कन्हैया और अनुपम ! व्यंजन और स्वर - दोनों प्रकार के अक्षरों का  प्रथम अक्षर - क और अ ! किसी शब्द के पहले क या क की कोई मात्रा  दीजिये , तो बन  जाता है एक अपशब्द - जैसे कुरूप , कुशासन , कुदृष्टि और क की जगह अ लगा दें तो बन जाता है अति सुन्दर जैसे की - अद्वितीय , अप्रतिम, अनुपम ! खैर ये तो थी एक अलंकारात्मक तुलना ; लेकिन दोनों की तुलना भी कुछ इसी प्रकार की बैठती है।

कन्हैया बिहार के  गाँव से आकर जेएनयु में पढ़ने के लिए दाखिला लेता है , लेकिन कैंपस की राजनीति में हिस्सा लेकर बन जाता है छात्र नेता। देश की खैरात के ऊपर चलने वाले जे ऍन यु में देश को ही गालियां देने वाले लोगों सरगना बन जाता है।

अनुपम उन कश्मीरी पंडितों का प्रतिनिधि है , जिन्हे कश्मीर से रातों रात विस्थापित कर दिया गया था। अनुपम ने अपने जीवन में संघर्ष किया और अपने लिए एक स्थान बनाया भारत के चलचित्र जगत में।

कन्हैया अंग बन जाता है उस सोच  का जो देश को बर्बाद कर देना चाहती है। वो गुट  जो अफजल गुरु और मकबूल बट्ट जैसे देश द्रोहियों को अपना आदर्श मानता है। अफजल गुरु की शहादत को मनाने के लिए वाईस चांसलर पर दबाव डालता है। देशद्रोहियों के साथ मिल कर नारे लगाता है -' भारत की बर्बादी तक जंग चलेगी ', 'अफजल हम शर्मिंदा है , तेरे कातिल जिन्दा है '. इतना ही नहीं इस देश से आजादी के नारे लगाता  है। ये अलग बात है , की जब पुलिस द्वारा पकड़ लिया जाता है तो बहाने बाजी करता है।  अपने कहे हुए नारों को नकारता है। नए फर्जी नारे बनाये जाते हैं।  आजादी - गरीबी से , आजादी - बेरोजगारी से। कन्हैया जरा ये बताये की गरीबी से आजादी पाने के लिए अफजल गुरु की शहादत का क्या सम्बन्ध है ?

अनुपम कश्मीर से पंडितों के विस्थापन दिवस को मनाने के लिए एक अपना वक्तव्य जारी करता है।  पूरे देश द्वारा वो सुना जाता है ; कश्मीरी पंडितों की समस्या पर पूरी  चर्चा  होती है। अनुपम का एक नया रूप देश के सामने आता है।

कन्हैया को जेल से निकलने के लिए जमानत बनती है दस हजार रुपैयों और बहुत सारी  शर्तों पर जो किसी सामान्य अपराधी पर लागू होती है ; लेकिन कन्हैया को हीरो बनाने वाले, इसे कन्हैया की विजय मान  लेते हैं। कन्हैया जेल से निकल कर फिर एक बार जे एन यू में भाषण देता है। एक निरर्थक भाषण - जिसमे मोदी को  कोसने के अलावा कुछ नहीं था।  गरीबी के लिए जिम्मेवार पार्टियां - कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी कन्हैया को अपना हीरो बना लेते हैं। बिकी हुयी मिडिया कन्हैया को बुला कर उसका लम्बा लम्बा इंटरव्यू  लेती है ; जिसे कन्हैया अपनी नयी नयी बनी पहचान का इनाम समझ कर चटखारे लेता है। मतलब  साफ़ है - कन्हैया ने राजनीति में घुसने का  रास्ता बना लिया है।

कुछ दिनों पहले टेलीग्राफ अखबार ने देश में बढ़ती हुयी तथाकथित असहिषुण्ता पर एक चर्चा का कार्यक्रम रखा।  जस्टिस गांगुली और कांग्रेस के सुरजेवाला ने जी भर कर असहिष्णुता के गीत गाये , मोदी सरकार को कोसा।  लेकिन जब अनुपम ने उनकी बातों का स्पष्ट और सीधा उत्तर देना शुरू किया तो सबके तोते उड़ गए। ७-८ मिनट के अपने बेबाक और निर्भीक भाषण से  अनुपम देश की   सोच पर छा  गया।

आज कन्हैया और अनुपम दोनों ही शायद एक राजनैतिक जीवन के दो विपरीत छोरों से अपनी शुरुवात कर  रहे हैं,  लेकिन दोनों के स्तर में वही अंतर है जो राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी में है।






Friday, January 1, 2016

Shortest Story

एक अति लघु कथा

मैंने एक अनजान व्यक्ति से कहा - नया साल मुबारक हो !

उसने उत्तर दिया - क्यों ?

मैं निरुत्तर हो गया।


Wednesday, July 15, 2015

असली सेक्युलर ! - एक लघु कथा



बड़ा विचित्र किस्म का भिखारी था वो। सुबह सुबह उठ कर गले में एक रुद्राक्ष की माला डाल  कर शिव मंदिर के सामने बैठ जाता था। आते जाते लोग उसकी चटाई पर कुछ छुट्टे कुछ रुपैये डाल देते  थे। दोपहर में  गुरूद्वारे के पास  बैठ जाता था ,  सिखों वाली पगड़ी पहन कर।  लोग काफी  पैसे दे जाते थे।  कई बार  वहीँ लंगर में खाना खा लेता था।  शाम को इबादत की  सफ़ेद जाली की टोपी पहन किसी मस्जिद बाहर बैठ जाता था , वहां  भी अच्छी कमाई हो जाती थी। रमजान के दिनों में बिना रोजा रखे शाम के खाने का जुगाड़ हो जाता था। रविवार के दिन  चर्च  के बाहर ईसाई क्रॉस की माला काम आती थी। सबसे बड़ी मौज तो ये थी की उसके दान दाता उसके सभी ठिकानों में से सिर्फ  एक पर जाते थे , इसलिए किसी को उसके मजहब पर कोई शक नहीं होता था। 

एक दिन उसके एक प्रोफ़ेसर  पडोसी ने उससे पुछा - तुम ये अलग अलग भेष बना कर लोगों को और उनके भगवान को ठगते हो ; तुम्हे ऐसा नहीं लगता की भगवान किसी दिन तुमसे बहुत नाराज हो जाएंगे ?

उसने हँसते हुए उत्तर दिया - मैं कहाँ ठगता हूँ ? ठगते तो वो लोग हैं जिन्होंने  भगवान की   अपनी  मनचाही कल्पना से सूरत बना दी ; अपने आपको भक्त दिखाने  के लिए अजीब अजीब वस्तुएं बना ली - जैसे की रुद्राक्ष , इबादत की टोपी और क्रॉस की माला। यहाँ तक की सभी जगह व्यापक निराकार भगवान के रहने के भी घर बना दिए - जैसे की मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे और चर्च।  क्या भगवान  यही सब देखते हैं ? ये सारा दिखावा अपने आप के लिए ही तो होता है। मैं भी वही करता हूँ जो उनको अच्छा लगता है। मेरा गुजारा हो जाता है ; उनकी दान दक्षिणा पूरी हो जाती है। फर्क इतना है की वो दूसरे  धर्मों के लिए बुरा भला कहते हैं , मैं सबका सन्मान करता हूँ, सबको आशीर्वाद और दुवाएँ देता हूँ । अब बताइये की भगवान किससे ज्यादा खुश होंगे , उनसे ये मुझसे !

प्रोफ़ेसर साहब निरुत्तर थे। 




Sunday, June 28, 2015

ललित मोदी का बवंडर



कमाल का देश है हमारा ! नरेंद्र मोदी के निरंतर चल रहे एक के बाद एक देश के उत्थान के कार्यक्रम न मिडिया को दिखते  हैं न विपक्ष को ; लेकिन एक बेमतलब के बेकार से गुजरे हुए इतिहास ललित मोदी की एक एक ट्वीट हेडलाइन बन रहा है।

वो कांग्रेस जो भ्रष्टाचार के कारनामों के नीचे दब कर मर चुकी है ; आज बेमतलब के आरोप लगाते  नहीं थकती।  देश के प्रधानमंत्री के लिए अभद्र शब्दों का प्रयोग करना उन्होंने दिनचर्या बना लिया है।  खीज उठती है जब प्रगति के हर काम में वो रोड़ा अटका रहें हैं।  देश के जीवन के मूल्यवान साठ साल उनके परिवारवाद की भेंट चढ़ गए।  हम दुनिया की रफ़्तार के सामने निरंतर पिछड़ते चले गए। अब जब एक नया प्रशासन देश को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील है , तब उनके पास एक ही काम बचा है - वर्तमान सरकार को नीचा  दिखाने  के लिए ऊल -जुलूल बाते करना।

ललित मोदी प्रकरण को ही लेवें।  पूरी दुनिया में क्रिकेट खेलने वाले देश जानते है , कि  कैसे ललित मोदी ने क्रिकेट के खेल को एक पैसा छापने वाली मशीन 'आई पी एल' के नाम से बनायीं। ललित मोदी इसके कमिश्नर के रूप में देश के हीरो बन गए। इनके साथ सहयोग कर रहा  था , कांग्रेस सरकार का पूरा तंत्र। बहुत से मंत्रियों ने इसका आर्थिक लाभ उठाया। शशि थरूर अगर ज्यादा पैसे बनाने के चक्कर में अपनी एक अलग टीम नहीं बनाते , तो शायद कहानियां नहीं खुलती।

शायद ललित मोदी ने किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति को नाराज कर दिया , जिसके कारण  वो अपनी अति शक्तिशाली अवस्था से हटा दिए गए।  उसके बाद शुरू हो गया उनके खिलाफ आरोपों का सिलसिला।  धीरे धीरे सब पल्ला झाड़ने लगे। ललित देश छोड़ कर लन्दन जा बैठे। वो सारे नेता जिनके ललित से सम्बन्ध थे , देश में उसका विरोध करते लेकिन लन्दन में उनसे मिलकर सहानुभूति करते थे।

अब लीजिये सुषमा स्वराज और वसुन्धरा राजे का प्रकरण।  सुषमा ने कहा की ललित को वो जानती थी और वो उनकी पत्नी की बीमारी के समय ललित की इतनी मदद कर रही थी की वो पुर्तगाल जाकर अपने पत्नी से मिल सके। वसुंधरा राजस्थान से हैं और उनकी पारिवारिक मित्रता मोदी परिवार से रही है ; उस मित्रता के निमित उन्होंने उस समय ललित की मदद करने के लिए सिफारिश की जब वो राजस्थान  की मुख्यमंत्री नहीं थी। दोनों देवियों ने सच्चाई देश के सामने रख दी। लेकिन कांग्रेस को इनका इस्तीफा चाहिए क्योंकि उन्होंने बकौल कांग्रेस एक अपराधी की मदद की है। पहली बात तो ये की क्या ये मदद अपराध की श्रेणी में आती है ? और अगर आती भी है तो क्या इसका दंड पदत्याग है।

अब जरा कांग्रेस अपनी मदद का इतिहास देखे -
१. मायावती पर बहुत आरोप थे आर्थिक और राजनैतिक भ्रष्टाचार के , क्या कांग्रेस ने उनके साथ सौदेबाजी कर के उनकी मदद नहीं की।
२. मुलायम सिंह के खिलाफ बहुत कुछ था , क्या वही सौदेबाजी उनके साथ नहीं हुई।
३. चारा घोटाले के सबसे बड़े अपराधी लालू यादव को तो कांग्रेस ने गोद  ही ले रखा है।
५ . कांग्रेस के तो बहुतेरे मंत्री ही दागदार हैं , उनका क्या ?

ये सारे उदहारण तो सौदे बाजी के हैं लेकिन क्या सोनिया गांधी ने अपने पति की हत्यारिन के लिए सिफारिश कर उनकी फांसी को आजीवन कारावास में नहीं बदलवाया ? उनका तर्क  भी यही था की मानवता के नाते उन्होंने उसकी मदद की। क्या मानवता के लिए इतने जघन्य अपराध के अपराधी की मदद तो उनकी महानता  है , लेकिन उसी मानवता के लिए अगर सुषमा या वसुंधरा ने किसी सामान्य आर्थिक अभियोगी की मदद बिना किसी व्यक्तिगत लाभ इ लिए कर दी तो अपराध हो गया ?

गलती और अपराध  में एक महीन दूरी  है। सुषमा और वसुंधरा के कृत्य उनके  राजनैतिक कद को देखते हुए गलती तो कहला सकती है लेकिन कोई अपराध नहीं। उनकी ये गलती उतनी ही बड़ी गलती है जितनी दिग्विजय सिंह का अंतरराष्ट्रीय अपराधी ओसामा को ओसामाजी कहना। ऐसी गलतियों की सजा उनकी जग हंसाई तो हो सकती है लेकिन इसके अतिरिक्त और कोई दंड नहीं।

कुछ टीवी चैनेल तो आजकल चिता पर भी रोटियां सेकने का प्रयास करते हैं। उनका उद्देश्य है उनका व्यक्तिगत लाभ यानी टी आर पी ! उन्हें उनका लाभ तो जरूर मिल रहा है लेकिन वो लोग देश का बहुत बड़ा नुक्सान कर रहें हैं। पत्रकारिता के चोले में एक डिक्टेटर जैसा रूप अपना कर बैठे हैं ऐसे लोग। समय ही ऐसे लोगों का हिसाब किताब करेगा।












Saturday, March 7, 2015

भारत की बेटी - विवाद क्यों ?


इंग्लैंड की बीबीसी टेलीविजन चैनल कम्पनी ने एक फिल्म बनाई है - इंडियाज डॉटर यानि भारत की बेटी। फिल्म एक डाक्यूमेंट्री है - निर्भया बलात्कार काण्ड के विषय में।  इस  फिल्म को लेकर पूरे देश में बहुत बड़ा विवाद खड़ा हुआ है। इस विवाद का प्रमुख कारण है , फिल्म निर्देशक द्वारा तिहाड़ जेल में लिया गया एक इंटरव्यू - छह में से एक बलात्कारी का। बलात्कारी अपने अपराध का कारण निर्भया जैसी लड़कियों को मानता है , जो की रात नौ बजे के बाद अपने बॉय फ्रेंड के साथ सड़कों पर निकलती है।

पूरे देश का बुद्धिजीवी वर्ग दो भागों में बंटा  हुआ है - एक का मानना है कि ऐसी फिल्मों को दिखाए जाने पर अंतर्राष्ट्रीय बैन लगना चाहिए , दूसरे  का कहना है की वाणी की स्वतंत्रता पर कभी भी प्रतिबन्ध नहीं लगना चाहिए। प्रतिबन्ध के पक्ष में जो कारण है वो कुछ ऐसे है -

१. एक बलात्कारी को अपनी बात एक पब्लिक प्लेटफॉर्म से कहने की छूट नहीं होनी चाहिए। समाज को एक गलत मनोवृति मिलती है।

२. बलात्कार की शिकार लड़की का नाम फिल्म ने उजागर कर दिया , जो सामाजिक उसूलों के विरुद्ध है।

३. ये फिल्म अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की एक गलत तस्वीर प्रस्तुत करती है।

मैंने आज होली के दिन ये फिल्म यू ट्यूब  पर देखी। मेरी पत्नी के कहने पर देखी। अब  फिल्म पर मेरी प्रतिक्रिया कुछ इस प्रकार है -

१. मीडिया पर इस तरह  बहस से फिल्म का प्रचार प्रसार ही हुआ है। जैसे मैंने मेरी पत्नी के कहने से ये फिल्म यू ट्यूब पर देखी , मेरा ख़याल है की लाखों लोगों ने देखी होगी ; जो शायद कभी यू ट्यूब पर फिल्म  देखते ही नहीं हैं।

२. पूरी की पूरी फिल्म विभिन्न लोगों के साक्षात्कार पर आधारित है , जिसमे शामिल हैं - मुख्य रूप से निर्भया के माता पिता और एक युवा शिक्षक।  इसके अलावा - दिल्ली पुलिस के अधिकारी , हस्पताल के डॉक्टर , बचाव पक्ष के दो वकील , विभिन्न सरकारी अधिकारी , कई अपराधियों के माता पिता और पत्नी ,दिल्ली की मुख्य मंत्री शीला दीक्षित तथा एक बलात्कारी ! किसी विषय पर इससे अच्छी डॉक्यूमेंट्री नहीं सकती।

रही बात बलात्कारी के इंटरव्यू की ! मैं समझता हूँ की ऐसा इंटरव्यू जहाँ एक अपराधी की मानसिकता को दिखाता है , वहीँ एक आम आदमी को उसकी सोच से दूर करता है। मेरे विचार में अपराधी के मनोविज्ञान से ज्यादा खतरनाक सोच उन्हें बचाने वाले वकीलों की है।  ये वकील उन अपराधियों की बात का समर्थन करते हुए कहते हैं की भारत  संस्कृति बहुत महान है , क्यूंकि इसमें नारी के लिए कोई स्थान नहीं है।  घिन आ रही थी जब मैं बचाव  पक्ष के वकील की दलील को सुन रहा था। क्या ऐसे वकील बिना रोकटोक इस देश में प्रैक्टिस कर सकते हैं।

२. फिल्म में लड़की के माता पिता कहते हैं की हमें कोई शर्म महसूस होती है  कहते हुए की हमारी बेटी का नाम था ज्योति सिंह। उन्होंने कहा  उसके बलिदान ने कम से कम नारी  सुरक्षा जैसे विषय को  भारत ही नहीं अंतरर्रष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा मुद्दा बना दिया।  इसके बाद नाम उजागर करने के विरोध में  तर्क  नहीं बचता।

३. ये  सच है की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की बदनामी होगी। लेकिन सच को दबा कर ये बदनामी कब तक रुकेगी। फिल्म  के अंतिम भाग मे भारत होने वाली कन्या भ्रूण हत्या के आंकड़े बताये गए है। इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि आज भी हमारे देश में एक बहुत बड़ा वर्ग है जो कन्या अपने घर में नहीं चाहता।

बलात्कार की घटनाएँ इतनी अधिक बढ़ चुकी है की इन ख़बरों से बचा नहीं जा सकता।  शुतुरमुर्ग की तरह अपनी  गर्दन रेत में छुपा लेने से या कबूतर की तरह अपनी आँख बंद कर लेने से खतरा टाला  नहीं जाता।

मेरे व्यक्तिगत विचार में यह फिल्म किसी भी तरह सामाजिक मर्यादा का उल्लंघन नहीं करती।  ऐसी फिल्म को सामान्य जनता को दिखाने से समाज के अंदर ऐसे अपराध के विरुद्ध रोष ही बढ़ेगा , जो ऐसी घटनाओं को रोकने में सहायक होगा।

Thursday, March 5, 2015

राम का चक्कर - एक संस्मरण



होली के अवसर पर जीवन के  सबसे मूर्खता पूर्ण अनुभव की तलाश में था।  तब ये घटना याद आ गयी।

बात है १९८२ की। मैं , मेरी पत्नी रेणु , बहन सविता और बहनोई अशोकजी  एक साथ नैनीताल गए थे। तीन दिन वहां रहने के बाद हमने सोचा क्यों न एक दिन के लिए जिम कॉर्बेट पार्क चलें। टूरिज्म विभाग के दफ्तर में पैसे भर कर  वहां के सरकारी बंगले में हमने बुकिंग करवा ली। सुबह एक गाडी ली और चल पड़े।  वहां पहुँचने का रास्ता अशोकजी ने होटल के मैनेजर से समझ लिया , इस लिए ड्राइवर को निर्देश देने का काम उनका था।

बताने वाले ने उन्हें रास्ता यूँ बताया था - रामनगर जाने वाली सड़क पकड़ो,  जाते जाओ।  डेढ़ -दो घंटे में रामनगर आएगा , वहां से एक रास्ता जिम कॉर्बेट पार्क के लिए मुड़ेगा , उस रास्ते को पकड़ कर  चले जाओ।  डेढ़ दो घंटे में पार्क पहुँच जाओगे।  निर्देश इतने आसान थे की हमने कोई नक्सा वैगरह लेने की कोशिश ही नहीं की।

शुरू में हम लोग अपनी ही मस्ती में बढ़ते रहे। बाद में जब सड़क के किनारे लगे मील के पथ्थर देखने शुरू किये तो हमें दिखने लगा रामपुर जो की ७००-८०० किलोमीटर था। अशोकजी ने कहा की शायद उनको समझने में कोई गलती हुई होगी। जाना तो रामपुर होकर ही है।  इस  प्रकार अनजाने में रामनगर का स्थान रामपुर ने ले लिया। जैसे जैसे दिन बीतता गया हमें अपने निर्णय पर गुस्सा आने लगा।  अच्छा भला नैनीताल में मौज कर रहे थे ; मतलब यहाँ गर्मी में धक्के खा रहे थे। अशोकजी बेचारे सबको समझा बुझा कर रामपुर तक ले जा रहे थे।

खैर साहब , किसी तरह १० घंटो की यात्रा के बाद हम रामपुर पहुंचे। वहां पहुँच कर एक ढाबे में चाय पी।  फिर किसी समझदार आदमी से पूछा - ' भाई साहब , यहाँ से जिम कॉर्बेट जाने का कौन सा रास्ता है , और कितना समय लगेगा ?

भले आदमी ने हमारी तरफ देखा और पूछा - दिल्ली से आएं हैं क्या ?

अशोकजी ने कहा - फिलहाल तो नैनीताल से आ रहें हैं।

 अब उस आदमी के चेहरे पर एक मुस्कान आ गयी।  बोला - तो साहब यहाँ रामपुर तक क्यूँ आये हैं।  आप तो रास्ता बहुत पीछे छोड़ आये हैं , जो रामनगर से मुड़ता है।

अब जीजाजी के चेहरे का रंग देखने लायक था। उन्हें जैसे काटो तो खून नहीं। हम सभी उन पर बरस पड़े।  सब ने कह दिया - अब कहीं नहीं जाएंगे , यहाँ से सीधा दिल्ली चलो।

अशोकजी  सबको अनुरोध किया - देखो पैसे भरे हुये हैं।  हमें वापस जाना चाहिए ;  जीवन में फिर यहाँ आना हो या न हो। हार कर सबने उनकी बात मान ली , और चल पड़े वापस एक १० घंटे की यात्रा पर - जिम कॉर्बेट पार्क जाने के लिए। 

Tuesday, March 3, 2015

गुटखा तम्बाकू - एक लघु कथा


मैं इंटरव्यू ले रहा था , एक स्टेनो सेक्रेटरी के पद के लिए। अगला प्रार्थी थी एक दक्षिण भारतीय महिला।  सामान्य प्रश्नोत्तर के दौरान मैंने पूछा - आप के पति क्या करते हैं ?

उसने जरा बुझे से स्वर में कहा - उसका डेथ हो गया। कैंसर था।

न चाहते हुए भी मैं पूछ बैठा - बहुत यंग रहे होंगे ; ऐसा कैसे ?

उसने कहा - उसको गुटखा तम्बाकू बहुत खाता था।

मन में हंसी आई उसकी दक्षिण भारतीय हिंदी सुन कर ; लेकिन अगले ही क्षण मन  में आया - भले ही उसका व्याकरण गलत था , लेकिन अनजाने ही उसकी बात सही थी।  हम समझते हैं की गुटखा तम्बाकू हम खाते हैं , लेकिन वास्तविकता ये है की गुटखा तम्बाकू हमें खाता है।