नील स्वर्ग

नील स्वर्ग
प्रकृति हर रंग में खूबसूरत होती है , हरी, पीली , लाल या फिर नीली

Wednesday, June 4, 2014

एयर इंडिया

अच्छा समय आने वाला है ; मोदीजी की आशावादिता पूरे भारत पर भले ही लागू हो सकती है , लेकिन एयर इंडिया पर नहीं।  '  हम नहीं सुधरेंगे '- के सिद्धांत पर अडिग है एयर इंडिया ! आप सोचेंगे की बिना मौसम बरसात की तरह मैं क्यों आज एयर इंडिया के पीछे पड़ा हूँ।  लीजिये मेरा ये अनुभव पढ़िए और फिर आप तय कीजिये कि कौन किसके पीछे पड़ा है .

कुछ दिनों  पहले एक कॉन्फरेंस के लिए चेन्नई गया था। अगले दिन शाम को वहां से हैदराबाद जाना था।  मेरे बच्चों की मुझे सख्त हिदायत दे रखी है कि कोई  टिकट न मिले तो यात्रा रद्द कर देना लेकिन एयर इंडिया से मत जाना। लेकिन मैंने अपनी मूर्खता का सहारा लेते हुए इस लिए एयर इंडिया की टिकट खरीद ली थी , क्योंकि वो दूसरी एयर लाइन से काफी  सस्ती थी। मैंने सोचा की यात्रा पूरी होने के बाद बच्चों को बताऊंगा कि तुम्हारी बात न मान कर मैंने कितने पैसे बचाये।

एयरपोर्ट पहुँच कर चेक इन किया तो पता चला की फ्लाइट अपने निर्धारित समय ५ बज कर २० मिनट पर उड़ने वाली है। ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा।  मन ने कहा - आखिर अच्छे दिन आ गए हैं। समय पर बोर्डिंग की घोषणा हो गयी। बस में बैठ कर जब विमान के पास पहुंचा तो पूरा विश्वास  हो गया की अब सब कुछ सही चल रहा है। हमसे पहले एक और हमारे बाद एक और यात्रियों से भरी बस आकर खड़ी  हो गयी. बस यहीं से शुरू हो गयी वही पुरानी वही कहानी - एयर इंडिया स्टाइल।

१५-२० मिनट तक खड़े रहने के बाद भी किसी ने आकर बस का दरवाजा खोलने का निर्देश नहीं दिया।  एयरपोर्ट के अंदर की बसों में बैठने   सिर्फ ८-१० सीटें ही होती है , बाकी २०-३० यात्री किसी तरह से फंस कर  खड़े रहते हैं। लगातार एक ही स्थान पर इतनी देर  तक खड़े खड़े लोगों का गुस्सा बढ़ना शुरू हुआ।  स्थिति को भांप कर एक वयोवृद्ध महिला ( एयर इंडिया में सभी वयोवृद्ध ही होते हैं ) बस में आई , उसने कहा - प्लेन में कोई टेक्नीकल स्नैग होने की वजह से ये विलम्ब हो रहा है।  मैंने कहा - मैडम , क्या बोर्डिंग की घोषणा करने के पहले आपके यहाँ टेक्नीकल चेक पूरी करने का प्रावधान नहीं है। दुसरे अगर ऐसी  समस्या है तो यात्रियों को इस प्रकार अमानवीय तरीके से बसों में भर कर रखने का क्या औचित्य है। देवीजी ने आश्वासन दिया कि दस मिनट के अंदर समस्या दूर हो जायेगी और सब से शांति बनाये रखने का अनुरोध किया। दस मिनट में समस्या तो नहीं सुलझी लेकिन देवीजी ने घोषणा कर दी की ये विमान अब नहीं जाएगा , इस लिए सभी को वापस टर्मिनल बिल्डिंग में जाना है।

वहां पहुँच कर कहा गया की आप अपने बोर्डिंग पास नए ले लेवें।  विकल्प की व्यवस्था होने पर ले जाया जाएगा। यह भी कहा गया कि जो यात्री न जाना चाहें , अपनी टिकट कैंसल करवा सकते हैं। मैं असमंजस में था तभी घोषणा हुई की यह यात्रा अब रात  ९ बजे होगी। यह सुनकर मैंने मन बना लिया की अब नहीं जाना इस विमान में। ९ कह रहें हैं बाद में फिर कितना और विलम्ब कर दें। मैंने पता किया दूसरी एयरलाइंस में। हैदराबाद जाने वाली सभी फ्लाइट जा चुकी थी। मैंने सोचा की अब चेन्नई में होटल का पैसा चुकाने से अच्छा है , की अपने घर मुंबई चलें।  एक बहुत महंगी टिकट मिली स्पाइस जेट में। वो लेकर मैं गया एयर इंडिया के काउंटर पर। मैंने कहा मेरी टिकट कैंसल कर दीजिये , और मेरा सामान वापस मंगवा दीजिये।

देवीजी ने कहा - आप क्यों कैंसल करना चाहते हैं , अब हमारा विमान ठीक हो गया है और थोड़ी देर में उड़ सकेगा। मैंने अपना सर पीट लिया. मेरी स्पाइस जेट की टिकट कैंसल होने की सीमा के बाहर  थी। मैंने गुस्से में कहा - देवीजी , आप लोग खुद नहीं जानते की आप क्या कर रहें हैं। मेहरबानी करके मुझे मुक्त कर दीजिये।  बड़ी मुश्किल से मेरा सामान वापस लाया गया।

कैसे किसी यात्रा को एक अभूतपूर्व कटु अनुभव के रूप में बदला जाए - इस पर महारत हासिल है - एयर इंडिया को।  मैंने हमेशा के लिए मेरे बच्चों की बात मान ली है - भर पाये एयर इंडिया से !


Thursday, March 20, 2014

मयंक गांधी से बातचीत

कल सुबह बड़ा मजा आया।  मैं अपनी सुबह की  सैर के लिए जुहू जॉगर्स पार्क पहुंचा , तो देखा कि वहाँ आम आदमी पार्टी के कुछ कार्यकर्त्ता पार्क के प्रवेश द्वार पर खड़े होकर पर्चे पकड़ा रहे थे और आने वाले चुनाव के लिए प्रचार कर रहे थे। सभी लगाये हुए थे आप कि चिर परिचित टोपियां ! मैं रुक गया। एक चेहरा था आप की  मुम्बई इकाई के मुख्य नेता और आगामी चुनाव में मुम्बई उत्तर पश्चिम के प्रत्याशी श्री मयंक गांधी का । मयंक को कई बार मैंने सुना है टाइम्स नाऊ के वाद विवाद कार्यक्रमों में। बहुत संयत व्यक्ति हैं।  बोलने के लिए अपनी बारी की  प्रतीक्षा करते हैं। तीखे कटाक्षों को सुनकर भी मुस्कुराते रहते हैं।

मैंने मयंक से कहा - मयंक भाई , जब आप लोगों ने इंडिया अगेंस्ट करप्सन का अभियान शुरू किया था , तब मैं भी अन्ना  की  टोपी पहन कर अँधेरी स्टेशन से शुरू होने वाले जुलुस में शामिल होने गया था।  मेरे मन भी भ्रष्टाचार के विरोध में वही भाव था , जो आप सब के मन में था। जब अरविन्द ने राजनैतिक दल बनाया तो भी मैं अरविन्द के साथ था , और अन्ना के विरोध को मैं गलत समझता था। आप के दिल्ली के चुनाव प्रचार के समय भी मैं मन से आपके साथ था ; लेकिन चुनाव के बाद जब आपने कांग्रेस की  मदद से अपनी सर्कार  बनायीं तो मैं बिलकुल चौंक गया था। दिन रात शीला को गालियां देकर चुनाव में २८ सीटें प्राप्त करने वाली आपकी पार्टी ३७  के आंकड़ें तक पहुँचने के लिए उसी भ्रष्ट  कांग्रेस की  मदद लेने को तैयार हो गयी।

साथ में श्रीमतीजी भी पूरी तैयार तैयार थी , बोली - सर्कार बनाने के बाद कहाँ गए आप के सभी आरोप जिसके आधार पर आप शीला को अंदर करने वाले थे ?

हिम्मत कर के मयंक ने कहा - बिना प्रभावी लोकपाल ले हथियार के ये सम्भव नहीं था , इसलिए हम  जन लोकपाल वाला बिल लाये।

मैंने फिर मेरा प्रश्न दागा - तो आप क्या ये सोच कर लाये थे कि ऐसा लोकपाल बिल आपकी सहयोगी पार्टी कोंग्रेस पास होने देगी ? और अगर आप ये जानते थे तो इसका अर्थ ये हुआ , कि आप इस तरह गलत सहारे की  सर्कार से छूट कर भग्न चाहते थे।

फिर मैंने उनका दिया हुआ चुनावी परचा हाथ में लिया।  उसमे नारों के अलावा जो वाडे थे वो इस प्रकार थे -
1. Reduction of domestic power tariff by 50% ( Less Than 300 units consumed)
2. Providing alternate housing before a slum is demolished.
3. Construction of SRA schemes by MHADA, not private builders.
4. A free home measuring 450 sq. ft. (carpet area) for slum dwellers.
5. Generating opportunities for employment and reshaping policy.
6. New schools and health care units.

मैंने पूछा - भाई साहेब , आप राज्य का चुनाव लड़ रहे हो या संसद का ? ये तमाम बातें तो मुम्बई से जुडी हैं। देश के लिए आपकी क्या योजना है इसका तो कहीं नामोनिशान नहीं है।

मयंक तो कुछ नहीं बोले लेकिन उनके एक साथी ने कहा - ये सब तो चुनाव में लिखना पड़ता है !

मैंने फिर घेरा - ये सब बातें तो आपने दिल्ली के विधान सभा चुनाव में भी कही थी न ; क्या हुआ
उन सब का ?

उनके पर्चे में आगे लिखा था -

I Promise-
1. I will not avail of any VIP perks or security.
2. If I am found guilty of corruption, you will have the right to penalise me..
3. To seek the opinion of my electorate before a parliament session.
4. I will do my bestand usher in 'Swaraj'.

यानि एक बार फिर वही थोथी बातें जो अरविन्द और उनके आप के साथियों ने दिल्ली में कही थी और किसी बात पर सच्चे नहीं उतरे थे।  मुम्बई का वोटर बहुत जागरूक है।  ऐसी हलकी चुनावी बातों के झांसे में वो आने वाला नहीं है।  अगर आप ने   पूरे मुम्बई शहर के लिए ऐसे ही झूठे वादों कि दावत तैयार कि है तो आप विश्वास रखें यहाँ से आम आदमी को किसी भी आम आदमी का वोट नहीं मिलेगा।

तब तक दो चार व्यक्ति और जुड़ गए थे।  एक सज्जन ने बड़ा ही तीखा प्रश्न किया - अगर आप की  लड़ाई कांग्रेस के साथ थी , तो आप बेमतलब नरेंद्र मोदी के खिलाफ क्यों प्रचार कर रहें हैं ? अगर आप चाहते हैं कि देश में सर्कार न कांग्रेस की   और न बीजेपि कि तो क्या देश में ऐसी ही अस्थिरता बनी रहे ? देश नरेंद्र मोदी का समर्थन कर रहा है , ऐसे में आपकी पार्टी उनके  वोटों को काट कर कांग्रेस की  ही मदद कर रही है। जब आप जानते हैं कि आपकी  से ज्यादा नहीं आने वाली तो फिर आप इस तरह बेमतलब की  कवायद क्यों कर रहें हैं ?

इसका जो उत्तर मयंक ने दिया वो शायद उनका सबसे सच्चा और जोरदार उत्तर था।  मयंक ने कहा - मित्रों , जैसे कंप्यूटर में एक होता है ऑपरेटिंग सिस्टम और दूसरा होता है एंटी -वायरस ; उसी तरह हम  भी जानते हैं कि हम  ऑपरेटिंग सिस्टम तो नहीं बन सकते , लेकिन एंटी वायरस का काम तो जरूर कर सकते हैं।

मैंने बात ख़त्म की - मयंक भाई , मैं आपके दल को वोट तो नहीं दे सकता लेकिन आपकी साफगोई के लिए आप को शुभकामना जरूर दे सकता हूँ ; ईश्वर आपका और देश का भला करे !


Sunday, March 2, 2014

बाजी नरेंद्र मोदी के हाथ !

देश में चुनाव का मौसम पूरे शबाब पर है। माहौल कुछ ऐसा चल रहा है , जैसे कि इस बार का चुनाव किसी भी पार्टी के लिए जीत कर सत्ता में आने के लिए नहीं है ; बल्कि नरेंद्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनने  से रोकने के लिए है।  कितनी विचित्र बात है , जिसे देश की जनता अपना नेता मान चुकी है , उसे रोकने के हथकंडे बाकी सारे दल खुले आम कर रहें हैं।

कांग्रेस बिलावजह प्रचार में करोड़ों रूपया फूंक रही है। दस साल के असफल शासन के बाद किस मुंह से ये पार्टी वादे कर रही है। एक ऐसा प्रधानमंत्री जिसके मुंह में जुबान नहीं है वो नेतृत्व कहाँ कर रहा है ; वो तो ऐसा लगता है किसी की नौकरी बजा रहा है। कम से कम देश की  तो नहीं।

और उनका युवा नेता ! जिसने इन दस सालों में किसी भी योग्यता का एक भी परिचय नहीं दिया ; जिसका संसद में होना न होना एक सा था ; जो व्यक्तिगत इंटरव्यू में एक रटे  रटाये तोते की  तरह बात करता है ; जिसने अपने राजनैतिक जीवन में कोई भी मंत्रालय कभी नहीं सम्भाला - ऐसे व्यक्ति को देश की  जनता क्या प्रधानमंत्री पद के लिए चुनेगी ?

कांग्रेस के साथी ऐसे गायब हो गएँ हैं , जैसे डूबते जहाज के चूहे।  एक मात्र लालू यादव बचे हैं , जो अब कांग्रेस को सीटों के बंटवारे पर आँख  दिखा रहें हैं।

आम आदमी ! दिल्ली के चुनाव में जिस प्रकार के जन समर्थन के साथ ऊपर आयी ; जितने बड़े बड़े वादे  जनता से किये - वो तो उसी दिन आधी हो गयी थी, जिस दिन उसने उस कांग्रेस पार्टी का , जिसको निरंतर दिन रात गालियां देकर वो चुनाव जीत कर आये थे ; उसी का समर्थन स्वीकार कर के सर्कार बना बैठे। यहाँ से उनके पतन का ऐसा दौर शुरू हो गया ; जो उनकी सर्कार के इस्तीफे के साथ ख़त्म हुआ।  न तो सर्कार बनाने का कोई औचित्य था , और न ही इस्तीफे का। सारे वादे खोखले साबित हो गए। ऐसी पार्टी किस मुंह से लोकसभा के लिए समर्थन मांगेगी ? उनका एक ही तरीका है - दूसरों को गालियां देते रहो , अपने आप ही जीत जाओगे।  बेसिरपैर के आरोप लगा देना उनकी फितरत है। शीला दीक्षित उनके आरोपों से अब मुक्त हो गयी है , क्योंकि उसे तो हरा दिया है।  अरविन्द केजरीवाल एक अजीब दुविधा में हैं ; पार्टी के लोग जोर डाल  रहें हैं कि वो सीधे नरेंद्र मोदी से टक्कर लें।   अरविन्द जानते हैं कि होना क्या है ! मोदी कोई शीला दीक्षित नहीं है , बी जे  पी दिल्ली वाली कांग्रेस नहीं है ; और सबसे बड़ी बात खुद अरविन्द केजरीवाल वो दबंग पाक साफ़ छवि वाले नेता नहीं रहें हैं।  लोकसभा चुनाव के बाद आम आदमी का नया नाम होगा - नाकाम आदमी !

और फिर वो एक समूह दिवास्वप्न देखने वालों का ! तीसरा मोर्चा - एक ऐसा अद्भुत प्रयास जिसका न कोई नेता है , न कोई आधार। हर नेता सिर्फ प्रधानमंत्री है। इन सभी पैबंदों को सिलने के लिए जिस सुई का प्रयोग किया जा रहा है उसका नाम है - सेकुलरिज्म या धर्म निरपेक्षता ! नरेंद्र मोदी की  लोकप्रियता कि तलवार से लड़ने के लिए इसी सुई का प्रयोग करते हैं।  सभी हारे हुए जुआरी हैं ! मुलायम , नितीश , जयललिता - तीनों अपने मन में प्रधानमंत्री बने हुए हैं।  बचे कम्युनिस्ट - उनके अजेंडे में प्रधानमंत्री बनना तो कभी था ही नहीं , बल्कि ज्योति बासु जैसे नेता को जब मौका मिला था तो उसे बनने  से रोकना था। लेकिन नियति इन चारों में से तीन की  तो स्पष्ट है - मुलायम पिछले विधानसभा की  चुनावी सफलता के बाद निरंतर लुढ़कते जा रहे हैं ; नितीश अपना दांव गलत जगह खेल कर हार चुके हैं  और बंगाल में ममता बनर्जी के सामने कम्युनिस्ट कहीं टिकने वाले नहीं।  बची जयललिता - वो कब अपना पलड़ा बदल लें ये कोई नहीं जानता।  जबकि करूणानिधि एड़ी चोटी  का जोर लगा रहें हैं - नरेंद्र मोदी की विरुदावली  गा  कर ; नरेंद्र मोदी इंतजार कर रहे हैं अपनी पुरानी  मित्र जयललिता के लौटने का .

जयललिता की  तरह और तीन चार  दल समय का इन्तजार कररहे हैं - तृणमूल की  ममता , ओड़िसा की  बीजेडी के नवीन  पटनायक , यु पी में बीएसपी की  मायावती और असाम में असम गण परिषद। चुनाव इस बार नरेंद्र मोदी को करना है कि किसे साथ रखें किसे नहीं।

पूरा  देश आशा भरी नजरों से देख रहा है - नरेंद्र मोदी की  और।  नरेंद्र मोदी के सिवा कोई भी नजर नहीं आता जो देश को इसकी खोयी हुई अंतर्राष्ट्रीय शाख दिल सके . देश कि त्रस्त  जनता महंगाई के थपेडों  से दुखी हैं ; ऐसे में सेकुलर और कम्युनल का झुनझुना कानों को नहीं सुनायी देने वाला।  ये बाजी नरेंद्र मोदी के हाथ ! शुभकामनायें !

Wednesday, February 5, 2014

एस्केलेटर का प्रयोग

कल हैदराबाद के हवाई अड्डे पर एक बड़ा विचित्र अनुभव हुआ।  वहाँ के नए हवाई अड्डे  में यात्रियों को हवाई जहाज में प्रवेश करने के लिए एक एस्केल्टर से नीचे उतरना पड़ता है , वहाँ से आगे बढ़ कर एयरोब्रिज के गलियारें में प्रवेश करना होता है। हुआ ये कि जब मैं एस्केलेटर से नीचे उतरा तो मेरे सामने वाले सज्जन नीचे उतर कर मेरे सामने खड़े हो गए और पास ही अपना बैग रख दिया।  वो आराम से अपने मोबाईल फोन पर बात करते रहे।  उन्हें ये ध्यान  नहीं था कि उनके ठीक पीछे एक चलती हुई सीढ़ी है जिस पसर बहुत सारे लोग एक के पीछे एक खड़े हैं।  मेरे पास कोई रास्ता नहीं था , मैंने उनके बैग को ठोकर से दूर किया और आगे बढ़ा।  मैंने लगभग चिल्लाते हुए उनसे कहा कि एस्केलेटर की  लैंडिंग को आप रोक कर खड़े हैं।  उन्हें मेरा ये कदम मेरी बदतमीजी लगा।  वो साहब बोले मेरे सामने जब एक लाइन लगी है तो मैं कहाँ जाऊं।  मैंने कहा आप सामने वाले को धक्का मार कर आगे बढ़िए वर्ना पीछे के सारे लोग एक के ऊपर एक गिर कर घायल हो जायेंगे, जैसा की  तेज गति वाले हाइवे पर अचानक ब्रेक लगा लेने से होता है। उस साहब को मेरी बात पसंद नहीं आयी।  खैर साहब , पसंद आये या न आये , मैं तो गिरने की  बजाय ठोकर से उनके बैग को हटा कर बचना ही पसंद करूंगा। 

         इस घटना के बाद मेरे मन में आया ; क्या दुनिया में एस्केलेटर का प्रयोग करने के कोई नियम कायदे हैं         भी या नहीं। मेरा सुखद अनुभव था , जब मैंने गूगल पर देखा ही दुनिया के हर देश के अपने कुछ तरीके           हैं , यानि के एस्केलेटर एटिकेट।  मेरे अध्ययन  के आधार पर मैं कुछ सुझाव यहाँ लिख रहा हूँ , जो हमें भी हमारे देश में अपना लेने चाहिए -

१. एस्केलेटर पर खड़ा होना या चलना , अपने देश के सड़क के नियम के अनुसार होना चाहिए।  हमारे देश भारत में हैं सड़क के बायीं तरफ चलते हैं ; इसलिए एस्केलेटर पर भी हमें बायीं तरफ खड़ा होना चाहिए। 

२. यदि हमारे साथ कोई बैग है , तो उसे भी अपने पास यानि बायीं तरफ रखना चाहिए न की बीचों बीच।  कभी भी कोई ट्रॉली, या बच्चे की गाडी एस्केलेटर पर नहीं लेनी चाहिए। 

 ३. आपके साथ आपका कोई मित्र या परिवार जन  है , तो आप उनके साथ साथ न खड़े होकर आगे पीछे ही खड़े होवें। 

४. हमेशा अपने बायीं तरफ वाली रेलिंग पकड़ कर रखें।  इसका कारण  ये है , अगर कभी किसी  कारण से एस्केलेटर झटके से रुके तो आप का नियंत्रण न बिगड़े।  ध्यान रहे , एस्केलेटर पर एक व्यक्ति का गिरना एक डोमिनो इफेक्ट की  तरह है , यानि जैसे कि साईकिल स्टैंड पर  अगर एक साईकिल गिरती है तो अपने साथ पूरी साईकिल की  लाइन को गिरा डालती है। 

५. और अब आती है वो बात जिसने मुझे ये लेख  लिखने पर मजबूर किया।  कभी भी एस्केलेटर के उतरने के स्थान पर यानि की  लैंडिंग पर खड़े न रहे। वहाँ खड़े  होकर आप एक बहुत बड़ी समस्या को निमंत्रण दे रहे होते हैं।  आपके पीछे वाला आदमी अचानक घबरा जाएगा।  वो कुछ भी कर सकता है ; यहाँ तक कि आपको धक्का देकर गिरा भी सकता है। और फिर वही डोमिनो  इफेक्ट। 

६. अगर आप एस्केलेटर से उतरना चाहते हैं तो आप उतरने के लिए दाहिनी तरफ का प्रयोग करें, जैसे कि भारत की  सड़कों पर ओवरटेक करने के लिए आप दाहिनी लेन  में जाते हैं ।  भाग कर उतरने की  कोशिश न करें।  

७ . और अंतिम बात ! अगर आप मोबाईल पर बात कर रहें हैं , तो भी आप को बात में इतना खो नहीं जाना चाहिए , जिसके कारण  आप ऊपर लिखे हुए नियमों को भूल जाएँ।  

बाकी बची हुई हिदायतें आप को नीचे दिया हुआ चित्र समझा देगा।  आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है। 






Friday, January 3, 2014

मुख्य मंत्री अरविन्द केजरीवाल



वैसे मैं आम आदमी पार्टी और अरविन्द केजरीवाल का प्रशंसक हूँ। अरविन्द ने एक बहुत अलग रास्ता दिखाया है देश की जनता को। जब देश की  राजनैतिक पार्टियां अरविन्द को ताने मार रही थी- देश के लिए निर्णय सड़कों  पर बैठ कर नहीं होते , उसके लिए चुनाव जीत कर संसद में आना होता है, अरविन्द ने उस चुनौती को स्वीकार किया और आम आदमी पार्टी को जन्म दिया।  अन्ना बिना किसी वजह के अरविन्द से अलग हो गए।  निर्णय अन्ना  का गलत था , अरविन्द का नहीं।

चुनाव की  भारी  सफलता के लिए भी अरविन्द बधाई के पात्र हैं।  दिल्ली के लोगों ने उनमे विश्वास जताया।  अरविन्द ने बहुत खुले शब्दों में ऐलान किया कि वो किसी भी पार्टी को न तो समर्थन देंगे और न ही लेंगे। इससे उनकी छवि और भी सुधरी। ऐसी घोषणा करते वक़्त शायद अरविन्द ने सोचा होगा की उनकी १५-१६ सीटें आएँगी और शायद किसी भी एक पार्टी को उनके सहयोग की  जरूरत पड़ेगी। लेकिन परिस्थितियां  कुछ अलग रंग लेकर आयी।

जब बी जे पी ने सर्कार बनाने से इंकार कर दिया , इसके बाद अरविन्द कि परीक्षा कि घडी आयी।  यहाँ से मैं अरविन्द के निर्णयों से सहमत नहीं हूँ। उन्होंने जनता से पूछने का एक नाटक किया - क्या उन्हें सर्कार बनानी चाहिए।  अरविन्द भाई , जनता अपना निर्णय चुनाव के माध्यम से दे चुकी होती है।  जिन्होंने आपको वोट दिया वो सर्कार बनाने के लिए ही दिया था, लेकिन तब जब आप के पास पर्याप्त बहुमत होता ।  एक बार जब जनता आप को चुन लेती है तो फिर निर्णय लेने का अधिकार जनता आप के हाथ में सौंप देती है। आपको हर निर्णय के लिए फिर जनता के पास जाने की  जरूरत नहीं होती।

आप अपने दिल से ही पूछ लेते कि जिस  कांग्रेस के विरुद्ध आप  जहर उगल उगल कर जनता के चहेते बने थे , क्या उसी की  बैसाखियों पर आप खड़ा होना चाहते हैं। क्या जनता के एस एम् एस निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।  एस एम् एस का कोई नाम नहीं होता।  कोई भी कहीं से कितने भी एस एम् एस भेज सकता है।  सर्कार बनाना कोई टेलीविजन का रियलिटी शो नहीं है जिसका फैसला जनता के एस एम् एस के आधार पर हो सके।  फिर आप को तो दिल्ली के लोगों से पूछना था , एस एम् एस तो पूरे देश से आते हैं।

कल आपने विधान सभा में एक बार फिर विश्वास प्राप्त करने का नाटक खेला।  क्या आपके पास कोई उत्तर था हर्षवर्धन के तीखे सवालों का ? आपका लिखा लिखाया भाषण अच्छा तो था लेकिन सच्चा नहीं था।  आप बात बात में ये कहते हैं कि आप को किसी का सहयोग नहीं चाहिए , दिल्ली की  जनता को चाहिए। ऐसा था तो फैसला दिल्ली की  जनता पर ही छोड़ते कि दोबारा चुनाव करवा के वो किस तरफ मुड़ेगी - इसका फैसला करती ।

अरविन्द आप मुख्य मंत्री तो जरूर बन गए लेकिन कहीं न कहीं आप लोगों के दिलों की  गद्दी से  नीचे उतर गए।  काउन्ट डाउन शुरू हो चूका है आपकी इस सर्कार के गिरने के लिए।  बचने की  एक ही सूरत है - या तो आप कांग्रेस  बन जाओ या  फिर कांग्रेस को अपने जैसा बना लो।  दूसरी बात तो होने से रही , पहली बात का डरहै , क्योंकि उस दिशा में पहला कदम आप ले चुकें हैं।

मेरी शुभकामनाएं अरविन्द !


Wednesday, January 1, 2014

वो एक अलग नए वर्ष की पूर्व संध्या

नए साल की पूर्व संध्या एक त्यौहार की  तरह मनायी जाती है। पुराने वर्ष को विदाई तथा नए आने वाले वर्ष का स्वागत लोग करते हैं - पार्टी से , नाच गा कर,  परिवार के साथ पर्यटन कर के और संगीत के साथ। मुझे याद आती है वो नव वर्ष की  पूर्व संध्या जब हमने - मैं , बहन सविता , जीजाजी अशोक जी , बेला , रेणु  और मेरे एक मित्र दंपत्ति पोद्दार - ने नव वर्ष का स्वागत किया ईश्वर की भक्ति के साथ।

उस वर्ष मेरे प्रिय अनुज  अनिल ( फुफेरा भाई ) के शरीर में कैंसर का रोग प्रवेश कर चुका  था। अनिल एक बहुत उत्साही युवक था जो जीना चाहता था। जनवरी से दिसंबर तक पूरे वर्ष उसने इस बीमारी से लड़ाई लड़ी। उस रात हम  सब ने मिलकर यज्ञ किया तथा ईश्वर से प्रार्थना की कि अनिल को इस भयंकर रोग से लड़ने कि शक्ति दे और इस रोग से मुक्त कराये। जब  रात के बारह बजे तो हमने उस उदास वर्ष को विदाई दी। एक  नए वर्ष में प्रवेश किया कुछ नयी आशाओं के साथ।

अगले वर्ष अनिल ने जीवन के बस नौ महीने पूरे किये और उसके बाद निकल गया अपनी अगली यात्रा पर। 

Wednesday, August 21, 2013

घटना और प्रतिक्रिया



 पिछले सोमवार , अगस्त १९, २०१३ की घटना ! बिहार के खघरिया जिले में स्थित एक रेलवे स्टेसन धमारा  घाट ! सुबह के करीब पौने आठ बजे का समय। एक तीर्थयात्रियों का समूह रेल की पटरियों के बीचोंबीच चला जा रहा था।  उनके एक तरफ थी प्लेटफार्म पर खड़ी   हुई गाडी - समस्तीपुर से मधेपुरा जाने वाली गाडी ; उनके दूसी तरफ खड़ी   थी मधेपुरा से लौटने वाली गाडी। यानि की ये भीड़ चल रही थी इन दोनों रेल गाड़ियों के बीच स्थित एक पटरी के बीचोंबीच। और तभी उस बीच वाली पटरी पर आ गयी ८० किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से चल रही राज्यरानी एक्सप्रेस। ट्रेन एक जोरदार हॉर्न की आवाज के साथ आई , लेकिन लोगों के पास आस पास छिटकने तक की जगह नहीं थी।  परिणाम स्वरूप ३७ तीर्थयात्री उस रेल के नीचे चटनी की तरह पिस गए। भीड़ का गुस्सा फूट  पड़ा। गुस्साई भीड़ ने राज्यरानी एक्सप्रेस के अलावा एक और पसेंजर गाडी को आग लगा दी। रेल के २० डिब्बे तहस नहस हो गए। रेल के जो अधिकारी सामने आये उन्हें मार पीट के अपनी गिरफ्त में ले लिया।   राज्यरानी एक्सप्रेस के दो ड्राइवर -राजाराम पासवान और सुशिल कुमार सुमन पर भीड़ टूट पड़ी। 

अब इस घटना की समीक्षा करें।  क्या गलती राज्यरानी एक्सप्रेस के दो ड्राइवरों की थी ? बिलकुल नहीं , ट्रेन के ड्राइवर स्टेसन से सिग्नल मिलने पर ही आगे बढ़ते हैं।  क्या गलती सिग्नल देने वाले व्यक्ति की है ? नहीं , क्योंकि उसका काम  वाली अन्य गाड़ियों की स्थिति देख कर सिग्नल देने की होती है।  अगर गलती किसी की है तो है वो मारे गारे तीर्थ यात्रियों के झुण्ड की।  ट्रेन की पटरियों के बीचोंबीच चलना वो भी जब दोनों तरफ दूसरी दो गाड़ियों की दीवारें बनी हो - एक बहुत ही मूर्खतापूर्ण बात है।  इस तरह के झुण्ड की एक और समस्या होती है।  जब दो चार लोग ऐसे रास्ते पर चल पड़ते हैं तो बाकी भीड़ भी उनके पीछे पीछे चल पड़ती है।  इस तरह झुण्ड में चलना उन्हें सुरक्षित होने का गलत आभास देता है।

खैर दुर्घटना तो हुई , लेकिन उसके बाद का भीड़ का गुस्सा ? क्या वो जायज है ? बिलकुल नहीं ! लेकिन गुस्सा जायज या नाजायज नहीं होता।  गुस्सा बस गुस्सा होता है।  जब कोई ऐसी घटना आँखों के सामने घटती है , लोगों के मन का आक्रोश  फट पड़ता है।

आइये अब इस घटना को प्रष्ठभूमि में रख कर चर्चा करें २००२ में घटे गोधरा के रेल काण्ड और उसकी प्रतिक्रिया के  विषय में।  सर्कार द्वारा नियुक्त नानावती कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार २७  फरवरी २००२ को अयोध्या से आने वाली रेल गाडी, जिसमे बहुत बड़ी संख्या में हिन्दू तीर्थयात्री सवार  थे - वो साबरमती एक्सप्रेस जब गुजरात के गोधरा जिले से गुजर रही थी ,तो उस पर एक बहुत बड़ी भीड़ ने पत्थरो से आक्रमण कर दिया।  उनमे से कुछ लोगों ने रेल के डिब्बों के दरवाजे खोल खोल के  उनमे जलती हुई मशालों के साथ पेट्रोल के खुले कनस्तर फेंक दिए।  परिणाम पूरी की पूरी  रेल एक जलती हुई गुफा के रूप में बदल गयी। इस पाशविक अपराध के परिणाम स्वरूप ५९ हिन्दू यात्री पत्थरों और आग के बीच बुरी तरह से मार डाले गए।


नानावती  कमीशन की रिपोर्ट खुलासा करती  है की ये साजिश गोधरा के एक मौलवी हुसैन उमरजी की थी। उसकी साजिश के अनुसार १४० लीटर पेट्रोल ख़रीदा गया।  अब्दुल रजाक मोहम्मद कुरकुर और सलीम पानवाला ने ये पेट्रोल २६ फरवरी की रात को ख़रीदा। इस साजिश पर पूरा कार्यक्रम बना अमन गेस्ट हॉउस में। रेल के डिब्बे S - ६ और S -७ को जबरन खोल कर हसन लालू नाम के व्यक्ति ने जलती हुई मशालें डिब्बों में फेंकी। बाकी सारे काम में शामिल थे - शौकत अली , इमरान शेरी , रफीक बटुक , सलीम जर्दा , जाबिर बहरा और शेरज बाला।  




इसके बाद जो कुछ गुजरात में हुआ वो एक साम्प्रदायिक प्रतिक्रिया थी। इस तरह के घिनौने, बिना किसी कारण के किये गए पैशाचिक  अपराध की प्रतिक्रिया बिलकुल स्वाभाविक थी।इस प्रतिक्रिया तथा फिर उसकी प्रतिक्रिया में ७९० मुसलमान तथा २५४ हिन्दू मारे गए। बेहिसाब संपत्ति का नुक्सान हुआ।


क्या अंतर है दोनों घटनाओं में ? दोनों ही घटनाएँ उदहारण हैं मानविक प्रतिक्रिया का !

नरेन्द्र मोदी पर राजनैतिक कारणों से निरंतर वार किये जाते रहें हैं।  नरेन्द्र मोदी के प्रशासन का असली मापदंड है २००२ के बाद चल रहे ११ वर्षों का राज्य , जिसने इतने बड़े नासूर को दोनों समाजों के दिल से मिटा कर एक सौहार्द का वातावरण तैयार किया।  इन ११ वर्षों में एक भी साम्प्रदायिक दुर्भाव की घटना नहीं हुई।