नील स्वर्ग

नील स्वर्ग
प्रकृति हर रंग में खूबसूरत होती है , हरी, पीली , लाल या फिर नीली

Tuesday, March 3, 2015

गुटखा तम्बाकू - एक लघु कथा


मैं इंटरव्यू ले रहा था , एक स्टेनो सेक्रेटरी के पद के लिए। अगला प्रार्थी थी एक दक्षिण भारतीय महिला।  सामान्य प्रश्नोत्तर के दौरान मैंने पूछा - आप के पति क्या करते हैं ?

उसने जरा बुझे से स्वर में कहा - उसका डेथ हो गया। कैंसर था।

न चाहते हुए भी मैं पूछ बैठा - बहुत यंग रहे होंगे ; ऐसा कैसे ?

उसने कहा - उसको गुटखा तम्बाकू बहुत खाता था।

मन में हंसी आई उसकी दक्षिण भारतीय हिंदी सुन कर ; लेकिन अगले ही क्षण मन  में आया - भले ही उसका व्याकरण गलत था , लेकिन अनजाने ही उसकी बात सही थी।  हम समझते हैं की गुटखा तम्बाकू हम खाते हैं , लेकिन वास्तविकता ये है की गुटखा तम्बाकू हमें खाता है।


Tuesday, February 17, 2015

'आप' - फ़िल्मी गाने -फ़िल्मी ताने

आम आदमी पार्टी  संक्षिप्त नाम यानि 'आप' ,  हिंदी भाषा  का एक शब्द होने के कारण बहुत सारे फ़िल्मी गानों में प्रयुक्त हुआ है।  हमने चुने हैं कुछ ऐसे ही गाने जो दिल्ली के चुनाव के बाद बहुत दिलचस्प ढंग से किसी न  किसी व्यक्तित्व से मेल खाते हैं।  उद्देश्य विशुध्द हास्य के अलावा कुछ नहीं है।  आनंद लीजिये -

अन्ना हजारे 
आप से हमको बिछड़े हुए , एक जमाना बीत गया

सतीश उपाध्याय (किरण बेदी से )
आप यहाँ आये किसलिए , आप ने बुलाया इसलिए
आये हैं तो काम भी बताइये , पहले जरा आप मुस्कुराइए

किरण बेदी 
दर्दे दिल दर्दे जिगर दिल  जगाया आप ने

योगेन्द्र यादव (अरुण जेटली से )
आप ने सौ इल्जाम लगाये , वो मेरे नाम लगाये , कहिये कुछ और
चोरों को सारे नजर आते हैं चोर

शीला दिक्षित 
आप को पहले भी कहीं देखा है

प्रशांत भूषण 
क्या क्या न सहे हमने सितम आप की खातिर

दिल्ली 
आप मुझे  अच्छे लगने लगे , सपने सच्चे लगने लगे

सोनिया गांधी
चैन से हमको कभी आप ने जीने ना दिया

राहुल गांधी
जब हमने दास्ताँ अपनी सुनाई , आप क्यों रोये

अजय  माकन
करवटें बदलते रहे सारी रात हम , आप की कसम

नज़ीब जंग
आप की नज़रों ने समझा प्यार के काबिल मुझे

ममता बनर्जी
आप जैसा कोई मेरी जिंदगी में आये , तो बात बन जाए

साजिया इल्मी
हम आपके आपके  हैं कौन

उद्धव ठाकरे
आप के हसीन रुख पे आज नया नूर है
मेरा दिल मचल गया तो मेरा क्या कुसूर  है

केजरीवाल (मोदी से )
आप की राय मेरे बारे में क्या है कहिये

मोदी (केजरीवाल से )
ये मुझे देख कर आपका मुस्कुराना
मुहब्बत नहीं है तो फिर और क्या है

अरविन्द केजरीवाल
आइये आप को मैं अपने बंगले की सैर कराऊँ


क्यों ? आया न मजा ? 

Monday, February 16, 2015

आखिर दिल्ली में हुआ क्या ?



दिल्ली विधान सभा के २०१५ के परिणामों ने पूरे देश को चौंका दिया। आम आदमी के पक्ष में जो फैसला आया उससे तो आम आदमी पार्टी भी स्तब्ध रह गयी। बीजेपी ने ऐसे परिणामों की स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी। कांग्रेस पार्टी तो लगभग अपना वजूद ही खो बैठी है। 

आइये २०१३ से २०१५ तक के परिवर्तन के  परिणामों के आंकड़ों पर नजर डालें -

परिणाम सीटों के दृष्टिकोण से -

                                  २०१३                २०१५                     अंतर                      प्रतिशत 

बीजेपी                         ३१                      ०३                       -२८                        -९०.३२ %

आम आदमी                २८                       ६७                        ३९                        + १३९.२८ %

कांग्रेस                          ०८                      ००                       -०८                       -१०० %

अन्य                           ०३                       ००                      -०३                       - १०० 

इन आंकड़ों को देख कर ऐसा लगता है जैसे आम आदमी ने तो अपनी स्थिति दुगने से ज्यादा मजबूत कर ली है और अन्य सभी दल करीब करीब  साफ़ हो गए हैं। लेकिन वास्तविकता ये नहीं है। 

सीटें परिणाम होती है - बहुमत का। अगर दो दलों के बीच में सिर्फ एक वोट का भी अंतर हो तो उसमे से एक उस सीट का १०० % विजेता होता है और दूसरा उस सीट पर १०० % पराजित !

आइये देखें जनता ने कितना किसे समर्थन दिया और कितना किसे नकार दिया।  ये तुलना मतों की गिनती के आधार पर है। 

परिणाम प्राप्त मतों  के दृष्टिकोण से -

                                  २०१३                       २०१५                      अंतर                            प्रतिशत               

बीजेपी                         ३३.०७ %               ३२.१०%               -०.९७ %                         -०२.९३%

आम आदमी                ३०.०० %                ५४.०० %              +२४ %                           +८०.०० %                   
कांग्रेस                         २४.५५ %                ०९.८०%              - १४. ७५ %                     - ६०.०८ %

अन्य                           १२.३८ %                ०४.१० %              - ०८.२८ %                      -६६.८८ %

इन नतीजों से जो पता चलता है वो इस प्रकार है -

१. बीजेपी ने अपना मुख्य आधार बचा  कर रखा लेकिन उसमे बढ़ोतरी नहीं कर पायी। 
२. कांग्रेस ने अपना वोट बैंक आम आदमी के हाथों खो दिया। 
३. अन्य दल जिसमे मुख्य रूप से आते हैं - बीएसपी , जेदीयु और स्वतंत्र। उनके वोटों का भी वही हुआ जो        कांग्रेस के वोट बैंक का हुआ। 
४. दिल्ली में मुस्लिम जनसँख्या २५ से २७ प्रतिशत है ; जो कभी भी बीजेपी को वोट नहीं देगी । 

जब पूरी दिल्ली दो खेमों में बँट  गयी हो तो परिणाम तो ऐसे ही आने थे।  बिजली मुफ्त ,पानी मुफ्त , अवैध निर्माण बनेंगे वैध - ऐसे नारों से सारी दलित जनता , सारे अवैध रूप से बसे  बंगला देशी  - पूरी की पूरी जमात आम आदमी के पक्ष में चली गयी।  

ये चुनाव था - सुधार और उधार के बीच ; प्रगति और दुर्गति के बीच ; सौर बिजली और चोर बिजली के बीच तथा आत्म सन्मान और मुफ्तखोरी के बीच। दुर्भाग्य से सुधार , प्रगति , सौर बिजली और आत्म सन्मान को मुंह की खानी पड़ी। 

दिल्ली को भगवान बचाये।  सौभाग्य से पूरा भारत इस तरह से नहीं सोचता है। 

Sunday, January 18, 2015

किरण बेदी क्यों जीतेगी !



किरण बेदी को दिल्ली के चुनाव में  ला  कर बीजेपी ने एक बहुत बड़ा दांव खेल दिया है।  आम आदमी  पार्टी के लिए दिल्ली में ये शायद सबसे बड़ी चनुौती होगी। दिल्ली में बीजेपी पर कई चुनावी आरोप थे।  सबसे बड़ा आरोप था की दिल्ली में बीजेपी के पास कोई मुख्यमंत्री पद के लायक नाम और चेहरा नहीं है। इस   शून्य का लाभ ले रहे थे अरविन्द केजरीवाल।  जितने भी मुख्यमंत्री पद के लिए सर्वे हो रहे थे , उनमे अरविन्द केजरीवाल का नाम सबसे लोकप्रिय  रहा था। वास्तविकता ये थी की सामने  डॉक्टर हर्षवर्धन के कद का कोई नाम ही नहीं आ रहा था। अब ये कहानी बदल जायेगी।  डॉक्टर किरण बेदी के नाम के साथ  दिल्ली का एक स्वर्णिम इतिहास  जुड़ा है।   पूरा देश जानता है की किरण बेदी देश की पहली महिला आई पी एस अफसर हैं। दिल्लीवासी उस दबंग महिला पुलिस अफसर को भूले नहीं है , जिसने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की कार को गलत पार्किंग के कारण  क्रेन  से खींच लिया था। 
अरविन्द केजरीवाल देश के प्रकाश में आये अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी मंच के कारण।  किरण बेदी अपने आप में एक हस्ती रही हैं।  उनका टेलीविजन पर "  आप की कचहरी " नाम के कार्यक्रम ने उनके सामाजिक न्यायाधीश के स्वरुप को पूरे देश के मस्तिष्क में स्थापित  कर दिया। उनके जुड़ने से लाभ अन्ना के आंदोलन को ही हुआ था। अरविन्द ने आंदोलन की लोकप्रियता को भुना कर ' आम आदमी पार्टी '  की स्थापना की।  अन्ना और किरण बेदी ने इस जन आन्दोलन  को राजनीति में परिवर्तित करने का विरोध किया। इस   प्रकार दिल्ली के चुनाव में भ्रष्टाचार विरोध का एकमात्र मुखौटा पहने हुए अरविन्द केजरीवाल को एक आजीवन समर्पित ईमानदार नेता का सामना करना पड़ेगा। 
जहाँ अरविन्द केजरीवाल इनकम टैक्स विभाग में काम करते हुए सिर्फ विवादों से घिरे रहे , वहीँ किरण बेदी ने अपने जीवन में मैग्सेसे  नाम का अंतर राष्ट्रीय स्तर  का अवार्ड जीता। जेल में रहने वाले कैदियों  के जीवन  में अभूतपूर्व परिवर्तन लाने का अभियान उन्होंने शुरू किया।  नवज्योत के नाम से   उनके शुरू किये हुए एन जी ओ ने समाज में ड्रग सेवन के  खिलाफ बहुत बड़ा मोर्चा खोला। 
अगर आगामी चुनाव में केजरीवाल का सामना किरण बेदी से होता है , तो निश्चित रूप से किरण बेदी ही चुनाव जीतेंगी।  दिल्ली के लोग अभी भी केजरीवाल के ४९ दिनों की सरकार को बिना कारण  गिराने के अपराध  को माफ़ नहीं कर पाये हैं। 

Monday, January 5, 2015

टूटे पुतले - एक कहानी


मुन्नी अपनी नयी गुड़िया  बहुत खुश थी।  वो अपनी गुड़िया को नए नए कपडे  पहनाती , उसके बाल  बनाती और उसे अपने पास सुलाती। इतना ही नहीं उसने अपनी सहेली के गुड्डे के साथ उसका ब्याह ही रचा डाला। अपने सुख दुःख की बाते गुड़िया से करती। कभी गुस्सा आता तो वो गुड़िया को  डांट  भी देती ; हाँ , बाद में उसे सॉरी बोल देती।

एक दिन ग़जब हो गया।  छोटे भाई बबलू ने नाराज़ होकर उसकी गुड़िया तोड़ दी। मुन्नी के दुःख और क्रोध  ठिकाना नहीं रहा।  वो बबलू पर चिल्लाई।   इतने से उसका मन शांत नहीं हुआ तो एक  चांटा बबलू  को रसीद कर दिया। बबलू रोते  रोते मां के पास गया। माँ ने मुन्नी को धमकाया और उसके कान खींचे।  मुन्नी ने कहा बबलू ने उसकी प्यारी गुड़िया तोड़ दी ,  उसे कुछ कहने की जगह उसे क्यों डांटा जा रहा है। माँ ने कहा गुड़िया तोड़ दी , उसके लिए उसे डांट मिलनी ठीक थी , लेकिन उसे इतनी  छोटी  गलती पर चांटा नहीं मारना चाहिए।  गुड़िया का क्या है , बाजार  से  खरीद कर लाये थे , दूसरी आ जायेगी ! बात रफा दफा  हो गयी।

५ -७   साल बाद की एक घटना !  दादी अपने पूजा घर में बैठ कर भगवान जी की पूजा कर  रही थी। दादीजी दिन में कम से कम ८-१० घंटे पूजा घर में बिताती।   दिनचर्या शुरू होती भगवान जी को सुबह जगाने से लेकर।  फिर वो भगवानजी को स्नान  करवाती , धुले हुए कपडे पहनाती , नाश्ते का भोग लगाती , झूला झुलाती।  दोपहर का भोजन खिला कर भगवान जी को सुला   देती।

 उस दिन यही भगवान जी के सोने का समय था। बबलू बाहर से क्रिकेट खेल कर लौटा।  उसके हाथ में क्रिकेट का बल्ला और भारी वाली गेंद थी। खेल की मस्ती में उसने गेंद को बल्ले से  मार दिया।  फिर कुछ ऐसा हुआ जिससे घर में एक तूफ़ान खड़ा हो गया।  बबलू की गेंद सीधी पूजा घर में गयी और भगवान जी की मूर्ति से टकराई।  गेंद की चोट से मूर्ति का सर टूटकर अलग हो गया।  दादीजी बिलकुल पगला गयी। बुरी  तरह चिल्लाने लगी - ' आज मेरी जीवन भर की तपस्या नष्ट हो गयी।  मेरे ही घर में मेरे भगवान जी को चमड़े की गेंद से खंडित कर दिया।  मैं कहाँ जाऊं।  लड़के ने मेरे लिए नर्क के द्वार खोल दिए। '

माँ ने ये सब देखा तो अपना आपा खो दिया।  लगी बुरी तरह बबलू को पीटने। बबलू डर के मारे सहमा हुआ  तो था ही , माँ के इस आक्रमण से रोने लगा।  उधर से पापा आ गए , उन्होंने जब सारा दृश्य देखा तो उनका भी पारा चढ़ गया।  उन्होंने भी बबलू को २ तमाचे लगा दिए।

ये सारा दृश्य मुन्नी देख रही थी।  उससे नहीं रहा गया। उसने बीच में पड़  कर बबलू को बचाया। उसे अपने पीछे छुपा कर जोर से बोली - ' क्यों पीट रहे हैं आप इसको ? क्या बिगाड़ा है इसने ?'

दादी चिल्लाई - ' तुम्हे  दिख नहीं रहा ,  इसने भगवान जी को तोड़ दिया ! फिर भी पूछती है  बिगाड़ा है ?'

मुन्नी ने कहा - ' इसने सिर्फ  एक पुतले को तोडा है , और वो भी जान बूझ कर नहीं। '

माँ ने कहा - ' मुन्नी ,  देखती नहीं दादीजी रोज कितने प्यार से भगवान जी को तैयार करती है , भोग  लगाती है और उनकी पूजा करती है।  भगवानजी को एक पुतला कह के तुम उनका अपमान कर रही हो !'

मुन्नी ने अपने उसी तेवर में कहा - '  आखिर क्या फर्क है , दादीजी के भगवानजी में और मेरी गुड़िया में ? दोनों ही बाजार से खरीद कर लाये गए थे , दोनों ही टूटने वाली वस्तु से बने थे। जितना मैं मेरी गुड़िया से प्यार करती  थी उतना ही दादी अपने भगवानजी से करती थी।  दोनों ही बबलू   के हाथों टूट गयी।  लेकिन दोनों बातों में इतना फर्क क्यों ? मेरी गुड़िया मेरे लिए दादीजी के भगवान  से कम नहीं थी , लेकिन फिर भी आप मुझ  पर नाराज हुए  जब मैंने बबलू को तमाचा मारा। आपका कहना सही था , एक गुड़िया थी उसकी जगह दूसरी आ जायेगी।  फिर आज आप सभी की सोच क्यों बदल गयी ? क्योंकि आपने इस पुतले को भगवान का नाम दे दिया। और अगर यही भगवान थे तो फिर अपनी रक्षा क्यों नहीं कर पाये एक मामूली गेंद की चोट से ! और एक मामूली चोट से बिखर भी गए।  ये तो आम इंसान से भी कमजोर निकले।  ऐसे भगवान जी की प्रार्थना से हमें क्या मिलेगा ?

पापा ने प्यार से कहा - बेटी , बात तो तुम्हारी ठीक है , लेकिन इसमें दादीजी की आस्था का सवाल है !

मुन्नी  ही प्यार से कहा - पापा, दादीजी की  आस्था और मेरी बचपन की आस्था में कोई अंतर नहीं है।  मैंने अपनी गुड़िया से  भावनात्मक रिश्ता जोड़ लिया था , वैसे ही दादीजी ने अपने भगवान की मूर्ति से भावनात्मक रिश्ता जोड़ लिया था।  दोनों के लिए ये एक मनोरंजन था।

दादी ने कहा - मुन्नी , तू सचमुच कितनी बड़ी हो गयी है। ये  बातें कई बार मेरे दिमाग में भी  आती है ; क्या मैं सचमुच भगवान की पूजा   कर रही हूँ , या  बुढ़ापे में अपना मन बहला रही हूँ।  मेरे पास समय बिताने के लिए कोई काम नहीं है। मुझे लगता है की मैं जैसे बचपन में तेरे पापा को प्यार से नहलाती धुलाती , खाना खिलाती , सुलाती - वैसा ही एक अनुभव मैंने इस मूर्ति के साथ शुरू कर दिया।  लेकिन ये सारा अनुभव एकतरफा था ; मूर्ति की तरफ से कभी कोई प्रतिक्रिया नहीं थी।

बबलू रुआंसा होकर बोला - दादी माँ ! मुझे माफ़  कर दीजिये।  आज के बाद मैं कभी कोई  तोड़ फोड़ नहीं करूंगा।  कभी भी आपके भगवानजी को कोई चोट नहीं लगने दूंगा।

दादी ने प्यार से बबलू को अपने पास खींचा।  बोली- , बेटा , भगवान  को चोट तुमने नहीं पहुंचाई ,  बल्कि हम सबने पहुंचाई है।  तुम्हारी एक छोटी सी गलती पर हम सबने तिल का  ताड़ बना दिया।  आज के बाद यहाँ कोई भगवान जी नहीं  आएंगे।  मेरे भगवान हो तुम सब।   मेरा प्यार अब मैं एक  मूर्ति पर नहीं लुटाऊंगी।   मेरा प्यार हैं मेरे  पोते और पोती के लिए।

दादी ने परिवार के सभी सदस्यों को अपनी बाँहों में भर लिया।




Wednesday, December 31, 2014

ईमानदार बेईमान - एक लघु कथा


वास्तव में उसकी बहुत ऊंची पहुँच थी। अब सबको अपने बच्चे का दाखिला कराना होता है किसी अच्छे स्कूल में।  बच्चा कितना भी मेधावी क्यों न हो , आखिर स्कूल में सीटें तो सीमित ही होती हैं।  उसमे से फिर सिफारिशी कोटे में आधी तो यूँ ही निकल जाती है। इसलिए जो समझदार और पैसे वाले माँ बाप होते हैं वो खोजते हैं कोई ऐसा शख्श जो कुछ ले दे कर उनका काम पक्का करवा दे। थोड़ी बहुत पूछ ताछ के बाद वो पहुँच जाते थे - गुरुदेव के पास।

न, वो कोई शिक्षक नहीं था ; वो तो था एक बिचौलिया जिसकी ऊपर तक जान पहचान थी। हर व्यक्ति उसके पास जाता था क्योंकि वो ईमानदार था।  उसक पक्का नियम था - वो एक लाख रुपैये लेता था , वो भी अड्वान्स में। उसकी गारण्टी होती थी , की वो दाखिला करवा ही देगा ; लेकिन किसी कारण  से अगर वो दाखिला नहीं हुआ तो पूरा पैसा बिना किसी काट छांट के लौटा देगा।  वो अपनी बात का धनी था।  आज तक एक भी उदहारण ऐसा नहीं था , जहाँ उसने किसी का पैसा काम न होने पर नहीं लौटाया हो।

बात शिक्षा विभाग में ऊपर तक पहुँच गयी। विभाग ने एक इन्क्वायरी बिठाई।  इन्क्वायरी करने वाले इन्स्पेक्टर ने गुरुदेव को बुलाया और पूछा , कि  वो विभाग में किसे पैसे देता है। गुरुदेव ने कहा - किसी को नहीं। इन्स्पेक्टर उसके उत्तर से संतुष्ट नहीं था।  उसने फिर पूछा - फिर बच्चों का दाखिला कैसे होता है ? गुरुदेव ने कहा - प्रभु कृपा से ! इन्स्पेक्टर ने कहा - मतलब ?

गुरुदेव ने कहा - मैं जो भी केस हाथ में लेता हूँ , उसके लिए मंदिर में सवा रुपैये का प्रसाद चढ़ा देता हूँ।  जिनका दाखिला हो जाता है , उनके पैसे रख  लेता हूँ , जिनका नहीं होता ,उस बच्चे के माँ बाप को पैसे लौटा देता हूँ।

इन्स्पेक्टर सोचता रहा - ये शख्श  ईमानदार है या बेईमान !

Thursday, December 25, 2014

भारत रत्न



आखिर श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी को भारत सरकार ने भारत रत्न से विभूषित कर दिया। और अगर न भी करते तो क्या  ? क्या अटल जी का मूल्यांकन घट जाता ? क्या उनका अद्वितीय नेतृत्व , उनकी महान भाषण शैली , उनकी उदारवादी सोच और उनका विश्व से मैत्रीभाव रखने का दृष्टिकोण अपना प्रभाव खो देता ? सच्चाई ये है की अटल जी किसी ऐसे पुरष्कार की प्रतीक्षा नहीं कर रहे थे , बल्कि पूरा देश प्रतीक्षा  कर रहा था कि कब तक कोंग्रेसी सरकार निर्लज्जता से अटल जी  के इस राष्ट्रीय सन्मान से बचेगी। कांग्रेस की सरकार विलुप्त हो गयी ; आखिर भारत रत्न कहे जाने वाले पुरष्कार का उचित सन्मान हुआ।

नोबेल पुरष्कार देने वाली सभा आज तक महात्मा गांधी को शांति के लिए नोबेल पुरष्कार न दिए जाने की गलती पर खेद व्यक्त करती है।

२ जनवरी १९५४ को जब देश के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने इस सर्वोच्च सन्मान की स्थापना की , तो शायद उन्होंने नहीं सोचा होगा की भविष्य में यह सन्मान किस प्रकार कांग्रेस के नेताओं की बपौती बन कर रह जाएगा। यहाँ सब सन्मान प्राप्त लोगों की चर्चा कर के मैं उनके देश के प्रति समर्पण को छोटा नहीं बनाना चाहता ,  हाँ उन लोगों की चर्चा जरूर करना चाहूंगा जिनका नाम आज तक इस  सन्मान के लिए क्यों नहीं लाया  गया।

देश को आजादी दिलाने वाले शहीदों की पूरी जमात इस सन्मान से वंचित रखी गयी है - वर्ना चंद्रशेखर आजाद , भगत सिंह , राजगुरु,  सुखदेव  छूट जाते ? १९९२ में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को भारत रत्न सन्मान से सन्मानित किया गया किया गया , लेकिन बाद में उनकी मृत्यु के रहस्य को लेकर उनके मरणोपरांत पुरष्कार  की गुत्थी को लेकर  पुरष्कार स्थगित कर दिया गया।   क्या ये पुरष्कार उनके जिन्दा या मुर्दा होने से  सम्बंधित था ? या उनके  कार्यकलापों के लिए ?

 ये सच  है कि हर व्यक्ति को पुरष्कार नहीं दिया जा सकता ;  लेकिन ये भी सच है की अगर कामराज , एमजीआर और गुलजारी लाल नंदा भारत रत्न हैं तो श्री अटल बिहारी वाजपेयी उनसे कहीं बहुत अधिक भारत रत्न हैं ! और एक अंतिम प्रश्न ! नेल्सन मंडेला भारत रत्न कैसे हो गए ? न उनका जन्म भारत में  और न ही कार्यक्षेत्र भारत - फिर भारत कैसे उनपर अपना रत्न होने का दावा कर सकता है ?

कांग्रेसी राज में रत्नों का चुनाव भी कांग्रेसी पैमानों पर ही होता रहा है।