नील स्वर्ग

नील स्वर्ग
प्रकृति हर रंग में खूबसूरत होती है , हरी, पीली , लाल या फिर नीली

Tuesday, January 31, 2012

मुंबई में कोर्पोरेसन के चुनाव

मुंबई में कोर्पोरेसन के चुनाव होने वाले हैं . हमेशा की तरह सभी राजनैतिक दल , जैसे कि कोंग्रेस , बी जे पी , शिव सेना , एन सी पी  आदि मैदान में है . खास बात ये है कि एक और नया दौर चल पड़ा है - नागरिक आन्दोलन का दौर  . मुंबई की जागरूक जनता ने ये मान लिया है कि सभी राजनैतिक दल बेकार हैं . किसी को चुन लो एक बार इलेक्सन जितने के बाद कोई भी नजर नहीं आता . 

जनता की इस जागरूकता का परिणाम है - नए नए चुनावी दल ! सभी का कहना है कि वो लोग कोई राजनैतिक दल नहीं हैं , लेकिन स्वच्छ छवि वाले लोगों को मुंबई कोर्पोरेसन की सत्ता में लाने के लिए वो सही लोगों का चयन कर रहें हैं .  तीन प्रमुख नाम सुनने में आ रहें हैं - मुंबई नागरिक सत्ता ( mumbainagriksatta.com ) , मुंबई  227 (www.mumbai227.com ) और लोकसत्ता (www.loksatta.org) . 

उद्देश्य कितने ही अच्छे हों , लेकिन जब सवाल सत्ता का आता है तो सभी दल राजनैतिक ही कहलायेंगे . राज करने की भूख का ही तो नाम राजनीति है . और धीरे धीरे ये बातें सामने भी आ रही हैं . बीस सीटों पर  मुंबई नागरिक सत्ता और मुंबई  २२७ - दोनों के ही उमीदवार खड़े हैं - जो कि आपस में बँट कर  सीधा फायदा पहुंचाएंगे किसी न किसी राजनैतिक दल को . दोनों दलों का ये भी आरोप है की लोकसत्ता तो नागरिक दल है ही नहीं क्योंकि वह एक राजनैतिक दल के रूप में रजिस्टर्ड है . यानि की अब राजनीति में आने के लिए राजनैतिक दल होना एक बुराई है . 

समस्याएं इस तरह सुलझने वाली भी नहीं हैं . बल्कि उलझनों में उलझाने के लिए और नए नाम आयेंगे . जिसे टिकट नहीं मिला वो उल्टा बोलेगा , जिसे मिल गया उस पर जीतने की धुन सवार हो जायेगी और फिर वो उन सभी हथकंडों को अपनाएगा जो राजनीति में होते हैं . और पता नहीं कौन सा गैर राजनैतिक दल कब अन्दर ही अन्दर किसी राजनैतिक दल का भागीदार बन बैठे . बहरहाल ये नया दौर शुरू हो चुका है .

आगे आगे देखिये होता है क्या ! 


Monday, January 30, 2012

राष्ट्र भाषा हिंदी

एक दिलचस्प तस्वीर ! हमारी सरकार की मुख्य पार्टी की अध्यक्ष एक भाषण दे रही हैं एक कागज से पढ़ कर ! कागज से पढने में कोई खास बात नहीं है , खास बात ये है की कागज पर हिंदी भाषा को भी रोमन लिपि में लिखा गया है . 

सब कुछ तस्वीर में ही है इस लिए विशेष बताने की आवश्यकता नहीं है . 

जय भारत ! जय हिंदी !  


Saturday, January 21, 2012

देश की नाक

पिछले रविवार को भारत की क्रिकेट टीम आस्ट्रेलिया से तीसरा मैच भी बुरी तरह हार गयी . हार हमें बर्दाश्त नहीं . हमारे सारे हीरो जिन्हें हमने विश्व कप विजय के बाद आसमान पर बिठा रखा था , सभी अब जीरो हो गए . देश की सारी मिडिया का  पूरा का  पूरा प्राइम टाइम और हेड लाइन इस शर्मनाक हार के बखान में लग गयी . किसी ने इसे देश का सबसे शर्मनाक समय कहा तो किसी ने देश की नाक काटने का आरोप लगा दिया . 

उसी दिन एक और खबर छपी - शायद चौथे या पांचवें पन्ने के एक छोटे से कोलम में - कोलकाता में उषा तांती नाम की ४० वर्षीया महिला ने सड़क पर एक जुड़वां भाई बहनों को जन्म देकर प्राण त्याग दिए . कारण ये था की चितरंजन शिशु सदन ने उसे भर्ती करने से इंकार कर दिया ; मजबूरी में उसके पति ने शम्भुनाथ पंडित हस्पताल के दरवाजे खटखटाए - उन्होंने भी मना कर दिया . परिणाम उषा की सड़क पर मृत्यु !

इस खबर पर किसी अख़बार ने कोई हेडलाइन नहीं लिखी , कोई सम्पादकीय नहीं छापा , देश की कहीं नाक नहीं कटी और सरकार को कहीं सफाई नहीं देनी पड़ी . इन्क्वारी की औपचारिकताओं के बाद निष्कर्ष निकाल दिया गया की दोनों हस्पतालों ने कभी भी उस महिला को भरती करने से इंकार नहीं किया . बात यहीं ख़त्म !

हम किस देश में रह रहें हैं - जहाँ मानव प्राण एक खेल की हार से भी कितने बौने हैं . हार जीत तो हर खेल के दो परिणाम हैं , जो हमेशा होते रहेंगे ; लेकिन उषा तांती के दोनों बच्चों के लिए तो आजीवन हार लिख दी गयी . मन मंथन कीजिये !


Sunday, January 15, 2012

विद्वान अनपढ़

 पिछले हफ्ते मैं और मेरी पत्नी एक संक्षिप्त अवकाश के लिए कर्नाटक में मैसूर के पास स्थित एक खूबसूरत रम्य स्थान पर गए - जिसका नाम है  औरेंज काउंटी कबीनी ! वहां पहुँचने के लिए बैंगलोर से कार की यात्रा है करीब पांच घंटे की . कबीनी वहां एक नदी का नाम है .

 हमने भी एक कार ली . कार का ड्राइवर  नन्दीश हिंदी अच्छी  तरह समझता और बोलता था . और इतना ज्यादा बोलता था की सारे रस्ते या तो हम उसकी बात सुनते रहे , या फिर उसे हमारी बातों में भी हिस्सा लेने की इजाजत देनी पड़ी . एक खास बात ये थी की वो व्यक्ति हर विषय पर अच्छी जानकारी रखता था . मसलन जब मैंने अपने ब्लैक बेरी फोन में भरे हुए गीत बजाने  शुरू किये  तो उसने मुझसे अनुरोध किया कि , क्या मैं ये गीत उसके सेल फोन में भेज सकता हूँ . मैंने टालने के लिए कहा की मेरा फोन ब्लैक बेरी है इसलिए इसमें सामान्य तरीके से संगीत नहीं भेजा जा सकता . उसने छूटते  ही कहा तो आप ब्लू टूथ से भेज दीजिये .

रस्ते में एक जगह हमने कुछ नाश्ता करने के लिए गाडी रोकी . वो हमारे पास की टेबल पर बैठ कर नाश्ता कर रहा था . मैंने वेटर से कहा , की हमारे ड्राइवर का बिल भी हमें ही दे देवे . हम बिल का पेमेंट कर के गाडी में आ गए . नन्दीश ने  गाड़ी स्टार्ट कार दी . वो पूछने लगा - साहब आपने  मेरा कितना बिल चुकाया . मैंने कहा - जाने दो क्या फरक पड़ता है , ये तुम्हारे हिसाब में नहीं पकड़ा जाएगा . उसने फिर भी जोर दे पूछा . मैंने कहा की सिर्फ बयालीस रुपैये . उसने तुरत गाडी के ब्रेक लगा दिया . मैंने पूछा - भाई क्या हुआ ? उसने कहा - साहब होटल वाले ने ज्यादा पैसे ले लिए . मैंने उठने के पहले उससे पूछा था की मेरा कितना बिल हुआ तो उसने पच्चीस रुपैये बताया था ; उससे ज्यादा हो भी नहीं सकता था क्योंकि मैंने जो डोसा  मंगाया था , उसका मूल्य पच्चीस रुपैये ही था . उसने कहा - साहब ज्यादा दूर नहीं आये , गाडी घुमा लूँ क्या ? मैंने कहा - नहीं भाई , सत्रह रुपैये के लिए हमें वहां जाकर बात करने की जरूरत नहीं , ये समझ लेंगे की सत्रह रुपैये वेटर को टिप दे दी . उसने कहा - साहब बात सत्रह रुपैये की नहीं , बात उसूलों की है . आप अपनी  मर्जी से किसी को चाहे हजार रुपैये दे देवें , लेकिन गलत तरीके से कोई आपसे पैसे क्यों लेवे ? उसकी बात में दम था , लेकिन मैंने समय बचाने के लिए उसे आगे बढ़ने का आदेश दिया .

यात्रा के अंतिम दस किलोमीटर का रास्ता बहुत ख़राब था . उस ख़राब रास्ते के बीच अचानक एक आधे किलोमीटर का रास्ता जो एक गाँव से होकर गुजरता था , वहां रास्ता काफी ठीक मिला . मैंने यूँ ही कहा - कमाल है - इस छोटे से टुकड़े को ठीक कर दिया लेकिन बाकी सारा रास्ता इतना ख़राब . नन्दीश अपने एक्सपर्ट कोमेंट देने में कहाँ चूकने वाला था . उसने कहा - साहब , हमारे देश का संविधान लिखा था बाबा साहब अम्बेडकर ने . उन्होंने अपने संविधान में पिछड़ी जातियों के लिए विशेष प्रावधान किये थे . अब ये गाँव पिछड़ी जातियों का गाँव था ; इसलिए और कहीं सड़क बने या न बने, यहाँ जरूर बन जाती है .

मैंने पूछा - नन्दीश , तुम कितना पढ़े लिखे हो ? उसने कहा - दूसरी क्लास तक . मुझे विश्वास नहीं हुआ . मैंने कहा - भाई मुझे तो नहीं लगता की तुम ज्यादा पढ़े लिखे नहीं हो . उसने कहा - साहब मैं सच कह रहा हूँ , मैं सिर्फ दूसरी तक ही पढ़ा हूँ , लेकिन मेरी पत्नी एक ग्रजुएट है . मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा . मैंने पूछा - नन्दीश, तुम्हारी पत्नी ने तुमसे शादी  करने के लिए हाँ कैसे कर दी . उसने बताया - साहब इसकी भी एक कहानी है ; मेरे घर के लोग पहले लड़की देखने गए थे , उन्हें लड़की पसंद आ गयी , फिर उन्होंने मुझसे कहा की तुम जाकर लड़की से मिल लो और रिश्ता पक्का कर आओ . मुझे पता चला की उन्होंने मेरे अनपढ़ होने की बात वहां बताई नहीं थी . जब मैं वहां गया तो मैंने सबको साफ़ साफ़ बता दिया की मैं सिर्फ दूसरी क्लास तक पढ़ा हूँ और पेशे से टैक्सी ड्राइवर हूँ . उन्होंने पूछा की कमाते कितना हो , तो मैंने कह दिया की कभी सौ रुपैये तो कभी पांच सौ रुपैये , और कभी कभी कुछ भी नहीं . मैंने लड़की को भी बता दिया की मेरे घर में कोई ऐशोआराम नहीं है , लेकिन तुम मुझे पसंद हो , अगर मैं भी तुम्हे पसंद हूँ तो फिर हम शादी कर सकते हैं , वर्ना कोई मजबूरी नहीं . मैंने उसके घर वालों से कह दिया - की अगर आपकी हाँ हो तो मुझे शादी में एक पैसा नहीं चाहिए , बस आपकी बेटी ही चाहिए . उसके घर वालों ने न कर दिया . तीन महीने बाद मुझे समाचार मिला की लड़की कहती है की वो सिर्फ मुझसे ही शादी करेगी और किसी से नहीं . और इस तरह हमारी शादी हो गयी . हम लोग बहुत खुश हैं साहब .

मेरा मन किया की मैं इस विद्वान अनपढ़ को एक जोरदार सलाम करूँ , लेकिन फिर मेरा साहब होना आड़े आ गया . मैंने उसे उसके भाड़े के अलावा और भी इनाम दिया और शुभकामनायें दी .

क्यों नहीं हमारे पढ़े लिखे नौजवानों में ऐसी सच्चाई और साफगोई नजर आती है !

Saturday, December 31, 2011

अन्ना ! तुम हारे नहीं !

अन्ना ने अपना अनशन डेढ़ दिनों में ही तोड़ लिया ! अन्ना के अनशन में मुंबई में भीड़ नहीं जुटी ! अन्ना ने अपना जेल भरो  आन्दोलन फिलहाल वापिस लिया ! ................बस फिर क्या था ! इतना होते ही मिडिया ने गिरगिट की तरह रंग बदल लिया . कोंग्रेस के तेवर बदल गए . अन्ना प्रकरण का समापन घोषित कर दिया . बुद्धिजीवियों को इस पूरे वर्ष में पहली बार मौका मिल गया , अन्ना के आन्दोलन पर इकतरफा प्रहार करने का - क्या जरूरत थी अनशन की जब सरकार ईमानदारी से लोकपाल विधेयक पर चर्चा के लिए तीन दिन का विशेष सत्र रख रही थी ? अन्ना को अपनी कमजोरी का अंदाजा लग गया होगा !अन्ना आर एस एस का एजेंट है , इस लिए सिर्फ कोंग्रेस का विरोध कर रहा है !  अन्ना का आकर्षण ख़त्म हो गया ..................वैगरह वैगरह !

अन्ना ने अपने २७ दिसंबर से २९ दिसंबर के अनशन  की घोषणा बहुत पहले ही कर दी थी , क्योंकि उन्हें पता था की लोकसभा और राज्यसभा का शीतकालीन सत्र २६ दिसंबर को समाप्त हो जाएगा . उन्होंने यह भी घोषणा की थी , अगर सरकार एक सशक्त लोकपाल बिल पारित कर देगी तो ये अनशन एक जश्न के रूप में मनाया जाएगा . उन्होंने वही किया जो उन्होंने बहुत पहले से कहा था . दरअसल सरकार ने उल्टा किया . शीतकालीन सत्र तो बिना लोकपाल की चर्चा के निकाल दिया और फिर अन्ना की तलवार लटकती देखी तो तीन दिन के लिए सत्र बढ़ा दिया . ये सरकारी चाल नहीं थी तो और क्या था ? ये षड्यंत्र था अन्ना को बदनाम करने के लिए - की हम तो लोकपाल पर चर्चा कर रहें हैं और ये लोग बाहर बैठ कर अनशन कर के हमें बदनाम कर रहें हैं .

दुर्भाग्य वश अन्ना जी का स्वास्थ्य बिगड़ गया और उन्हें अपना अनशन तोडना पड़ा . ये भी सही है की उनके अनशन में रामलीला मैदान के अनुपात में भीड़ बहुत  कम थी ; लेकिन इस संख्या के कम होने का कारण अन्ना जी के आन्दोलन की कमजोरी नहीं थी . एम एम आर डी ऐ मैदान में भीड़ न जुटने के मुख्य कारण थे ये -

१. अनशन का स्थान चुना गया था - दादर का शिवाजी पार्क या फिर आजाद मैदान . दोनों जगह   प्रशासन   ने अनुमति देने से इंकार किया . आजाद मैदान तो इस तरह के आन्दोलनों के लिए नियुक्त ही है , लेकिन  प्रशासन  ने कहा की हम पूरा मैदान नहीं देंगे . अगर अन्ना का अनशन आजाद मैदान में हुआ होता तो संख्या कम से कम एक लाख लोगों की होती क्योंकि जहाँ आजाद मैदान मुंबई के लोगों की बहुत आसान पहुँच में है , क्योंकि ये मैदान वेस्टर्न और सेंट्रल रेल लाइनों के मुख्य स्टेशनों  - चर्चगेट और सी एस टी के बिलकुल पास पड़ता है , वहीँ एम एम आर डी ऐ मैदान सब से नजदीक बांद्रा स्टेशन  से भी कम से कम ५-७ किलोमीटर की दूरी पर है . इतना लम्बी दूरी चल कर जाना आम आदमी के लिए मुनासिब नहीं है . बस आदि की व्यवस्था उस इलाके के लिए बहुत सीमित है .

२. दिल्ली की अपेक्षा मुंबई में भीड़ कम होनी लाजिमी था  . कारण आम मुम्बईकर बड़े से बड़े हादसे - जैसे  की बम ब्लास्ट के बाद भी अपना दफ्तर नहीं छोड़ता ; ऐसे में सप्ताह के बीचोंबीच अनशन की तारीखें रखना ही गलत निर्णय था .

३. लोकसभा की गरमागरम बहस देखने के लिए इस विषय में कार्यशील  लोग घरों ही नहीं दफ्तरों में भी टी वी खोल के बैठे थे - ऐसे में मैदान की अनुपस्थिति अपेक्षित थी .

४. पहले दिन अन्ना जी मैदान में पहुंचे ११ बजे के बाद जबकि पूर्व  घोषित कार्यक्रम के अनुसार उन्हें वहां पहुंचना था साढ़े नौ बजे  . सुबह जुटने वाली भीड़ काफी संख्या में आकर जा चुकी थी .

बहरहाल कारण जो भी थे दूसरे दिन अन्ना जी ने न केवल अनशन तोड़ दिया , बल्कि उस दिन से आन्दोलन को एक बार स्थगित कर दिया . अब देखिये उस स्थगन का परिणाम . जब  २७ दिसंबर को लोकसभा की बहस चल रही तब , सरकार पूरे जोरों से लगी थी किसी तरह उनका लोकपाल विधेयक  पास हो जाए - क्योंकि बाहर अन्ना जी का आन्दोलन जारी था .ये दबाव सिर्फ सरकार पर ही नहीं बल्कि विपक्ष पर भी था . यही कारण था की विपक्ष के बहुत सारे सुझावों के न माने जाने पर भी लोकपाल विधेयक लोकसभा में पारित हो गया .

अगले दिन बहस होनी थी राज्यसभा में ; लेकिन सुबह से ही ये बातें मिडिया में आने लगी की अन्नाजी का स्वस्थ्य ठीक नहीं है , इसलिए उन्हें शायद अनशन तोडना पड़ेगा . आधे दिन तक सरकार क़ानूनी औपचारिकताओं का बहाना बना कर राज्य सभा में बहस शुरू करने से बचती  रही , लेकिन जब अन्ना जी ने अपना उपवास और आन्दोलन स्थगित कर दिया तो सरकार बेलगाम हो गयी , और इस प्रकार राज्यसभा का एक महत्वपूर्ण दिन बिना किसी बहस के चला गया . सरकार जानती थी की अब उन्हें किसी तरह राज्यसभा का सिर्फ एक दिन और पार करना है .

सरकार शुरू से ही जानती थी की राज्यसभा में उसका बहुमत नहीं है और बहुत सारे संशोधन आयेंगे , क्योंकि विपक्ष की कोई भी पार्टी उनके लोकपाल के प्रारूप को स्वीकार नहीं कर रही ; लेकिन सरकार ने ये नहीं सोचा था की उनकी अपनी सरकार की एक पार्टी तृणमूल कोंग्रेस भी उनका किसी मुद्दे पर विरोध करेगी . तृणमूल कोंग्रेस जैसे की विपक्ष की ही आवाज बन गया , और सरकार के लिए एक बहुत ही कमजोर स्थिति बन गयी . लोकपाल एक ऐसी हड्डी बन गया सरकार के लिए जिसे निगले  तो मुश्किल और उगले  तो मुश्किल . इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार ने जिस घटिया राजेनीति का सहारा लिया वो सारे देश ने देखा . जिस लोकपाल बिल पर आये हुए संशोधनों के लिए सारा विपक्ष सारी रात बहस करने को तैयार था , ताकि उसके बाद मतदान करवा के सभी विवादस्पद मुद्दों पर निर्णय हो सके , वहीँ सरकार ने रात के १२ बजे तक स्थिति स्पष्ट नहीं की , और अचानक १२ बजे के बाद सदन की कार्यवाही समाप्त कर दी . इस बेशर्मी का कारण स्पष्ट है की मतदान का मतलब होता कि लोकपाल में वो सारे प्रावधान पारित हो जाते जो विपक्ष , और काफी हद तक टीम अन्ना चाहती थी . सरकार मैदान छोड़ कर भाग गयी .

अन्ना हजारे की बात एक बार फिर सिद्ध हो गयी की ये सरकार एक शशक्त  लोकपाल कभी नहीं लाएगी क्योंकि भ्रष्टाचार की नदी का स्त्रोत्र ये सरकार स्वयं है . सदन में हुए राम जेठमलानी के भाषण ने सरकार की चालाकियों की पोल खोल कर रख दी .

अन्ना ! तुम हारे नहीं , बल्कि जीते हो ! देश की आँख खुलती जा रही है . सरकार की करतूतें खुद उसी पोल खोल रही हैं .

Sunday, December 25, 2011

मेरी क्रिसमस


आज क्रिसमस के दिन एक बहुत पुरानी घटना याद आती है . मेरी बुआजी दार्जिलिंग के पास एक छोटे से शहर कर्सियांग  में रहती थी. पहाड़ों के बीच एक बहुत सुन्दर हिल स्टेशन था - कर्सियांग  . कर्सियांग की विशेषता थी वहां के बहुत सारे स्कूल - अंग्रेजों के ज़माने से बने कोनवेंट  स्कूल जहाँ पढ़ाते थे सजे धजे ईसाई पादरी और नन !  बुआजी का एक बहुत बड़ा संयुक्त परिवार था . चार चार पीढ़ियों के सदस्य एक साथ रहते थे . उनके परिवार की कई दुकाने थी , जहाँ घर के अलग अलग सदस्य काम सँभालते थे .

बुआजी के दादा ससुर नित्य अपनी एक दुकान में बैठते थे . शहर का बच्चा बच्चा उनको जानता था . एक दिन क्रिसमस के त्यौहार के समय वो अपनी दुकान में बैठे थे . वहां के स्कूल की एक स्मार्ट सी टीचर वहां से गुजर रही थी . दादाजी को हमेशा देखती थी . क्रिसमस का दिन था इस लिए उसके मन में आया की उन्हें क्रिसमस की शुभकामनायें दी जाए . बस , वो दुकान में आई , मुस्कुरा कर दादाजी का हाथ अपने हाथ में लिया , हथेली के पिछले भाग पर एक हल्का सा चुम्बन किया और बोली - मेरी क्रिसमस ! और फिर उसी तरह मुस्कुरा कर बाहर चली गयी. कुछ देर तो दादाजी स्तब्ध रहे , फिर उन्होंने अपने बेटे को आवाज दी और कहा - "अरे भई , ये स्कूल की टीचर क्या कर रही थी . उसने मेरे हाथ को पहले चूमा और फिर बोली - मेरी किस्मत . "

Friday, December 23, 2011

लोकपाल - एक और सरकारी तमाशा


दिसंबर २२, २०११ का दिन भारत के इतिहास में इस लिए महत्वपूर्ण रहेगा , क्योंकि इस दिन संसद में सरकार ने अपना लोकपाल बिल पेश किया . लोकपाल बिल - जो पूरी तरह देश की जनता के आन्दोलन के कारण सरकार को लाना पड़ा . ऐसा नहीं है की सरकार लोकपाल बिल लाना नहीं चाहती थी ; दरअसल सरकारी लोकपाल तो बहुत पहले बन चूका था लेकिन फिर अन्ना हजारे के आन्दोलन ने उस बिल की धज्जियाँ उड़ा दी. तब से इस देश में क्या कुछ नहीं हुआ - अन्ना का उपवास , पूरे देश में आन्दोलन , संसद का अन्ना को विश्वास पत्र , स्टैंडिंग कमिटी की अपनी मीटिंगें और फिर उसकी विवादस्पद रिपोर्ट , राजनैतिक दलों की  उस रिपोर्ट से असहमति वैगरह . आखिर में यू पी ऐ सरकार ने सभी दलों को विश्वास में लेकर एक मसौदा  बनाना चाहा. कल पेश किया गया बिल उसी मिली जुली प्रतिक्रिया का एक साकार रूप होना था . लेकिन ऐसा हुआ नहीं . सरकार अभी भी गिरगिट की तरह रंग बदल रही है . 

सरकार द्वारा पेश किये गए बिल की शुरुवात ही असंवैधानिक है . लोकपाल एक ऐसी स्वतंत्र संस्था बननी है जिसमे ८ सदस्य और एक उसका प्रधान या चेयरमैन होगा . इस नौ सदस्यों की टीम को बनाने के लिए उसमे समावेश कर दिया गया - " कम से कम ५०% आरक्षण अनसूचित जाति , जनजाति , महिलाएं एवं ओ बी सी (Other Backward  Classes ) के लिए . " और उसके बाद लालू यादव , मुलायम सिंह यादव और अन्य मुस्लिम नेता कूद पड़े की जब इतने लोगों का आरक्षण है तो माइनोरिटी ( वोट बैंक की दृष्टि से सीधा मतलब मुस्लमान ) का आरक्षण क्यों नहीं . भारतीय जनता पार्टी की नेता सुषमा स्वराज ने कहा की ये कोई सरकारी नौकरियों की व्यवस्था तय नहीं की जा रही है , ये तो एक  ऐसी संस्था का निर्माण हो रहा है , जिसका काम भ्रष्टाचार से लड़ना है . बस साहब , संसद बन गया एक जातिवाद का अखाडा . 

कांग्रेस पार्टी ने अपना वोट बैंक खिसकते देखा तो एक   सुधारनमा पेश करते हुए - आरक्षण की फेहरिस्त  में माइनोरिटी  शब्द जोड़  दिया.  उसके बाद क्या था - संसद एक फ्री स्टाइल भाषण का अखाडा बन गया .

ये तो था वो दृश्य जो नजर आ रहा था देश को , क्योंकि संसद का सीधा प्रसारण उपलब्ध है . लेकिन अन्दर की बात जो नजर आती है वो है एक गंभीर साजिश - लोकपाल बिल को फिर एक बार अटका कर छोड़ देने की साजिश . लालू यादव और कांग्रेस के प्रेम संबंधों को कौन नहीं जानता . कांग्रेस ने जान बूझ कर आरक्षण को मुद्दा बनाया . लालू यादव पूर्व नियोजित तरीके से संसद के मध्य में प्रदर्शन करने लगे - माइनोरिटी के मुद्दे को लेकर . मुलायम सिंह यादव के लिए इस मुद्दे पर नाचना लाजिमी था - क्योंकि यु पी के चुनाव सामने है . 

सच्चाई ये है की आरक्षण का ये मुद्दा पूरी तरह गलत है - क्योंकि संविधान इस तरह की इजाजत नहीं देता . इलेक्शन कमीशन , सी ऐ जी आदि स्वतंत्र संस्थाएं हैं जिनमे ऐसे किसी आरक्षण का प्रावधान नहीं है . लोकपाल का स्वरुप भी कुछ वैसा ही है . ये बात सभी राजनैतिक दल भी जानते हैं , लेकिन फिर भी ये मुद्दा संसद का कीमती वक्त ले डूबा - क्योंकि ज्यादा तर दल चाहते हैं की ये सत्र इसी तरह फिजूल के विषयों पर खर्च हो जाए , चाहे उसे तीन दिन के लिए बढ़ा क्यों न दिया गया हो . 

संसद में पूरे देश के सामने राजनैतिक दलों के झूठ के आवरण का नंगा नाच हो रहा है . अन्ना अगर अनशन न करें तो जाएँ कहाँ ? अगर अन्ना मर भी जाएँ तो भी ये पार्टियाँ उनके जन लोकपाल मसौदे  को पास नहीं होने देंगी . राजनैतिक पार्टियाँ स्वयं भ्रष्टाचार हैं और अन्ना स्वयं लोकपाल - युद्ध जारी है !