नील स्वर्ग

नील स्वर्ग
प्रकृति हर रंग में खूबसूरत होती है , हरी, पीली , लाल या फिर नीली

Monday, January 5, 2015

टूटे पुतले - एक कहानी


मुन्नी अपनी नयी गुड़िया  बहुत खुश थी।  वो अपनी गुड़िया को नए नए कपडे  पहनाती , उसके बाल  बनाती और उसे अपने पास सुलाती। इतना ही नहीं उसने अपनी सहेली के गुड्डे के साथ उसका ब्याह ही रचा डाला। अपने सुख दुःख की बाते गुड़िया से करती। कभी गुस्सा आता तो वो गुड़िया को  डांट  भी देती ; हाँ , बाद में उसे सॉरी बोल देती।

एक दिन ग़जब हो गया।  छोटे भाई बबलू ने नाराज़ होकर उसकी गुड़िया तोड़ दी। मुन्नी के दुःख और क्रोध  ठिकाना नहीं रहा।  वो बबलू पर चिल्लाई।   इतने से उसका मन शांत नहीं हुआ तो एक  चांटा बबलू  को रसीद कर दिया। बबलू रोते  रोते मां के पास गया। माँ ने मुन्नी को धमकाया और उसके कान खींचे।  मुन्नी ने कहा बबलू ने उसकी प्यारी गुड़िया तोड़ दी ,  उसे कुछ कहने की जगह उसे क्यों डांटा जा रहा है। माँ ने कहा गुड़िया तोड़ दी , उसके लिए उसे डांट मिलनी ठीक थी , लेकिन उसे इतनी  छोटी  गलती पर चांटा नहीं मारना चाहिए।  गुड़िया का क्या है , बाजार  से  खरीद कर लाये थे , दूसरी आ जायेगी ! बात रफा दफा  हो गयी।

५ -७   साल बाद की एक घटना !  दादी अपने पूजा घर में बैठ कर भगवान जी की पूजा कर  रही थी। दादीजी दिन में कम से कम ८-१० घंटे पूजा घर में बिताती।   दिनचर्या शुरू होती भगवान जी को सुबह जगाने से लेकर।  फिर वो भगवानजी को स्नान  करवाती , धुले हुए कपडे पहनाती , नाश्ते का भोग लगाती , झूला झुलाती।  दोपहर का भोजन खिला कर भगवान जी को सुला   देती।

 उस दिन यही भगवान जी के सोने का समय था। बबलू बाहर से क्रिकेट खेल कर लौटा।  उसके हाथ में क्रिकेट का बल्ला और भारी वाली गेंद थी। खेल की मस्ती में उसने गेंद को बल्ले से  मार दिया।  फिर कुछ ऐसा हुआ जिससे घर में एक तूफ़ान खड़ा हो गया।  बबलू की गेंद सीधी पूजा घर में गयी और भगवान जी की मूर्ति से टकराई।  गेंद की चोट से मूर्ति का सर टूटकर अलग हो गया।  दादीजी बिलकुल पगला गयी। बुरी  तरह चिल्लाने लगी - ' आज मेरी जीवन भर की तपस्या नष्ट हो गयी।  मेरे ही घर में मेरे भगवान जी को चमड़े की गेंद से खंडित कर दिया।  मैं कहाँ जाऊं।  लड़के ने मेरे लिए नर्क के द्वार खोल दिए। '

माँ ने ये सब देखा तो अपना आपा खो दिया।  लगी बुरी तरह बबलू को पीटने। बबलू डर के मारे सहमा हुआ  तो था ही , माँ के इस आक्रमण से रोने लगा।  उधर से पापा आ गए , उन्होंने जब सारा दृश्य देखा तो उनका भी पारा चढ़ गया।  उन्होंने भी बबलू को २ तमाचे लगा दिए।

ये सारा दृश्य मुन्नी देख रही थी।  उससे नहीं रहा गया। उसने बीच में पड़  कर बबलू को बचाया। उसे अपने पीछे छुपा कर जोर से बोली - ' क्यों पीट रहे हैं आप इसको ? क्या बिगाड़ा है इसने ?'

दादी चिल्लाई - ' तुम्हे  दिख नहीं रहा ,  इसने भगवान जी को तोड़ दिया ! फिर भी पूछती है  बिगाड़ा है ?'

मुन्नी ने कहा - ' इसने सिर्फ  एक पुतले को तोडा है , और वो भी जान बूझ कर नहीं। '

माँ ने कहा - ' मुन्नी ,  देखती नहीं दादीजी रोज कितने प्यार से भगवान जी को तैयार करती है , भोग  लगाती है और उनकी पूजा करती है।  भगवानजी को एक पुतला कह के तुम उनका अपमान कर रही हो !'

मुन्नी ने अपने उसी तेवर में कहा - '  आखिर क्या फर्क है , दादीजी के भगवानजी में और मेरी गुड़िया में ? दोनों ही बाजार से खरीद कर लाये गए थे , दोनों ही टूटने वाली वस्तु से बने थे। जितना मैं मेरी गुड़िया से प्यार करती  थी उतना ही दादी अपने भगवानजी से करती थी।  दोनों ही बबलू   के हाथों टूट गयी।  लेकिन दोनों बातों में इतना फर्क क्यों ? मेरी गुड़िया मेरे लिए दादीजी के भगवान  से कम नहीं थी , लेकिन फिर भी आप मुझ  पर नाराज हुए  जब मैंने बबलू को तमाचा मारा। आपका कहना सही था , एक गुड़िया थी उसकी जगह दूसरी आ जायेगी।  फिर आज आप सभी की सोच क्यों बदल गयी ? क्योंकि आपने इस पुतले को भगवान का नाम दे दिया। और अगर यही भगवान थे तो फिर अपनी रक्षा क्यों नहीं कर पाये एक मामूली गेंद की चोट से ! और एक मामूली चोट से बिखर भी गए।  ये तो आम इंसान से भी कमजोर निकले।  ऐसे भगवान जी की प्रार्थना से हमें क्या मिलेगा ?

पापा ने प्यार से कहा - बेटी , बात तो तुम्हारी ठीक है , लेकिन इसमें दादीजी की आस्था का सवाल है !

मुन्नी  ही प्यार से कहा - पापा, दादीजी की  आस्था और मेरी बचपन की आस्था में कोई अंतर नहीं है।  मैंने अपनी गुड़िया से  भावनात्मक रिश्ता जोड़ लिया था , वैसे ही दादीजी ने अपने भगवान की मूर्ति से भावनात्मक रिश्ता जोड़ लिया था।  दोनों के लिए ये एक मनोरंजन था।

दादी ने कहा - मुन्नी , तू सचमुच कितनी बड़ी हो गयी है। ये  बातें कई बार मेरे दिमाग में भी  आती है ; क्या मैं सचमुच भगवान की पूजा   कर रही हूँ , या  बुढ़ापे में अपना मन बहला रही हूँ।  मेरे पास समय बिताने के लिए कोई काम नहीं है। मुझे लगता है की मैं जैसे बचपन में तेरे पापा को प्यार से नहलाती धुलाती , खाना खिलाती , सुलाती - वैसा ही एक अनुभव मैंने इस मूर्ति के साथ शुरू कर दिया।  लेकिन ये सारा अनुभव एकतरफा था ; मूर्ति की तरफ से कभी कोई प्रतिक्रिया नहीं थी।

बबलू रुआंसा होकर बोला - दादी माँ ! मुझे माफ़  कर दीजिये।  आज के बाद मैं कभी कोई  तोड़ फोड़ नहीं करूंगा।  कभी भी आपके भगवानजी को कोई चोट नहीं लगने दूंगा।

दादी ने प्यार से बबलू को अपने पास खींचा।  बोली- , बेटा , भगवान  को चोट तुमने नहीं पहुंचाई ,  बल्कि हम सबने पहुंचाई है।  तुम्हारी एक छोटी सी गलती पर हम सबने तिल का  ताड़ बना दिया।  आज के बाद यहाँ कोई भगवान जी नहीं  आएंगे।  मेरे भगवान हो तुम सब।   मेरा प्यार अब मैं एक  मूर्ति पर नहीं लुटाऊंगी।   मेरा प्यार हैं मेरे  पोते और पोती के लिए।

दादी ने परिवार के सभी सदस्यों को अपनी बाँहों में भर लिया।




Wednesday, December 31, 2014

ईमानदार बेईमान - एक लघु कथा


वास्तव में उसकी बहुत ऊंची पहुँच थी। अब सबको अपने बच्चे का दाखिला कराना होता है किसी अच्छे स्कूल में।  बच्चा कितना भी मेधावी क्यों न हो , आखिर स्कूल में सीटें तो सीमित ही होती हैं।  उसमे से फिर सिफारिशी कोटे में आधी तो यूँ ही निकल जाती है। इसलिए जो समझदार और पैसे वाले माँ बाप होते हैं वो खोजते हैं कोई ऐसा शख्श जो कुछ ले दे कर उनका काम पक्का करवा दे। थोड़ी बहुत पूछ ताछ के बाद वो पहुँच जाते थे - गुरुदेव के पास।

न, वो कोई शिक्षक नहीं था ; वो तो था एक बिचौलिया जिसकी ऊपर तक जान पहचान थी। हर व्यक्ति उसके पास जाता था क्योंकि वो ईमानदार था।  उसक पक्का नियम था - वो एक लाख रुपैये लेता था , वो भी अड्वान्स में। उसकी गारण्टी होती थी , की वो दाखिला करवा ही देगा ; लेकिन किसी कारण  से अगर वो दाखिला नहीं हुआ तो पूरा पैसा बिना किसी काट छांट के लौटा देगा।  वो अपनी बात का धनी था।  आज तक एक भी उदहारण ऐसा नहीं था , जहाँ उसने किसी का पैसा काम न होने पर नहीं लौटाया हो।

बात शिक्षा विभाग में ऊपर तक पहुँच गयी। विभाग ने एक इन्क्वायरी बिठाई।  इन्क्वायरी करने वाले इन्स्पेक्टर ने गुरुदेव को बुलाया और पूछा , कि  वो विभाग में किसे पैसे देता है। गुरुदेव ने कहा - किसी को नहीं। इन्स्पेक्टर उसके उत्तर से संतुष्ट नहीं था।  उसने फिर पूछा - फिर बच्चों का दाखिला कैसे होता है ? गुरुदेव ने कहा - प्रभु कृपा से ! इन्स्पेक्टर ने कहा - मतलब ?

गुरुदेव ने कहा - मैं जो भी केस हाथ में लेता हूँ , उसके लिए मंदिर में सवा रुपैये का प्रसाद चढ़ा देता हूँ।  जिनका दाखिला हो जाता है , उनके पैसे रख  लेता हूँ , जिनका नहीं होता ,उस बच्चे के माँ बाप को पैसे लौटा देता हूँ।

इन्स्पेक्टर सोचता रहा - ये शख्श  ईमानदार है या बेईमान !

Thursday, December 25, 2014

भारत रत्न



आखिर श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी को भारत सरकार ने भारत रत्न से विभूषित कर दिया। और अगर न भी करते तो क्या  ? क्या अटल जी का मूल्यांकन घट जाता ? क्या उनका अद्वितीय नेतृत्व , उनकी महान भाषण शैली , उनकी उदारवादी सोच और उनका विश्व से मैत्रीभाव रखने का दृष्टिकोण अपना प्रभाव खो देता ? सच्चाई ये है की अटल जी किसी ऐसे पुरष्कार की प्रतीक्षा नहीं कर रहे थे , बल्कि पूरा देश प्रतीक्षा  कर रहा था कि कब तक कोंग्रेसी सरकार निर्लज्जता से अटल जी  के इस राष्ट्रीय सन्मान से बचेगी। कांग्रेस की सरकार विलुप्त हो गयी ; आखिर भारत रत्न कहे जाने वाले पुरष्कार का उचित सन्मान हुआ।

नोबेल पुरष्कार देने वाली सभा आज तक महात्मा गांधी को शांति के लिए नोबेल पुरष्कार न दिए जाने की गलती पर खेद व्यक्त करती है।

२ जनवरी १९५४ को जब देश के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने इस सर्वोच्च सन्मान की स्थापना की , तो शायद उन्होंने नहीं सोचा होगा की भविष्य में यह सन्मान किस प्रकार कांग्रेस के नेताओं की बपौती बन कर रह जाएगा। यहाँ सब सन्मान प्राप्त लोगों की चर्चा कर के मैं उनके देश के प्रति समर्पण को छोटा नहीं बनाना चाहता ,  हाँ उन लोगों की चर्चा जरूर करना चाहूंगा जिनका नाम आज तक इस  सन्मान के लिए क्यों नहीं लाया  गया।

देश को आजादी दिलाने वाले शहीदों की पूरी जमात इस सन्मान से वंचित रखी गयी है - वर्ना चंद्रशेखर आजाद , भगत सिंह , राजगुरु,  सुखदेव  छूट जाते ? १९९२ में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को भारत रत्न सन्मान से सन्मानित किया गया किया गया , लेकिन बाद में उनकी मृत्यु के रहस्य को लेकर उनके मरणोपरांत पुरष्कार  की गुत्थी को लेकर  पुरष्कार स्थगित कर दिया गया।   क्या ये पुरष्कार उनके जिन्दा या मुर्दा होने से  सम्बंधित था ? या उनके  कार्यकलापों के लिए ?

 ये सच  है कि हर व्यक्ति को पुरष्कार नहीं दिया जा सकता ;  लेकिन ये भी सच है की अगर कामराज , एमजीआर और गुलजारी लाल नंदा भारत रत्न हैं तो श्री अटल बिहारी वाजपेयी उनसे कहीं बहुत अधिक भारत रत्न हैं ! और एक अंतिम प्रश्न ! नेल्सन मंडेला भारत रत्न कैसे हो गए ? न उनका जन्म भारत में  और न ही कार्यक्षेत्र भारत - फिर भारत कैसे उनपर अपना रत्न होने का दावा कर सकता है ?

कांग्रेसी राज में रत्नों का चुनाव भी कांग्रेसी पैमानों पर ही होता रहा है। 

Thursday, November 6, 2014

बचपन की चाहत - एक लघु कथा



एक दिन पोते ने जिद पकड़ ली कि  दादाजी उसको पार्क में ले जाएं. दादाजी शहर के गिने चुने खानदानी बड़े सेठों में शुमार होते थे। पोते के  सामने झुकना पड़ा।  अपनी बड़ी सी महँगी गाडी में वो पोते को लेकर गए। पार्क में काफी लोग थे।  एक तरफ बच्चों के झूले लगे थे।   पोता उस तरफ दौड़ा।  वो एक के बाद एक झूले पर बैठने  और झूलने लगा। आज दादाजी उसके साथ थे इसलिए वो अपने आप को को अन्य बच्चों से ज्यादा शक्तिशाली समझ रहा था।

एक झूले पर अपनी पारी समाप्त हो जाने के बाद वो तुरंत दूसरी पारी की जिद करने लगा।  अन्य बच्चों ने समझाया  बच्चे बारी बारी से झूले पर बैठ रहें हैं , इसलिए उसे फिर से लाइन में लग जाना चाहिए। जब वो नहीं माना तो सभी बच्चों ने उसे जबरन उसे वहां से हटा दिया। दादाजी को ये बात बहुत नागँवार गुजरी।

उन्होंने घर आकर अपना फरमान जारी कर दिया।   पोता उस सड़े हुए सरकारी पार्क में नहीं जाएगा। उन्होंने उसी समय एक झूले बनाने वाली कंपनी को बुला कर सभी झूलों का आर्डर दे दिया।  उनके बंगले के पीछे बहुत सारी जगह पड़ी थी।  वहां एक फुलवारी बनाकर सभी झूले लगवा दिए गए।  पोते के जन्मदिन पर वो पर्सनल पार्क पोते को भेंट कर दिया।

 दिन भर दफ्तर का काम निपटा कर दादाजी घर पहुंचे तो उन्हें पोता उदास सा दरवाजे पर बैठा पाया। दादाजी ने पूछा - ' क्यों भाई , आज जी  भर के झूला झूले या नहीं ?'

पोते ने कहा -' किसके साथ खेलूं ? मेरे सभी दोस्त तो वहां पार्क में हैं। '

दादाजी अपने सारे अनुभवों के उपरांत भी बचपन की चाहत को समझ नहीं पाये।


Monday, November 3, 2014

आज का दिन ( ऑक्टोबर ३१) - १९८४ में

आज का दिन बहुत विशेष है. आज सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्मदिन है।  इस विशेष अवसर की वास्तविक विशेषता को उजागर  किया है हमारे प्रधानमंत्री मोदीजी ने।   पूरे देश में आज का   दिन मनाया जा रहा है - एकता दिवस के रूप में।

 आज का दिन एक और महत्वपूर्ण घटना की याद दिलाता है। आज के दिन १९८४ में देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी  की हत्या उनके सुरक्षा कर्मियों ने दिन दहाड़े कर दी थी।

व्यक्तिगत - मेरे लिए भी  आज का दिन  महत्वपूर्ण है - क्योंकि आज मेरा भी जन्मदिन है।  १९८४ की एक घटना को याद करता हूँ।  उस वर्ष ईश्वर ने बहुत बड़ी कृपा की और मेरे पुत्र पराग का जन्म हुआ  २४ सितम्बर को। परिवार के लोग बहुत खुश थे , इसलिए हमने सभी रिश्तेदारों और मित्रों के लिए एक पार्टी का आयोजन किया - ऑक्टोबर ३१ यानी आज ही के दिन। इस पार्टी का स्थान हमने चुना फोर्ट विलियम गोल्फ क्लब का हाल तथा बगीचा।

फोर्ट विलियम भारतीय सेना के  अंतर्गत है , गैर सेना के लोगों को ये जगह वहां दी जाती थी , गोल्फ क्लब के  सदस्यों की सिफारिश पर।  इस शर्त पर की अगर सेना का  कार्यक्रम नहीं हुआ तभी वो जगह दी जायेगी।  हमने ३-४ हफ़्तों पहले ही वहां अड्वान्स देकर अपनी तारीख   सुनिश्चित कर ली थी। निश्चित दिन से  चार पांच दिन पहले मेरे पास फोर्ट विलियम क्लब से फोन आया - ' सर आपकी बुकिंग हमारे पास ३१ ऑक्टोबर शाम के  लिए है , लेकिन उस दिन अचानक एक डिफेन्स का कार्यक्रम तय हो  गया है , इसलिए हम आपको हमारी जगह नहीं दे सकेंगे। '

हमारे पार्टी के  निमंत्रण पत्र बंट चुके थे। लेकिन नियमों के आधार पर हम विरोध भी नहीं कर सकते थे। हमने पार्टी  एक दिन पहले यानि ३० ऑक्टोबर की रख दी।  सबको फोन पर सूचित करना पड़ा। ईश्वर की दया से हमारा कार्यक्रम अच्छी तरह संपन्न हो गया।

अगले दिन सुबह रेडियो और टीवी पर दुखद खबर  आई - ' प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या हो गयी। ' ३१ ऑक्टोबर  नहीं बल्कि  अगले हफ्ते भर तक कोलकाता शहर में कोई पार्टी या कार्यक्रम नहीं हुए।  क्या हुआ ये मेरे  पाठक जानते ही  हैं।

हर बात के पीछे कोई न कोई कारण छुपा होता है ;  है या नहीं ?

Monday, October 20, 2014

जिम्मेवारी - एक लघु कथा

हमेशा की तरह घर पहुँच कर उसने बीवी के हाथ में अपनी महीने भर की पगार रख दी और बोला - ' ये  लो दस हजार  रुपैये !' उसकी पत्नी छूटते ही बोली - ' दस हजार रुपैये ? क्यों ? तुम्हारी पगार तो पंद्रह हजार है ?'

उसने सफाई दी - ' हाँ , है तो पंद्रह ही , लेकिन सुबह माँ का फोन आया , कहने लगी बहुत तंगी है , दवाओं का खर्च बढ़ गया है ; सो मैंने पांच हजार उनको भेज दिए !'

बीवीजी का पारा सातवें आसमान पर चढ़  गया। बिफर कर बोली -' किसी तरह से तुम्हारी पगार में घर का खर्च चला रही हूँ।  इसमें से भी अगर तुम दान पुन में लग जाओगे तो मेरे बस का नहीं ये घर चलाना ! जिस लाड़ले बेटे के पास रहती है वही क्यों नहीं खर्च उठाता ? नहीं उठाता तो फिर ये हमारी जिम्मेवारी कैसे बन गयी ? '

उसने उसी नरमी से कहा - ' ये सच है की वो उसका खर्च नहीं दे रहा , इसी लिए  तो मेरे पास फोन आया था। जहाँ तक जिम्मेवारी का सवाल है , तो दामाद भी बेटे की तरह ही होता है , उस हक़ से उन्होंने फोन किया और उसी हक़ से ये हमारी जिम्मेवारी बनती है। '

बीवी जी को तो काटो तो खून नहीं।  आँखों से झड़ने वाली चिंगारी तरल आंसू बन कर झरने लगी।  कुछ क्षणों के लिए पतिदेव की आँखों में देखा और फिर गिर गयी उनके चरणों में।


Saturday, October 11, 2014

मन की बात

प्रधानमंत्री  मोदी ने कुछ दिनों पहले रेडियो पर  देश के लोगों को सम्बोधित किया। ये सम्बोधन अपने शीर्षक के अनुरूप उनके मन की ही बात थी। इस सम्बोधन में न  कोई राजनीति थी और न ही कोई चुनाव प्रचार।  लेकिन किसी व्यक्ति के  मन  की बात का सम्बन्ध उसकी कार्य शैली से कितना अधिक होता है , ये मैं आपको बताऊंगा। अगर आपने उनके मन की बात नहीं सुनी हो तो सुनिए इस लिंक के द्वारा -

Modi's Man KI Baat

अब मैं आपको बताता हूँ मेरे मन की बात। मोदी का ये प्रसारण था  3 ऑक्टोबर को। इस की एक बात जो मेरे मन को छू गयी वो थी - अपनी शक्ति को पहचाने। उन्होंने स्वामी विवेकानंद की एक कहानी का उल्लेख किया के एक शेरनी का एक बच्चा बिछड़ गया और भेड़ों के एक झुण्ड से मिल गया। उसकी  हरकतें धीरे धीरे भेड़ों जैसी हो   गयी।  फिर जब उसे  एक दूसरा शेर मिला उसने उसे अहसास दिलाया की वो एक शेर है भेड़  नहीं।

उस दिन मोदी की  ये बात एक सामान्य शिक्षा से अधिक  नहीं थी।

कुछ दिन पहले देश की सीमा पर पाकिस्तान ने बिना किसी कारण ही बमबारी शुरू कर दी। निहत्थे निरपराध नागरिक मारे गए। ऐसी घटनाएँ पहले भी होती रही है। लेकिन देश की पूर्व सरकार ऐसी घटनाओं को महत्व नहीं देती रही है। वास्तव में कांग्रेस  सरकार कुछ भी करने में विश्वास नहीं करती थी।  हमारी सीमा के  अंदर घुस कर देश के जवानों के सर काट कर उन्होंने सीमा पर फेंक दिए , विदेश मंत्री ने कहा हमें संयम से काम लेना चाहिए। चीन की फ़ौज हमारी सीमा  तक घुस आई , लेकिन हमारे विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने इसे कोई बड़ी बात नहीं माना।

हमें हमारी शक्ति का परिचय करवाया - मोदी ने।  पहले जब पाकिस्तान से आये  हुए पाकिस्तान के डेलीगेसन ने  सरकार की चेतावनी  को अनसुना देते हुए अलगाव वादी हुर्रियत नेताओं से बात चीत की , तो मोदी ने   बिना किसी वार्ता के उन्हें लौटा दिया।   नवाज शरीफ ने युएन ओ में भारत  के खिलाफ झूठ का पिटारा खोला तो मोदी ने पूरे विश्व के सामने  उसे सलाह दे दी की बातचीत करनी है तो पहले  अपनी आतंकवादी गतिविधियाँ बंद करो।

असली उत्तर पाकिस्तान  को मिला दो दिन पहले -  जब प्रधानमंत्री मोदी ने देश की फ़ौज को पूरा अधिकार दे दिया कि ईंट का जवाब पत्थर से दो।   पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाकों में भारतीय सेना ने जो जबरदस्त जवाबी  हमला बोला ,  पाकिस्तान की सेना उलटी भाग खड़ी  हुई।  दो दिन की पूरी शांति बाद पाकिस्तान सही रास्ते पर आ  गया है ; भारत से बातचीत की फरियाद कर रहा है । सच है लातों के भूत बातों से नहीं मानते हैं।

सचमुच मोदी ने देश की जनता और सेना को अपनी स्वयं की ताकत से पुनः मिलवा दिया है।