नील स्वर्ग

नील स्वर्ग
प्रकृति हर रंग में खूबसूरत होती है , हरी, पीली , लाल या फिर नीली

Tuesday, September 25, 2012

मूर्तिपूजा का व्यापार


मुंबई शहर में आजकल गणेश पूजा की धूम धाम है . पूजा के दिन के बहुत पहले ही इन मूर्तियों का निर्माण करने वालों की दुकाने सज जाती हैं . इन दुकानों पर लोग अपने घरों , कारखानों और मुहल्लों के लिए मूर्तियों का मोल भाव करते हैं . यानि की छोटे गणेश कम दाम में और बड़े गणेश अधिक दाम में उपलब्ध होते हैं . आजकल कुछ समाज सुधारकों ने एक और नया नारा दिया है -  आप इको फ्रेंडली (पर्यावरण अनुकूल ) गणेश ही लाइए; क्योंकि जब मुंबई के सभी गणेशों  को समुद्र में विसर्जित किया जाता है तो  उससे  पर्यावरण  का  बहुत अधिक ह्रास होता है .  

प्रायः हर मोहल्ले में गणेश जी की छोटी बड़ी प्रतिमाएं लगायी जाती है . उन प्रतिमाओं का भव्य  शृंगार किया जाता है . बेशुमार पैसे चंदे से इकट्ठे कर के इन प्रतिमाओ को सजाया जाता है . बड़े बड़े  पांडाल  बनते हैं . उन पंडालों की सजावट भी एक से बढ़ कर एक होती है . पंडालों के अलावा संगीत, प्रसाद, झांकियां आदि पर भी बहुत पैसा खर्च किया जाता है . लाखों लोग इन पंडालों में घूम फिर  कर आनंद लेते हैं .  

पिछले कई सालों से कई स्पर्धाएं शुरू हो चुकी हैं , जिसमें एक निर्णायक मण्डली चुनाव करती है की सबसे सुन्दर गणेश कहाँ के हैं . कई अलग अलग मापदंडों पर इसका आकलन होता है . बड़े बड़े पारितोषिक दिए जाते हैं - विजेता गणेश की प्रतिमा को .

मुंबई के लाल बाग़ नाम के इलाके की मूर्ति बहुत ही भव्य होती है ; पूरा लाल बाग़ का इलाका एक मेले के रूप में बदल जाता है . बेशुमार चढ़ावा आता है . करोड़ों रुपैये का खर्च और आमद होती है . इस पूजा के आयोजक - गणेश गली गणेशोत्सव के पदाधिकारी अपने गणेश को २००४ वर्ष से  'मुंबई का राजा'  कहते हैं .

२००८ में एक सज्जन श्री किशोर शर्मा ने एक वेबसाईट का निर्माण किया , जिसका नाम उसने रखा - मुंबई का राजा ( मराठी में मुंबई चा राजा ). इस वेबसाईट के माध्यम से उसने एक स्पर्धा शुरू की जिसमें गणेशोत्सव में जाने वाले लोग अपना मत डाल सकते हैं की उन्हें कौन सी गणेश प्रतिमा और पंडाल  पसंद आये . लोगों के मतों के आधार पर ये वेबसाईट ये फैसला करती है की मुंबई का राजा कौन  से गणेश हैं .पिछले सालों में कौन से गणेश विजेता या उपविजेता रहें हैं और कौन सिर्फ संत्वना पुरष्कार प्राप्त कर सके - ये सारे विजेता गणेश आपको सचित्र इस वेबसाईट पर नजर आयेंगे . आप स्वयं देख सकते हैं- इस वेबसाईट पर - www.mumbaicharaja.com

कुछ दिनों पहले लाल बाग़ वाली संस्था ने मुंबई हाई कोर्ट में इस वेबसाईट के विरुद्ध एक याचिका दर्ज करायी . उनका दावा था कि लालबाग के गणेश को ये पद हमेशा से प्राप्त है , इसलिए इस वेबसाईट को कोई अधिकार नहीं कि वो इसका फैसला करे कि मुंबई का राजा कौन सा गणेश बने . हाई कोर्ट ने अपना निर्णय सुना दिया कि किशोर शर्मा की वेबसाईट ने किसी के अधिकारों का कोई उल्लंघन नहीं किया है . इस प्रकार हाई कोर्ट ने लालबाग के गणेश आयोजकों का दावा अस्वीकार कर दिया . अब मुंबई के किसी भी क्षेत्र के गणेश को ये पदवी जीतने का अधिकार  है .

मूर्ती पूजा के पक्षधर लोगों का ये दावा होता है कि साधारण मनुष्य अमूर्त ईश्वर को समझ नहीं पाता इसलिए उसमें अपनी आस्था नहीं ला पाता , लेकिन जब वो उसी ईश्वर की प्रतिमा को देखता है तो उसे ईश्वर की भक्ति में खो जाने का भाव प्राप्त होता है . लेकिन क्या वास्तव में ईश्वर की मूर्ती किसी प्रकार की भक्ति का विषय है ? मुंबई में चल रही गणेशोत्सव की प्रतिस्पर्धा और कारोबार से तो यह लगता है कि मूर्ती पूजा  एक सम्पूर्ण व्यापार का रूप है . आम आदमी इस पूरे मेले में एक मनोरंजन को प्राप्त करता है ; आयोजक इसके नाम पर अच्छी खासी धनराशी जुगाड़  कर पाते हैं . और जब इस कारोबार की स्पर्धा और इर्ष्या बहुत अधिक बढ़ जाती है तो लोग कोर्ट कचहरी तक चले जाते हैं . इसे पर्यावरण के ह्रास का कारण अब स्वयं मूर्तिपूजक मानने लगे हैं .

Saturday, September 15, 2012

हाउज दैट !

स्थिति कुछ ऐसी है ! एक पचास ओवर का क्रिकेट मैच चल रहा है। बैटिंग करने वाली टीम कुछ कर नहीं पा रही . 48 ओवर में 48 रन बने हैं . एक सिरे पर कप्तान खड़े रहने की भरपूर कोशिश में हैं , लेकिन दुसरे सिरे पर बल्लेबाजों का आवागमन जारी है . मजे की बात है सभी बल्लेबाज अजीब अजीब तरीके से आउट  हो रहें हैं . कोई हिट  विकेट हो गया , तो किसी ने सीधी  गेंद को हाथ से रोक दिया; एक का तो बाउंसर गेंद पर सर ही फूट  गया . दो बल्लेबाज तो क्रीज के बाहर जाकर मारने के चक्कर में स्टम्प आउट  हो गए . टीम के एक युवा और उदीयमान खिलाडी जिनसे बहुत उम्मीदें थी , तथा जिन्हें भविष्य का कप्तान बताया जा रहा था ; वो तो पविलियन से बाहर  आने को ही तैयार नहीं हैं . दो अन्य खिलाडियों ने पविलियन में बैठे बैठे तबियत ख़राब का बहाना बना दिया . अब ये अंतिम बची जोड़ी क्रीज पर है . गेंदबाज लगभग हर गेंद पर अपील कर रहें हैं . गेंद हर बार कप्तान के पैड से टकराती है और एल बी डब्लू की अपील होती है .दर्शक जोरों से हूट कर रहें हैं . कमेंटेटर निरंतर कोस रहें हैं कप्तान को . कहते हैं की कप्तान के हाथ पाँव ऐसे फूल  गए हैं मानो  लकवा मार गया है . विरोधी टीम इंतजार कर रही है की कब ये कप्तान आउट हो और हमारा नंबर आये .

अचानक कप्तान ने अम्पायर से एक मिनट का समय माँगा , और पानी पीने के बहाने सीमा रेखा पर  अपनी महिला मैनेजर से मुलाकात की . महिला मैनेजर ने गुस्से में बस एक वाकया कहा - हिट  आउट और गेट आउट ! कप्तान साहब वापस क्रीज पर आये . इस बार उनके तेवर बदल गए . जैसे ही एक तेज गेंद सामने से आई उन्होंने जोर से कहा - ' जो बोले सो निहाल ' और आँख मूँद कर गेंद पर जड़ दिया . और फिर यही सिलसिला चला बाकी बची हुई गेंदों पर भी . मैच अब भी चल रहा है , और लोग साँसे थामे कप्तान साहब के लौटने का इंतजार कर रहें हैं .

जी हाँ यही कहानी है - यु पी ऐ सर्कार की . लगातार दो इनिंग बैटिंग कर के कहाँ पहुंची ये सर्कार . आये दिन एक नया घोटाला ! रोज एक मंत्री आउट ! मनमोहन सिंह कहाँ तक झेलेंगे . और अब तो वो खुद कोल गेट कांड के कटघरे में हैं . उनकी नीतियों के कारण  उनके घटक दल तक उनके साथ बैटिंग करने से इनकार कर रहें हैं . युवराज राहुल की बहुत जोरों से इन्तजार हो रही थी , की सितम्बर में अवतरित होंगे और उबारेंगे  सर्कार को . लेकिन ये क्या अवतरण की जगह तो युवराज अंतर्ध्यान हो गए ! और ठीक ही है ! कौन किरकिरी करवाए ऐसी बिगड़ी हुई अवस्था में !

और इस सर्कार के अंतिम ओवर शुरू हो गए हैं पिछले दो दिनों से . महारानीजी से चर्चा के बाद प्रधानमंत्रीजी ने तेवर बदल लिए . परसों दो जोरदार छक्के  लगाने की शोट मारी - डीजल की कीमतों में 12-13 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर के ! दूसरी घोषणा रसोई घर के लिए - साल में छह सिलिंडर तो मिलेंगे पुरानी  कीमतों पर लेकिन उसके बाद के सिलिंडर मिलेंगे करीब करीब दुगनी कीमत पर . सन्देश ये हुआ , की अब आप एक दिन छोड़ कर एक दिन खाना खाएं . रोज खाने की रंगीनी चाहिए तो फिर दुगनी कीमत देने के लिए तैयार रहिये . देश चौंक गया . ये क्या हुआ ? कुछ ऐसा हो गया की अपनी इज्जत बचने के लिए महारानी पद्मिनी ने जोहर व्रत करने का फैसला कर लिया हो . मनमोहन जी के तेवर भी ऐसे ही हैं . .......साला , बहुत हो गया ............जनता गयी तेल लेने ............मरने दो सालों को !............. ममता और करुणानिधि के नाटक तो होने ही हैं ................. कौन सहेगा ..............................

फिर अगली जबरदस्त शोट लगी कल . सर्कार ने एक रुके हुए फैसले को लागु करने की घोषणा कर डाली . विदेशी निवेश - मल्टी  ब्रांड रिटेल में 51 % और उड्डयन उद्योग में 49 % तक .....................मनमोहन के तेवर और आक्रामक .................आओ सालों ...............अब आओ ..............करो विरोध ...................जब तक  सांस है लडूंगा .................चल कबड्डी ....कबड्डी ....कबड्डी .....!

अब इन सब के पीछे की राज नीति को समझे . कोल गेट में फंसी इस सर्कार का जाना तय हो चूका है . सुप्रीम कोर्ट तक ने जवाब तलब किया है . मुलायम सिंह का रवैया मुलायम नहीं रहा . ममता तो हमेशा से बौंडरी  पर खड़ी  रहती ही हैं . सबको  आगे आने वाले चुनाव दिखने शुरू हो गए हैं . सर्कार में रहने का स्वाद लेने का समय पूरा हो चूका है . सभी दलों के लिए अब समय आ गया है फिर से एक बार जनता का चहेता बनने  का। कांग्रेस ने इस बात को ताड़ लिया है . अब उसका मूड कुछ ऐसा है की - हम तो डूबेंगे सनम लेकिन तुमको भी ले डूबेंगे .

अब जब घटक और बाहर  से सहयोगी दल उनका साथ छोड़ेंगे तो उसका विषय होगा की उन्होंने कांग्रेस द्वारा लाये गए रिफोर्म्स पर सहयोग नहीं दिया, जैसा की कभी कमुनिष्टों  पर आरोप लगा था की उन्होंने सर्कार की परमाणु नीति पर साथ नहीं दिया था . कोल गेट कहीं पीछे रह जाएगा .  एक अमरीकी पत्रिका ने जो मनमोहन जी की खिल्ली उड़ाई है- ये कह के इनके निर्णय लेने की क्षमता समाप्त हो चुकी है . देश का व्यापारी वर्ग पहले से पालिसी परालिसिस की बात कर ही रहा है . कम से कम इन बड़ी बड़ी घोषणाओं से उन्होंने इन सब का मुंह बंद करने का प्रयास किया है .

लेकिन मनमोहन जी इन सब के लिए बहुत देर हो चुकी है . जनता आपसे बहुत सारे हिसाब पूछने वाली है अगले चुनावों में . लोकपाल का हिसाब , भ्रष्टाचार का हिसाब , महंगाई का हिसाब , आपके एक एक मंत्रियों का हिसाब , आपका हिसाब , आप की  खामोशी का हिसाब - और इस बार जातिवाद का ट्रंप कार्ड भी शायद काम नहीं आएगा , क्योंकि आम आदमी आपके विरोध में है चाहे किसी भी जाती का हो !

इंतजार है इस बोझिल इन्निंग के समाप्त होने का !


















Friday, September 14, 2012

राम नाम की लूट है ...........

ऐसा लगता है की देश की सर्कार बहुत जल्दी में है . बहुत जल्दी है सर्कार को अपने आप को  समाप्त करने की . वर्ना ऐसे वक़्त में जब कि  सर्कार घिरी पड़ी है कोल गेट के विवादों में , एक नया पिटारा डीजल के दामों को बढ़ा  कर खोलने की क्या जरूरत थी . वो भी एक साथ साढ़े तेरह प्रतिशत ! अगस्त में की गयी बढ़ोतरी को भी जोड़ दें तो दो महीने में अंतर हो गया 16% का !  ये अच्छा है ! घुट घुट कर मरने से अच्छा है एक साथ  ही शहीद हो जाएँ . 

मिडिया पूछती फिर रही है की इससे कीमतों पर या असर होगा . भई , क्या असर होगा ये बताने के लिए हमारे प्रधानमंत्रीजी की तरह कोई बहुत बड़ा अर्थशास्त्री होने की जरूरत नहीं . सीधा उत्तर है की हर चीज की कीमत बढ़ेगी . किस अनुपात में बढ़ेगी , ये सोचने का प्रश्न है . आइये एक उदहारण लेते हैं .

सूती कपडा बनाने के लिए कपास की जरूरत  होती है . कपास मिलता है खेतों से ; कपास का मूल्य बढ़ जाएगा क्योंकि खेतों में पैदा होने वाली हर चीज का मूल्य बढेगा ? नहीं समझे - बीज, खाद , ट्रैक्टर , सिंचाई की मोटर - हर वास्तु ही तो महँगी होगी न ?

कपास को मीलों तक ले जाने वाले परिवहन की कीमत बढ़ेगी . कपास से धागा बनाने वाली हर वास्तु महँगी होगी . धागे को जब कपडा बनाने वाली लूमों तक भेजा जाएगा तो वो परिवहन महंगा होगा . कच्चे कपडे को प्रोसेस करने वाली फैक्ट्रियों में भेजा जाएगा - यानि और महंगाई ! कपडा जाएगा सिलाई वाली फैक्ट्रियों में - उच्च और महंगाई . फैक्ट्रियों से वितरक और वितरक से विक्रेता तक पहुँचते पहुँचते कीमत में क्या बढ़ोतरी होगी , इसकी कल्पना आप करें . हर स्तर पर लगने वाले ट्रांसपोर्ट के मूल्य में करीब 10% बढ़ा  देवें - बस अंतर समझ में आ जाएगा . सर्कार को क्यों नहीं आता , पता नहीं !

विपक्ष का इस स्थिति में लाभ लेना तो समझ में आता है , लेकिन सर्कार की सहयोगी पार्टियाँ किस ख़ुशी में घडियाली आंसू  बहा रही है ? बंगाल की टी एम् सी मोर्चा निकालेगी . डी  एम् के मिडिया के सामने सर्कार को गरिया रही है . ये सब तमाशा किस लिए ? भाव बढाने का काम सर्कार ने किया है न की कोंग्रेस पार्टी ने ! एक मिली भगत है - हम भाव बढ़ा  देते हैं , आप लोग शोर शराबा करो , हम फिर एकाध रुपैया कम कर देंगे ; इस तरह से भाव भी बढ़ जायेंगे , विपक्ष की जगह सहयोगी दलों की मूछ ऊंची हो जायेगी , और सर्कार की दयालुता का एक नमूना बन जाएगा . 
 
ये सर्कार समझती है की पब्लिक बेवकूफ है ; लेकिन सर्कार ये नहीं समझ पा रही की वो इस वक़्त सिंहासन पर नहीं बल्कि ऐसे ज्वालामुखी पर बैठी है , जो अंगार बन कर देश की  जनता के दिलों में धधक रहा है ;   फूटेगा - उस दिन ये सारा तंत्र उसके लावा में मिल कर भस्म हो जाएगा .   


Saturday, September 8, 2012

प्रगति का मूल्य

मध्य प्रदेश में एक  प्रकल्प चल रहा है - औंकारेश्वर नाम का बाँध जिसकी क्षमता है 520 मेगा वाट और ये राज्य के बड़े बांधों  में आता है  . इस बाँध के प्रबंधन ने इसमें जल का स्तर 189 मीटर से बढ़ा  कर 193 मीटर कर देने का फैसला किया .इस फैसले से आस पास के गांवों के जीवन पर असर पड़ेगा . गाँव वालों का कहना है की चार मीटर जल का स्तर बढ़ने का अर्थ है उनकी सारी  जमीनों को जल में विसर्जित करना .


सर्कार की तरफ से कोई सुनवाई नहीं हो रही इसलिए घोघल  गाँव के वासियों ने एक  आन्दोलन शुरू  किया  है जिसका नाम है जल सत्याग्रह ! गाँव के 250 लोग इस सत्याग्रह  में भाग ले रहे हैं . सारे आन्दोलनकारी गर्दन तक जल में खड़े हैं पिछले 16 दिनों से . जो जल में नहीं है वो वहीँ किनारे पर बैठ कर भजन कीर्तन आदि से आन्दोलन कारियों का मनोबल बढ़ा  रहें हैं 

आन्दोलन का परिणाम क्या होगा ये तो भविष्य ही बताएगा , लेकिन आज के समय में सत्याग्रह की इससे अधिक मजबूत मिसाल नहीं मिलेगी .

Wednesday, August 29, 2012

सरकारी कोयले का रंग

मुद्दा ये है की देश के लेखा जोखा विभाग (सी ऐ जी ) ने सर्कार को लताड़ लगायी , की आपकी सर्कार लगातार 2004 से लेकर अब तक शासन  में है , और इस दौरान आपने देश की कोयला संपदा को मन मर्जी से बाँट दिया ; उनके अनुसार अगर ये खजाना बाजार की कीमतों के आधार पर बोली लगवा कर बेचा जाता तो जो पैसा सर्कार को मिलता , वो अब मिलने वाली कीमत से रुपैये 1 लाख 86 हजार करोड़ अधिक होता . यानि की आरोप ये बना की आपने सारा माल मिटटी के दाम में बेच दिया .जब इस रिपोर्ट पर 26 मई 2012  को  लोकसभा में बहस शुरू हुई तो एक तूफ़ान उठ खड़ा हुआ . तूफ़ान का कारण  था की कोयला विभाग सीधा सीधा प्रधानमंत्री के अधिकार में था .प्रधानमंत्री ने 29 मई को यहाँ तक कह दिया की अगर इस मामले में उनकी कोई गलती पायी गयी तो वो राजनैतिक जीवन से सन्यास ले लेंगे .विपक्ष ने जोरदार भाषा में प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग कर दी .

क्या हुआ क्या नहीं - ये मुद्दा निरंतर मिडिया में आ रहा है . मैं यहाँ दो मुद्दों की चर्चा करना चाहता हूँ . पहला मुद्दा सरकारी गणित का . वित्त मंत्री चिदंबरम ने एक प्रेस कोंफरेंस में कहा की नुक्सान कहाँ हुआ ,क्योंकि सारा कोयला तो अभी तक धरती माँ  की गोद में दबा पड़ा है . इस बात का क्या अर्थ हुआ ? भाई , आपने एक कोयले की खान को एक प्राइवेट पार्टी को बेच दिया , कीमत लेकर - फिर आपके पास क्या है , जिसके आधार पर आप कहते हैं की नुक्सान कहाँ हुआ है ? विचित्र गणित है सर्कार का . 

इस गणित की विचित्रता बढ़ाते हैं कपिल सिब्बल साहब . टाइम्स नाऊ से एक इंटर व्यू में उनका कहना था  की ये कोयला हमने कोई बेचने के लिए थोड़ी दिया है ; ये कोयला तो इस्पात और बिजली बनाने के लिए काम आएगा . वाह   सिब्बल साहब ! अगर किसी कंपनी को उसका रा मटिरिअल अगर सस्ते दाम पर दे दिया जाए तो उसमे उस कम्पनी का नफा और  क्या सर्कार का घाटा  नहीं होता .

बहरहाल , सर्कार ने जो नया पैंतरा खेला है उसके अनुसार उन्होंने कोयले की खान प्राप्त करने वाली 58 कंपनियों को नोटिस जारी किया है , की आपने अब तक कोयले का उत्पादन क्यों नहीं शुरू किया ; अगर आपके पास कोई संतोषजनक कारण  नहीं हुआ तो हम आपको किया हुआ आवंटन ही रद्द कर देंगे . यानी जब तक सब कुछ दबा ओढा  पड़ा रहे , सर्कार अपना फायदा कर के बैठी रही ; और जब फ़ाइल खुल गयी तो सारी  मुसीबत डाल  दो उन उद्योगपतियों पर जिन्होंने देश के औद्योगीकरण के लिए आपसे कोयला लिया . 

अगर आपकी नीति सही नहीं थी तो क्या ये दोष उन कम्पनियों का है , जिन्होंने आपसे कोयला माँगा ? क्या उन्होंने आपसे कोई जोर जबरदस्ती कर के कोयला माँगा ? और अगर उनकी तरफ से कोई कमी हुई भी है तो क्या आपकी स्क्रीनिंग कमिटी सो रही थी ?

सर्कार का ये तरीका बिलकुल गलत है ; सीधा सीधा देश के उद्योग पर प्रहार है . अगर सर्कार  ऐसे रंग बदलती रही तो विदेश में इस देश की क्या साख रह जायेगी ? बाहर  से पूँजी निवेश आना तो छोडिये , जो लगा हुआ है वो भी जाने लगेगा . सर्कार बौखलाई हुई है , और इस बौखलाहट में सारे निर्णय गलत ले रही है . इस सर्कार को भगवन बचा पायेगा या नहीं ये तो भविष्य बता पायेगा ; लेकिन अगर इस तरह  से 2 जी और कोयले के अपने आवंटन रद्द कर के सर्कार उद्योग का गला घोटेगी  तो फिर अगले चुनाव में उसे कोई नहीं बचा पायेगा .





Wednesday, August 22, 2012

क्या कहना है , क्या सुनना है

आखिर कांग्रेस ने चैन की सांस ली . अन्ना एंड कंपनी हार मान कर चले गए . जाते जाते ये धमकी दे गए की अब अगला मुकाबला चुनाव के मैदान में होगा . फिर आये बाबा रामदेव . उन्होंने अपनी सभा पहले कांग्रेस को निमंत्रित कर के शुरू की . बाबा भी जानते थे की कांग्रेस जैसी अहंकारी पार्टी के कानों पर जूं  भी नहीं रेंगेगी . उनका अगला दांव था , अन्य सभी राजनैतिक दलों को अपने मंच पर दावत देना . और लोग आये . खूब जम कर आये और जम कर बोले . कांग्रेस को कहने को एक बात मिल गयी की बाबा तो बी जे  पी के ही आदमी हैं . बाबा भी जोरदार गर्जना के साथ हरिद्वार चले गए .

कांग्रेस ने सुख की सांस ली . वो ये समझती है कि  खतरा टल  गया. उनका ये सोचना उस कबूतर की सोच की तरह है जो आँखें बंद कर के कल्पना करे कि  बिल्ली उसके सामने से हट गयी . कांग्रेस का खतरा अन्ना या बाबा नहीं , बल्कि स्वयं कांग्रेस है . एक के बाद एक घोटाला ! कोमनवेल्थ  ! टू  जी ! एअरपोर्ट की जमीन ! और अब कोयला कांड ! सारे एक से बढ़ कर एक ! लाख करोड़ अब भ्रष्टाचार की एक छोटी इकाई बन चुकी है . बतीस रुपैये की कमाई  को गरीबी रेखा की उपरी सीमा  बताने वाले देश में एक एक मंत्री लाख करोड़ की लूट मचा रहा है . और अब तो पानी सर से ऊपर जा चुका  है . पहले के सारे घोटाले तो अलग अलग मंत्रियों की देख रेख में संपन्न हुए थे , और विपक्ष तक भी प्रधानमंत्री को एक विफल लेकिन इमानदार प्रधानमंत्री मानता था . लेकिन इस बार तो सारे छलावे  समाप्त हो चुके हैं  . कोयला विभाग सीधा सीधा मनमोहन सिंह जी के अंतर्गत रहा है . कोयला खानों के सारे आबन्टन  उनके ही हस्ताक्षर से हुए हैं . ऐसे में कोई क्या कहे और क्या सुने . कपिल सिब्बल पालतू मंत्री की तरह कह रहें हैं की हमारे प्रधानमंत्रीजी कुछ भी गलत नहीं कर सकते हैं ; जिसका सीधा सीधा मतलब ये निकलता है की बाकी सारे मंत्री तो कुछ भी गड़बड़ कर सकते हैं लेकिन प्रधानमंत्री जी नहीं .

अन्ना और बाबा अपना अपना आन्दोलन कर के चले  गए - ऐसा कांग्रेस समझती है . आन्दोलन कोई आयोजन नहीं है ,जो 3-4 दिनों के लिए रामलीला मैदान या जंतर मंतर पर होता है . आन्दोलन एक वृक्षारोपण है , जो एक बीज को मिटटी में डालने से शुरू होता है . आन्दोलन उसी ख़ामोशी से आगे बढ़ता है जिस ख़ामोशी से मिटटी के नीचे दबा हुआ बीज अंकुरित होता है  और पनपता है . वो नजर तब आता है जब वो एक ऐसे विशाल पेड़ का रूप धारण कर लेता है , जो कठोर से कठोर तूफानों में भी सर उठाये खड़ा होता है . भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना और बाबा का आन्दोलन भी ऐसे ही एक बीज के रूप में प्रत्येक भारतीय के ह्रदय में पनप रहा है . और इसका विशाल रूप दिखाई देगा जब अगले चुनाव में पूरे देश का जनादेश इस भ्रष्ट सर्कार के खिलाफ दिखाई देगा .

ऐसे में याद आती एक गीत की पंक्तियाँ - ' कुछ न कहो , कुछ भी न कहो ; क्या कहना है , क्या सुनना है ; हमको पता है , तुमको पता है ,समय का ये पल थम सा गया है !'

Friday, August 3, 2012

कुछ तो लोग कहेंगे !

एक कहानी याद आती है . एक बाप और बेटा कहीं यात्रा पर पैदल जा रहे थे . साथ में उनका एक गधा चल रहा था . रस्ते में किसी ने व्यंग किया - देखो , कैसे बेवकूफ है ; दोनों पैदल चले जा रहे हैं , गधे पर नहीं बैठते . दोनों ने सोचा चलो गधे पर बैठ जाते हैं . फिर किसी ने फिकरा कस  दिया  - दो दो मुस्टंडे एक बेचारे निरीह प्राणी पर  लाद   कर जा रहे हैं . बाप ने कहा - बेटा, मैं उतर जाता हूँ , तो बैठा रह . फिर किसी ने फिकरा कसा - क्या जमाना है , जवान बेटा तो गधे पर मजे से बैठा है , बूढा बाप पैदल चल रहा है . बेटा बोला - बापू, लोग ठीक कह रहे हैं ; ये अच्छा नहीं लग रहा . आप बुजुर्ग हैं , आप गधे पर बैठो , मैं नीचे उतरता हूँ . फिर एक व्यंग आ गया - देखो बाप है की कसाई.  इतनी गर्मी में बेटा पैदल चल रहा है , लेकिन जालिम बाप मजे से सवारी कर रहा है . यानि दुनिया तो कुछ न कुछ कहेगी ही .

 
यही हुआ टीम अन्ना के साथ . जब टीम अहिंसक तरीके से अनशन के द्वारा लोकसभा में बैठे प्रतिनिधियों से गुहार कर रहे थे लोकपाल की ; तब लोकसभा में नेताओं के वक्तव्य आते थे ; कोई भी कानून सड़कों पर नहीं बनते . कानून बनते हैं लोकसभा में जहाँ चुने हुए जन प्रतिनिधि देश के हित के निर्णय लेते हैं . कई महानुभावों ने तो तो अन्ना को चुनौती  दे दी , की हिम्मत हो तो हमारी तरह चुनाव लड़ के दिखाओ ; और फिर बनाओ जो कानून तुम्हे बनाना है . एक साल के संघर्ष के बाद टीम अन्ना ने कल सबको चौंका दिया - ये कह के अगर यही रास्ता बचा है तो हम भी तैयार है चुनाव लड़ने के लिए .
 
अब वही सारे  महापुरुष कह रहे हैं की इनका असली अजेंडा तो यही था , सत्ता में आने का ! वाह ! चित्त भी मेरी और पट भी मेरी ! ये बहुत सही विचार है टीम अन्ना  का . एक वर्ष के संघर्ष में उन्होंने अपने लिए ऐसी छवि बना ली है की - किसी भी चिंतनशील व्यक्ति के लिए अन्ना की पार्टी ही पहला विकल्प होगी .
 
हार में से ही जीत का रास्ता निकलता है . इस यु पी ऐ सर्कार ने टीम अन्ना का तिरस्कार  और बहिष्कार करने में कोई कमी नहीं रखी .बेशर्मी से इन बहादुर युवकों के अनशन को भी अनदेखा करते रहे . और इसी परिस्थिति ने जन्म दिया टीम अन्ना के इस नए विचार को .
 
मेरी पूरी सहमति और शुभकामना - इस बहादुर सेनापति की बहादुर टीम को !