नील स्वर्ग

नील स्वर्ग
प्रकृति हर रंग में खूबसूरत होती है , हरी, पीली , लाल या फिर नीली

Thursday, August 2, 2012

रक्षा बंधन



रक्षा बंधन - एक ऐसा दिन जो याद दिलाता है हर भाई को अपनी बहन की रक्षा करने के  कर्तव्य का ! एक ऐसा दिन जब एक बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बाँध कर जताती है अपना विशवास अपने भाई की शक्ति में ! क्या भाई सिर्फ वो होता है जो उसका अपना सहोदर हो ; या फिर वो जो उसकी रक्षा करे भाई की तरह !

भ्रष्टाचार का प्रेत पूरे देश को निगल रहा है .  पहले इसके निवाले होते थे छोटे छोटे , लेकिन अब ये अजगर बहुत जल्दी  में है सब कुछ खा जाने के लिए  . सत्य वो नहीं है जो मिडिया हमें दिखने की कोशिश कर रही है  ; सत्य वो भी नहीं जो बहुत से तथाकथित बुद्धिजीवी टेलीविजन के वातानुकूलित स्टूडियो में बैठ कर बताते हैं ; सर्कार जो बताती है उसमे सत्य का कोई अंश तक नहीं है . सत्य ये है की चार देशभक्त - अन्ना , अरविन्द, गोपाल और मनीष सिसोदिया अपने प्राणों की बाजी लगाकर एक क्रांति लाने का प्रयास कर रहें हैं , इस देश में . मिडिया को जब कोई दूसरा कारण  नहीं मिलता , उन लोगों के खिलाफ कुप्रचार का , तो ये इल्जाम लगाते  हैं की उनका कोई छिपा हुआ राजनैतिक अजेंडा है . काश कोई राजनैतिक अजेंडा ही होता , कम से कम इस देश के भ्रष्ट राज नेताओं के सामने कोई देशभक्त तो खड़ा होता चुनौती  लेकर .

 आज रक्षा बंधन के दिन मैं आह्वान करता हूँ देश की तमाम बहनों का कि  आपके चार भाई दिल्ली के जंतर मंतर पर बैठे हैं , अनशन पर - सिर्फ आपकी और हम सब की रक्षा के लिए . जाइए और उन सब की कलाइयों   पर बांधिए राखियाँ अपनी भावना को साकार रूप देने के लिए . आपकी राखियों से जहाँ उन सेनानियों को बल मिलेगा , वहीँ देश के तमाम भाइयों को मिलेगी  प्रेरणा इस महायज्ञ में आहुति देने की ! और डरेगी ये सरकार  जो भ्रष्ट नेताओं का बचाव करने में लगी है .

Saturday, July 28, 2012

नारायण ! नारायण ! - एक लघु कथा

नेताजी अपने दफ्तर में बैठे हुए अपना काम कर रहे थे . तभी चपरासी ने कहा - सर , एक युवक आया है किसी गाँव से  , कहता है आपसे मिलना है . नेताजी ने कहा - जाकर पूछो कि  काम क्या है . चपरासी बोला - पूछा  था सर, कहता है कि वो आपका बेटा है .
नेताजी ने नजर उठाये बिना कहा - उसका नाम , पता , जन्म तिथि , उसकी मां  का नाम , उसके गाँव का नाम रजिस्टर में लिखवा लो .
चपरासी बोला - सर लिखवा लेता हूँ, फिर क्या कहना है ?
नेताजी - कहना की हफ्ते भर बाद खबर लो , तब तक हम अपने दौरों का रेकोर्ड चेक कर लेते हैं . हाँ कहना मिडिया विडिया के चक्कर में न पड़े , कुछ पता  चला तो आपस में सलटा  लेंगे. 

Thursday, July 26, 2012

खौफ 26 जुलाई का


 
नमूना 26 जुलाई की बरसात का 
मुंबई की बरसात मुंबई की जीवन रेखा है . इस वर्ष कम हुई तो लगता है की पूरे मुंबई शहर की जल की आपूर्ति नहीं हो पाएगी . लेकिन 2005 की बरसात , और वो भी 26 जुलाई की बरसात- आज भी हर मुम्बईकर  के रौंगटे खड़े कर देती है . बरसात क्या थी मानों प्रलय का एक ट्रेलर था . हर मुम्बईकर  के पास अपनी एक दास्तान  मिलेगी ; मैं आज अपने परिवार की कहानी यहाँ मेरे पाठकों के साथ शेयर करता हूँ .
आधी डूबी  हुई बस उस दिन की दास्ताँ बयान  करती है 

मेरा घर है जुहू में और उन दिनों मेरा दफ्तर होता था मस्जिद बन्दर इलाके में . गाडी से आने जाने में भी सामान्य दिनों में औसतन डेढ़ घंटे का सफ़र हुआ करता . उस दिन मै  और मेरा बेटा पराग एक साथ दोपहर का खाना खा रहे थे - रोज कीतरह करीब दो बजे . बाहर सुबह से ही बरसात बदस्तूर जारी थी . ये हर वर्ष होता है इसलिए कोई ख़ास बात नहीं थी . करीब सवा दौ बजे मेरी पत्नी रेणु  का फोन  आया की जुहू की तरफ बहुत जोरदार बरसात हो रही है , साथ में उसने हलके से कह दिया की कोई विशेष काम न हो तो निकल जाओ . मैंने कहा अगर ऐसे निकालेंगे तो फिर पूरे महीने रोज ही निकलना पड़ेगा .

ये लोग खड़े हैं रेल की पटरियों के दोनों तरफ प्लेटफोर्म पर 
 करीब  15 मिनट बाद फिर उसका फोन आया ; इस बार उसकी आवाज में थोड़ी घबराहट थी ; उसने मजबूती से कहा की दफ्तर जल्दी बंद कर दो और सभी कर्मचारियों को भी जाने दो , और तुम भी निकल पड़ो . मैंने कहा की देखते हैं . फिर मैंने दो चार जगह फोन कर के पुछा तो लगा की बरसात कुछ अधिक ही है . मैंने निर्णय लिया की तीन बजे तक दफ्तर बंद कर के सबकी छुट्टी कर दी जाए . तीन बजे मैं और पराग अपनी गाडी में बैठे ही थे , कि  श्रीमतीजी का  फिर फोन आ गया . इसबार वो पूरी तरह परेशान थी ; बोली की घर के सामने की सड़क पर पानी का स्तर  कमर तक आ गया है . अब अगर मैं निकल गया हूँ तो फिर आगे के रास्ते की परिस्थिति देख कर बढ़ना . ये बात चौंका देने वाली थी क्योंकि जुहू के इलाके में मैंने कभी इस तरह पानी भरते हुए नहीं देखा था .

बाद में ये गाडी पूरी डूब गयी थी 
मैंने अपने ड्राइवर से कहा की ऐसा रूट पकड़ो जहाँ पानी न भरता हो .हमारा रोज का रास्ता था किंग  सर्किल होकर धारावी से हाइवे पर निकलने का ; लेकिन हमें अंदाज था की किंग सर्किल काफी नीचा क्षेत्र है ( मैं 3 साल पहले वहां सारी  रात किसी मित्र के यहाँ बिता चूका थी - इसी वजह से ) ; इसलिए हमने भायकला  से तुलसी पाइप रोड का रास्ता पकड़ा . बरसात इतनी तेज थी की हमें आगे वाली गाडी की सिर्फ लाल बत्ती ही नजर आ रही थी . धीरे 2 करीब घंटे में हम दादर स्टेसन के पुल पर  पहुंचे ; वहां से आगे का नजारा देखा तो होश उड़ गए . वहां से दूर दूर तक गाड़ियों की लाइन लगी थी जो एक इंच भी आगे नहीं बढ़ पा रही थी .

आधी घंटे इन्तजार करने के बाद अपने सेल फोन से सबसे संपर्क करना शुरू किया . पत्नी से लगातार बात हो ही रही थी . उसने सलाह दी की मुझे वहीँ कहीं किसी होटल में या किसी जानकार के यहाँ शरण लेनी चाहिए . मैंने अपने एक रिश्तेदार को फोन किया , क्योंकि मुझे याद आया की उनकी ससुराल इसी इलाके में कहीं है . उन्होंने मुझे वहां तक पैदल चल कर जाने का रास्ता बताया . मैं और पराग गाडी से निकल कर चल पड़े ; ड्राइवर से कहा की गाडी को कहीं ढंग से खड़ा कर के उसी जगह आ जाए .
रेलवे स्टेसनों पर शरण ली रेल यात्रियों ने 

जब हम सडक पर निकले तब हमें अंदाज हुआ बरसात के तीखेपन का . पानी कमर तक पहुँच चुका  था . आगे जाकर देखा तो पाया की सभी गाड़ियों के ड्राइवर अपनी अपनी गाड़ियों को वहीँ लोक कर के चले गए हैं . यानि की उस रस्ते पर कोई भी गाडी अपनी जगह से हिलने की स्थितिमे नहीं थी . हम पहुंचे हमारे गंतव्य पर जहाँ घर की स्त्रियों ने हमारा स्वागत किया . पता चला की घर के पुरुष किसी और जगह पर हमारी ही तरह फंसे हुए हैं . बस इसी एक कारण  ने उस दिन पूरे शहर को एक परिवार के रूप में बदल दिया . हर व्यक्ति आये हुए शरणागत में अपने घर के व्यक्ति - अपने पति . पुत्र देवर आदि को ढूंढ रहा था .

बस अड्डे भी शरण के रूप में ही काम आये 
उस दिन सब कुछ संभव था 
हमारे मेजबान ने हमें बदलने को कपडे दिए ; गरम गरम चाय के साथ पूरियां खिलाई . बरसात के रुकने का इन्तजार करते हुए रात के 11 बज गए , लेकिन बरसात रुकने क नाम नहीं ले रही थी . पत्नी ने वहां से न निकलने की हिदायत दी . लेकिन किसी और के घर पर हम सारी  रात कैसे रुक सकते थे ; वो भी तब जब की उस घर के पुरुष घर में मौजूद नहीं थे . जब हमने वहां से निकलने की बात की तो घर की महिलाओं ने हमें जाने की आज्ञा  नहीं दी . उन्होंने साफ़ साफ़ कह दिया की अब रात में कहीं जाने की जरूरत नहीं ; सुबह अगर मौसम ठीक हुआ तब निकलें . इस प्रकार उन्होंने हमारी उलझन को दूर किया . रात का भोजन वहीँ किया . हमारा ड्राइवर भी आ चूका था , उसने भी वहीँ शरण ली . हम रात को उनके घर पर ही सो गए .

अगली सुबह का नजारा भी बदला नहीं था . एक अंतर ये हुआ की रात में किसी वक़्त घर का छोटा बेटा घर पहुँच चूका था . उन्होंने दोपहर 12 बजे तक हमें निकलने नहीं दिया . उसके बाद हम बिलकुल हाथ जोड़ कर धन्यवाद कर के  निकल गए .गाड़ियाँ थोड़ी थोड़ी निकल चुकी थी . धक्का देकर गाडी को उस रास्ते से बाहर  किसी खाली  सडक तक लाये . भगवन की दया से गाडी स्टार्ट हो गयी . पैदल की स्पीड से गाडी को बंदर तक लाये . वहां पता चला की वहां से आगे गाड़ियाँ बिलकुल बंद है . एक जगह गाडी को खड़ा किया और पैदल चल पड़े जुहू तक जाने के लिए . हमें कम से कम डेढ़ दौ घंटे लगे इस पदयात्रा में . सड़कों पर कमर तक पानी था . लोग उंचाई की जगह पर कतारों में चल रहे थे . उसके दो कारण  थे - एक तो सड़कों के बीच का डीवाइडर   ऊंचा था , दुसरे उस पर चलने  से किसी गड्ढे में पैर फंसने का डर  नहीं था .

पटरियों पर रेंगता जीवन 
जैसे जैसे हम जुहू के पास पहुँचते गए पानी का स्तर  और ऊपर मिलता गया . घर तक हम पहुंचे करीब करीब छाती तक की ऊँचाई के पानी में . घर पहुँच कर पता चला की मेरी बेटी अपने मित्रों के साथ कहीं गयी हुई थी , और वो घर लौटी थी गर्दन तक के पानी में . हमारा मकान चार मंजिला है , हम रहते हैं पहली मंजिल पर ; निचला फ्लोर , हालाँकि  सड़क के स्तर से कम से कम 3 फुट ऊँचाई पर है , फिर भी मेरे मित्र शंकर के घर का सारा फर्नीचर पानी में डूबा पड़ा था .

मुंबई के विभिन्न इलाकों से पता चल रहा था , की लोग सड़कों पर डूब कर मर गए ; कालीना  में मकानों की पहली मंजिल तक पानी चढ़ गया ; एक अकेली बुढिया  जिसने घर की डाइनिंग टेबल पर शरण ली थी , वो पानी के धीरे धीरे बढ़ते रहने से घर में  डूब गयी  ; जुहू में दो बच्चे अपनी गाडी लोक कर के बैठे थे , गाडी का ऐ सी ख़राब हो गया ; और शीशे नीचे करने वाला इलेक्ट्रोनिक सिस्टम काम करना बंद कर दिया , दोनों बच्चे घुटन से गाडी में मर गए - न जाने कितनी घटनाएँ घटी उस दिन !

मेरे घर पर कुछ काम चल रहा था ; 3-4 मिस्त्री रात भर मेरे यहाँ ही रुके थे , पत्नी ने उन्हें भोजन करवाया था . और सबसे विचित्र बात ! इतनी बरसात में जब की सब कुछ बंद हो चूका था - बिजली , टी वी , फोन आदि - हम सबसे अधिक परेशान थे पानी के अभाव  से ! हैं न विचित्र बात ! मकान  के टैंक में पानी समाप्त हो चूका था . पानी चढाने वाली मोटर पानी में पड़ी पड़ी ख़राब हो चुकी थी . आस पास की दुकाने  बंद दी जहाँ पानी की बोतलें खरीद पाते . जब उस दिन कुछ भी कर पाना संभव नहीं था तो मैंने बैठ कर लिखना शुरू किया - एक छोटी सी कविता लिखी . जो इस प्रकार है -

ये कैसी बरसात 
ये कैसी बरसात 
जीवन देने वाली 
गिरी है बन के गाज 

निकले थे लोग 
घर से सुबह 
दिन भर के जीवन के लिए 
लौटे नहीं 
रातों को भी  
आशंकाएं मन में लिए 

काली  थी कैसी रात  
ये कैसी बरसात 
ये कैसी बरसात 




Saturday, July 7, 2012

सस्ती रोटी

भूख के समय पेट रोटी की गुहार करता है . और फिर ऐसी जगह जहाँ आप किसी अपने को हस्पताल में रख कर उसका इलाज करवा रहें हो , तो घर की रोटियां वहां कहाँ ? ऐसे में जो भी हस्पताल के बहार खाने को मिल जाता है उसे इंसान खाने को मजबूर होता है .


लेकिन रांची के राजेंद्र मेडिकल कॉलेज और हस्पताल में आने वाले लोगों के लिए बहुत बढ़िया साधन है - सस्ती रोटी का स्टाल ! सिर्फ दस रुपैये में 7 गरमागरम चपातियाँ , साथ में पेट भर आलू की मजेदार  सब्जी और फिर स्वच्छ बोतलबंद मिनरल वाटर की बोतल मात्र 6 रुपैये में . मरीज की खिचड़ी फोयल पेपर में पैक - सिर्फ 6 रुपैये में . 






मैं को हवाई बातें नहीं कर रहा . मेरी पिछली रांची यात्रा में मैं स्वयं देख कर आया इस समाज सेवा के प्रकल्प को . हस्पताल ने एक छोटा सा शेड दे दिया - जहाँ 4-5 महिलाएं बैठ कर रोटियां सकती रहती हैं . सब्जी बहुत बड़ी मात्र में दोनों समय बना कर रख दी जाती है . रोटी के काउंटर पर एक व्यक्ति हर समय तत्परता से रोटियां परोसने को खड़ा रहता है . 




ये सेवा उपलब्ध करवाने का श्रेय है श्री शत्रुघ्न लाल और श्रीमती सुशीला देवी गुप्ता को . उन्होंने न केवल ये प्रकल्प अपने प्रयासों से शुरू किया , बल्कि घाटा होता है , उसे वो अपना सौभाग्य समझ कर अनुदान के रूप में देते हैं . सिर्फ पैसा देने से कोई योजना नहीं चलती . समय देने वाले भी चाहिए . दोनों पति पत्नी नियम पूर्वक वहां का एक चक्कर लगाते हैं , खुद सारी  व्यवस्था को देखते  हैं . रोज दोनों समय सैंकड़ों भूखे व्यक्ति वहां तृप्त होकर जाते हैं . 





ये देश सर्कार के भरोसे नहीं चल रहा . ये चल रहा है - ऐसे सेवा भावी गुप्ता दम्पति जैसे लोगों के भरोसे।.  

Tuesday, July 3, 2012

कृष्ण लीला - एक लघु कथा

किशन अपने ड्राइंग रूम में टेलीविजन के  चैनल पर भजन सुन रहे थे . वाचमैन ने आकर कहा की कोई आपसे मिलने आये हैं . किशन ने झल्ला कर पुछा - ' नाम तो पूछते कि  कौन है !' बेमन से उठ कर किशन दरवाजे पर आये .सामने एक गरीब आदमी मैली कुचैली जींस पहने खड़ा था ; कई दिनों की बढ़ी हुई दाढ़ी  थी .

किशन ने कहा - ' यस ? क्या काम है ?'

आगंतुक दो पल एकटक किशन को देखता रहा और फिर बोला - ' किशन भैया , नहीं पहचाना ? मैं हूँ सुदामा ! सुदामा शर्मा , तुम्हारा होस्टल का मित्र ! '

किशन ने तुरंत पहचान लिया , एक बार चमक सी उठी उसकी आँख में ; लेकिन दूसरे  ही पल चेहरा बदल    गया . किशन ने कहा - ' आई डोंट रिमेम्बर एनी सुदामा ! सॉरी !' - ये कह कर गेट बंद कर लिया .

अन्दर से रुक्मिणी आई . बोली - ' कौन था जी ?'

किशन ने कहा - ' पता नहीं ; नौकरों का दोस्त होगा कोई ! मैंने कह दिया की ये समय नौकरों से मिलने का नहीं है . '

और इस तरह आज के समय की कृष्ण लीला समाप्त हुई !

 

Saturday, June 30, 2012

टाइम मशीन की सवारी

मेरे सामने था , वो विशाल द्वार जिस के एक तरफ तीन बड़े बड़े अक्षर टिके थे - B I T. जैसे ही हमारी कार   उस द्वार से अन्दर घुसी , याद आ गया वो बत्तीस साल पुराना क्षण , जब इन्जिनीरिंग का अंतिम पेपर देने की ख़ुशी मनाने  के बाद बाहर निकले थे हम सभी मित्र ! जिंदगी इसी दरवाजे के बाहर तो हमारा इन्तजार कर रही थी .

जैसे ही कार  आगे बढ़ी , मैंने नजर डाली मेरी दाहिनी तरफ - और जैसी आशा थी वैसे ही नजर आया होस्टल -7 , और उसके बाद होस्टल -6 और उसके बाद होस्टल - 5. लेकिन उसके बाद जो नजर आया वो उन  दिनों नहीं था . प्रताप , मेरे मित्र , सहपाठी और इस यात्रा के मेरे सूत्रधार , ने बताया की वो नए निर्माण  है - एक गेस्ट हाउस और दो और नए होस्टल के रूप में .होस्टलों की संख्या  11 तक पहुँच चुकी है .






जो नहीं बदला वो था सड़क के दोनों तरफ हरे भरे लम्बे लम्बे पेड़ों से भरा जंगल , जिसके बीच की पगडंडियों से कभी पैदल कभी साईकिल पर जाते थे कोलेज की बिल्डिंग में क्लास के लिए . और जैसे ही वो रास्ता आगे बढ़ा , सामने नजर आई वो भव्य ईमारत जहाँ मैंने साढ़े  चार  सालों तक अलग अलग विषयों की कक्षाएं अटेंड  की . आज भी उतनी ही प्रभावशाली जितनी उन दिनों होती थी . ईमारत के सामने हरे भरे दोनों घास के मैदान - जिन्हें हम कहते थे लोवर और अप्पर लॉन ! इन्ही मैदानों में न जाने कितनी बार क्रिकेट खेला , स्क्रीन लगाकर फ़िल्में देखी .

दोनों तरफ दो दो विशाल होस्टल - 1 से लेकर  4 नंबर तक के . होस्टल चार के सामने से गुजरा तो अपना वो कमरा नजर आया जहाँ मैंने फोर्थ और फिफ्थ इयर की पढाई की . मेरे पास वाला कमरा हुआ करता , मेरे परम मित्र सुरेश बजाज का - जो इम्तिहान के दिन भी अपना आधे घंटा का पूजापाठ छोड़ने को तैयार नही होता था ; ये जानते  हुए की उसे अभी भी कोलेज जाने के पहले मेरे साथ बैठ कर फ़ाइनल रिविजन करना है . मेरे कमरे के दूसरी तरफ था डार्क रूम , जिसमें हम घंटों अपनी खींची हुई तस्वीरों , ब्लैक एंड व्हाईट , को एनलार्ज और प्रिंट करते थे . मुझे याद है एक साल मैंने फोटोग्राफी प्रतियोगिता में 5 अवार्ड जीते थे ; अभी भी सारे सर्टिफिकेट मेरे पास रखे हैं . फोटोग्राफी याद करते ही मुझे याद आया , मेरा दोस्त प्रमोद अगरवाल , जो कुछ वर्षों पहले हम सब से बिछुड़ चूका है . प्रमोद का कमरा होस्टल की बिल्डिंग के दूसरी तरफ की एल विंग में था ; शायद सबसे सजा धजा कमरा वही हुआ करता था .

और फिर जब कोलेज की बिल्डिंग के आगे रुके , तो कितनी ही बातें जेहन  में कौंध गयी . कोलेज के सामने बना वो सन डायल , रोज गार्डेन , सीढ़ियों के पास बना टेलीफोन एक्सचेज . टेलीफोन एक्सचेंज - सुनने में लगता है की कोई बहुत बड़ी चीज रही होगी ; लेकिन वो था 8 फुट बाई 6 फुट की एक कोठरी , जिसमें बैठा होता था एक टेलीफोन ओपरेटर , और उसके पास होते थे 2 टेलीफोन . पूरे कैम्पस में अगर किसी को भी फोन करना होता था तो वो आता था यहीं और अनुरोध करता था ओपरेटर से की उसका नंबर मिला कर देवे . एस टी डी  नंबर का मतलब तो था वही सीढियों पर बैठ कर घंटों इन्तजार करना . आज के समय की सोचता हूँ तो लगता है की होस्टल के हर कमरे में कम से कम एक सेल फोन तो हर स्टुडेंट के पास होगा ही .

पहली मंजिल पर हुआ करता था वो बड़ा वाला कमरा जो अपने नंबर से ही जाना जाता था - 222 ; वो था पूरे कैम्पस का मनोरंजन केंद्र , क्योंकि महीने में एक दो फिल्म दिखाई जाती थी - नयी नहीं , उन दिनों से भी 10-20 साल पुरानी ! एक पुराने ज़माने का बड़ी बड़ी रीलों के चक्कों को घुमाने वाला प्रोजेक्टर - जिस पर फ़िल्में दिखाते थे हम लोग . और अगर कोई गाना या दृश्य अच्छा लगता तो जोरों की सीटियाँ  बजती और फरमाइश  होती - 'रिपीट ............" "रिपीट .................." और फिर जन आग्रह पर वो गीत या दृश्य दुबारा , तिबारा और कई बार तो चौबारा दिखाया  जाता था . नयी फिल्मे देखने के लिए बस में बैठ कर रांची शहर जाना पड़ता था . वहां खड़े खड़े मन में आया , अब तो शायद हर कमरे में एक टी वी लगा होगा , जिस पर सभी देखते होंगे अपना मनचाहा चैनल . सचमुच सब कुछ बदल गया .

फिर जब एक नम्बर होस्टल के पास पहुंचे तो मैंने प्रताप से कहा - यहाँ थोड़ी देर रुकते हैं . गाडी से उतर कर हम घुसे . पहला बड़ा कमरा जहाँ उन दिनों होता था एक को ओपरेटिव स्टोर , जिसमें से खाने पीने के सामान की खुशबू  आया करती थी . उसके बाद शुरू हुआ कमरों का सिलसिला - 8 नंबर - उपेन्द्र सिंह , 9 नंबर मोहमद जफ़र , 10 नंबर - मेरा जिगरी दोस्त अकिल अहमद- आजकल दुबई में है  . और फिर 11 नंबर यानि मेरा कमरा , 12 नंबर - सुभाष  महतो , 13 - बिभूति भूषण , अरे हाँ कुछ दिनों पहले ही फेसबुक पर मुलाकात हुई उससे - आर्मी में ब्रिगेडीअर बन गया . जैसे जैसे आगे बढ़ता गया याद आते गए सारे नाम - नवल द्विवेदी , भरद्वाज  , सुशिल झुनझुनवाला , दिलीप मानकी , ........................शशांक प्रसाद ...............




और उसके बाद आ गया हमारा भोजन स्थल यानि की मेस ! यही वो जगह थी जहाँ घंटों दोस्तों के साथ बैठने का मौका मिलता था . उन दिनों हुआ करती थी स्टेनलेस की लम्बी टेबल जिसके दोनों तरफ जुड़े होते थे स्टेनलेस स्टील के ही गोल गोल स्टूल . किचन और हमारी टेबलों के बीच बना हुआ था एक पक्का काउंटर , जहाँ खड़ा रहता था मेस का मैनेजर ! शायद इस होस्टल में मैनेजर था प्रसाद . मेस की किचन से बन कर गरम गरम रोटियां बाहर  आती - कई छोटे छोटे आदिवासी लड़के रोटियां परोसते . पूरे समय आवाजें आती रहती - ' ऐ बुतरू - रोटी ला ' , 'ऐ बुतरू - पानी ला ' .  स्टेनलेस स्टील की वो बेंचें हटा  दी गयी हैं. अब हैं  होटलों जैसी टेबल और प्लास्टिक की मोल्डेड  बकेट जो की कस दी गयी थी स्टील के स्टैंड के ऊपर . वहां तैनात एक सज्जन ने बताया की आज कल यहाँ सेल्फ सर्विस कर दी गयी है ; अब यहाँ बुतरू काम नहीं करते हैं . समझ में भी आ गया , बाल मजदूर की श्रेणी में आते हैं वो बुतरू .

जैसे ही मेस के बाहर  निकला , तो याद आई - 'नानी' ! मेरी अपनी नानी नहीं , बल्कि हम सब की नानी . होस्टल के सभी बच्चे उस बुढिया  को नानी बोलते थे . वो लंच के समय बाहर  आकर  , एक बोरी बिछाकर अपनी दुकान लगा लेती थी . उसकी बोरी पर बीचे होते थे - खीरे , टमाटर , आम , अंडे वैगरह ! स्वाद परिवर्तन के लिए हम लोग खरीद लेते थे सलाद की सामग्री . नानी का सम्बन्ध दिर्फ़ क्रय विक्रय तक सीमित नहीं था . वो सब से पूछती - ' आज तुम्हारा परचा कैसा हुआ ?' .....' अरे इतनी सर्दी लगी है , काढ़ा बनवा कर पी लो ' ........... आज पैसे नहीं है , कोई बात नहीं जब घर से आये तब दे देना ' - अपने घर वालों से दूर यहाँ भी था कोई घर वालों जैसा , जो चिंता करता था हम सबकी !

अगले 15 मिनट में मैंने प्रताप के साथ चक्कर लगाया - अमीरचंद के कैंटीन का , नवनिर्मित होस्टल और ऑडिटोरियम की बिल्डिंगों का , एक नया फार्म का रिसर्च सेंटर दिखा . मुख्या बिल्डिंग के पीछे अब एक बैंक और ऐ टी एम्  है , 3-4 दुकाने हैं . मेरा विभाग यानि प्रोडक्सन इन्गिनीरिंग का वर्कशॉप था वैसा का वैसा ! अन्दर घुसते ही कई लेथ मशीने , दाहिनी तरफ मेटलर्जी विभाग , पिछवाड़े  में फौन्द्री .

कैंटीन के पास के चौराहे ने याद दिला दी वो प्राइवेट बस जिसमें या ये कहना चाहिए की जिस के ऊपर  सवार  होकर हम जाते थे रांची शहर .ऊपर का मतलब था बस की छत पर . आज सुबह एक विचित्र घटना हुई . रांची में मेरे अंकल की कार  का ड्राइवर गाड़ी चला रहा था . गाडी में थे मैं अंकल और मेरा कोलेज के दिनों का साथी रविन्द्र शर्मा . अंकल बार बार उस ड्राइवर को संबोधित कर रहे थे - सजाद के नाम से . मैंने रविन्द्र शर्मा से कहा - ' रविन्द्र , याद है हमारी बी आई टी वाली बस का ड्राइवर भी सजाद ही हुआ करता था . तभी अंकल के ड्राइवर ने कहा - ' जी वो मेरे पापा हैं ! वो बिनाका नाम की बस चलाते  थे  .' बस का नाम बताते ही शक की कोई गुंजाइश ही नहीं रही . 32 सालों बाद भी अगर कोई शक्श आपके मन में है तो जरूर कोई न कोई खास बात रही होगी उसमे . और इस प्रकार हमारी आत्मीयता हो गयी अंकल के ड्राइवर से .


सचमुच ऐसा लगा जैसे मैं किसी टाइम मशीन पर सवार  होकर 32 वर्षों पीछे चला गया था . मष्तिष्क  में न जाने कितने दबे हुए नाम बाहर  निकल आये  . न जाने कितनी ही घटनाएँ कौंध गयी . एक न भूल पाने वाला दिन बीता  आज . थैंक यु प्रताप !







Monday, June 25, 2012

गड्ढे में गिरा देश

भारत की बहुत सारी विशेषताएं  हैं . बहुत  सी विशेषताएं प्राचीन काल से है , मसलन ,गरीबी  , अशिक्षा , अंधविश्वास  आदि . कुछ विशेषताएं समय के साथ विकसित होती चली गयी , और जो वर्तमान में पूरे शबाब  हैं , जैसे की भ्रष्टाचार , राजनीति का अपराधीकरण, अपराध का राजनीतिकरण , बेपनाह बढती हुई मंहगाई , प्रधानमंत्री की सुसुप्तावस्था , आम आदमी की विक्षिप्तावस्था - लिस्ट बहुत लम्बी है .

इन सब विशेषताओं से हट कर पिछले कुछ सालों में कुछ नयी विशेषताएं उभर कर आई हैं . मैं कोई मामूली बात नहीं कर रहा यहाँ - ऐसी विशेषताओं की चर्चा कर रहा हूँ जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर की सुर्ख़ियों में भी आ रहीं हैं . खास खास - अन्ना हजारे का अनशन , रामदेव का आन्दोलन , स्विस बैंक के मुद्दे पर सर्कार का कन्नी काटना , दिग्विजय सिंह के अजीबोगरीब बयान , ममता का सहयोगी दल होकर भी निरंतर असहयोग , राष्ट्रपति चुनाव में लगा तड़का - और अब इन सब से भी जबर्दस्त विशेषता - गड्ढा , जिसे मुंबई की भाषा में खड्डा भी कहते  हैं .


भारत अब गड्ढा प्रधान देश बन चूका  है , आये दिन टेलीविजन पर किसी न किसी गड्ढे की चर्चा रहती है . मॉनसून  में मुंबई की सड़कों पर गिने जा रहे गड्ढे , प्रीटी जिनता और दीपिका के गालों में पड़ते गड्ढे और सबसे अधिक तो वो लम्बे और गहरे गड्ढे जिनमें देश के विभिन्न भागों में समा जाते हैं छोटे छोटे बच्चे . कुछ जो भाग्यशाली होते हैं उन्हें जीवित निकल लिया जाता है , लेकिन ज्यादा संभावनाएं न बच पाने की ही होती हैं . ये सिलसिला तो न जाने कब से चल रहा होगा , अंतर ये है की पहले ऐसी घटनाएँ लोकल पुलिस थानों से आगे नहीं बढती थी , लेकिन जब से 2006 में इलेक्ट्रोनिक मिडिया ने इस तरह की घटनाओं को कवर करना शुरू  किया तब से , इस घटना को युद्धस्तर पर लेने को मजबूर हो गयी सर्कार . फायर ब्रिगेड , मिलिटरी , तकनीकी  विशेषज्ञ - सब का जमावड़ा लग जाता है ऐसे गड्ढे के पास . मिडिया चौबीस घंटे उसे क्रिकेट मैच की तरह दिखाती है . कुछ बच्चे जो खुशकिस्मत थे की ऐसे गड्ढों में गिरने के बावजूद आज भी जिन्दा हैं उनमे से हैं - 2006 में 50 फूट गहरे गड्ढे में 2 दिन फंसे रहने के बाद बचे 6 वर्षीय प्रिंस , आगरा में एक 15 फूट गहरे गड्ढे में से बचाए  गए 2 वर्ष के सोनू , जयपुर में 2009 में बचाया गया एक 5 वर्षीय बच्चा  जो गिरा था कोई 250-300 फुर गहरे गड्ढे में , और उसी समय जयपुर के पास ही बचाया गया 4 वर्षीय अंजू गुज्जर को एक 50 फुट गहरे गड्ढे से . कुछ बच्चे प्रिंस और अन्य  बताये बच्चों की तरह भाग्यशाली नहीं रहे - 2009 में 50 फुट गहरे में गिरे 11 वर्षीय  कीर्तन परनामी , वारंगल में 35 फुट गहरे गड्ढे में गिर कर नहीं बच पाए दर्वाथ महेश , 2007 में गुजरात के मडेली  गावं में गयी 2 वर्षीय किंजल मान सिंह और उसी वर्ष पुणे के शिरूर गाँव में नहीं बचा एक  5 वर्षीय बालक .2007 में ही 2 वर्षीय अमित मध्य प्रदेश के कटनी शहर में एक 56 फुट गहरे गड्ढे में से जिन्दा नहीं निकला . 2011 में गिरा एक लड़का 4 साल का तिरुनाल्वेल्ली के एक गड्ढे में और नहीं बच पाया . और आजकल पिछले एक हफ्ते से सुर्ख़ियों में रही 5 वर्षीय माही जिसने  गुरगांव के मानेसर में मौत से लड़ने के बाद एक 70 फुट गहरे गड्ढे में दम तोड़ दिया . सारा देश प्रार्थना  के साथ प्रतीक्षा कर रहा था माही  की, लेकिन बाहर  निकला माही का निर्जीव शरीर !

ये क्या सिलसिला चल रहा है हमारे देश में ? कोई भी गड्ढा तभी महत्वपूर्ण हो पाता  है जब कोई मासूम  उसमें गिर कर  दम तोड़ता है . क्या देश में विभिन्न शहरों  में बनी कोर्पोरेसन , मुनिसिपल्टी आदि सिर्फ टैक्स लेने  के लिए बनी है ? क्या मिडिया इंतजार करती है किसी बच्चे का ऐसे गड्ढों में गिरने का ? क्या सर्कार बच्चे की मौत के बाद ढूँढने निकलती है वो गला जिसमे फांसी का फंदा डाला जाए ? क्या संभव नहीं है , की कोर्पोरेसन आदि एक ऐसा दस्ता बनाये जो निरंतर घूम घूम कर ऐसे हत्यारे गड्ढों की खोज करे ? क्या मिडिया नहीं दिखा सकती ऐसे गड्ढों को टी वी पर जिनमे कोई बच्चा गिरा तो नहीं लेकिन कभी भी गिर सकता है ? क्या सर्कार ऐसे गड्ढे खोद कर खुला छोड़ने वालों के लिए कोई जोरदार कानून नहीं पास कर सकती ? क्या आम नागरिक थोडा सा कष्ट कर के ऐसे खुले मुंह वाले गड्ढों की रिपोर्ट करे पुलिस थाने  में नहीं कर सकता ? सब कुछ संभव है लेकिन न जाने कितनी और बलियों  के बाद हो पाएगी ये  सुरक्षा इस देश के नन्हे मुन्ने नागरिकों की !

और ये लेख लिखते लिखते पढ़ी एक और घटना आज के अख़बार में - हावड़ा में एक  15 वर्षीय युवक गिरा एक 70 फुट गहरे गड्ढे में ; 11 घंटों की मशक्कत के बाद रोशन परासी  का पार्थिव शरीर   बाहर  निकाला  गया .

सिलसिला चालू है - कोई कुछ तो करो इस देश को गड्ढे  में गिरने से रोकने के लिए !