नील स्वर्ग

नील स्वर्ग
प्रकृति हर रंग में खूबसूरत होती है , हरी, पीली , लाल या फिर नीली

Saturday, April 22, 2017

इति विपक्ष एकता प्रकरणम

विपक्षी दलों की एकता

आपने भी पढ़ा होगा की दो दिन पहले नितीश कुमार  श्रीमती सोनिया गाँधी से मिलने गए । मुद्दा था - राष्ट्रपति चुनाव में पूरा विपक्ष एक होकर अपना उम्मीदवार उतारे। सब कुछ तो मीडिया को भी पता नहीं होता। ये रही अंदर की बात -

नितीश - सोनिया जी , आज मैं एक खास मुद्दे पर आपसे बातचीत करने आया हूँ ; मेरा प्रस्ताव है की हम सभी विपक्ष के लोग एकजुट होकर राष्ट्रपति पद का एक उम्मीदवार चुने और मोदी जी के कैंडिडेट को हरा कर उनका घमंड चकनाचूर करें।
सोनिया - आपका विचार अच्छा है , लेकिन क्या मेरे को कैंडिडेट बनाने से मेरा फोरेन रूट का प्रॉब्लम नहीं आएगा ?
नितीश - बिलकुल आएगा , वर्ना आपसे अच्छा कैंडिडेट कौन होता ! वैसे लालूजी भी बहुत इंटरेस्टेड हैं , लेकिन उनको सबका समर्थन नहीं मिलेगा।  मेरे बारे में आपका क्या ख्याल है ? लोग मुझको पसंद करते हैं।

( तभी लालू का प्रवेश )
लालू - क्यों नितीश भाई , आपने चर्चा कर ली हमारे नाम की ?
नितीश - (फुसफुसा कर ) - मैडम ने ना कर दिया है।
लालू - क्यों मैडम ? जब भी कांग्रेस पर संकट पड़ा है , हमने आपका साथ दिया है।
सोनिया - संकट भी तो आपके कारण पड़ा है !

( अखिलेश का प्रवेश )
अखिलेश - सब को पिताजी की तरफ से नमस्ते !
लालू - और तुम्हारी तरफ से ?
अखिलेश - अंकल , हमारी नमस्ते कौन सुनता है ? यू पी  के चुनाव के बाद से ही हम दोनों नौजवानो के सितारे गर्दिश  में है।
सोनिया - तुमने राहुल को बिना मतलब फँसाया !
अखिलेश - आंटी , जाने दें , किसको किसने फँसाया। फिलहाल मैं एक दरख्वास्त लेकर आया हूँ। जब से हम यू पी चुनाव हारे हैं , पिताजी बौखला गये हैं। हारने का कारण मुझे बताते हैं ; जबकि सच्चाई ये है कि मेरे कारण उनकी इज्जत बच गयी ; वर्ना मुख्यमंत्री वो भी होते तो हारना निश्चित था। जहाँ तहाँ मेरे बारे में उल्टा सुलटा बकते हैं। उनके साथ बैठकर शिवपाल अंकल उन्हें भड़काते हैं।
लालू - भैया , ये तो तुम्हारा आतंरिक मामला है तुम्ही निपटो। ऐसे सभा सोसाइटी में समधी जी की टोपी मत उछालो।
अखिलेश - अरे नहीं लालू अंकल , हम तो बस ये अनुरोध लेकर आये हैं , की  आप सब मिलकर उनको राष्ट्रपति का कैंडिडेट बना दो , तो हमारी जान छूट जाये।
सोनिया - इम्पॉसिबल ! मुलायम वाज  वैरी हार्ड ऑन  राहुल। उसने कांग्रेस के  बारे भी  ग़लत बोलै।

( सीताराम येचुरी का प्रवेश )

सीताराम - कम्युनिस्ट पार्टी का कैंडिडेट बनूँगा मैं। कम्युनिस्ट पार्टी ने कभी कोई पद नहीं माँगा।  बल्कि ज्योति बाबू को प्रधानमन्त्री  बनने से भी रोका।  हमेशा आप लोगों का साथ दिया।  हमारा पोलितब्यूरो ने फैसला किया है ,  कि देश का राष्ट्रपति मुझे बनाया जाय।

(अचानक ममता का प्रवेश )

ममता - अच्छा अब गुण्डो की पार्टी को भी राष्ट्रपति बनना है।  तुमलोगों ने पश्चिम बंगाल को बरबाद कर दिया , अब क्या हिंदुस्तान को बर्बाद करोगे।

(मायावती का प्रवेश )

मायावती - कभी तो दलितों की महिला को भी चांस दो ! मैंने फैसला किया है,  कि अब मैं यूपी की चुनावी राजनीति से सन्यास ले लूँ।
अखिलेश - अरे बुआ , सन्यास तो तुम्हे मोदी जी ने दिला दिया। तुम अपने  भतीजे को गलियाती रह गयी , वो हम दोनों की बजा के चला गया।

तभी सम्बित पात्रा का प्रवेश -

संबित - मुझे मोदीजी ने एक सन्देश देकर भेजा है , की इस बार हमलोग एक नयी मिसाल पेश करेंगे।  हमलोग इस बार किसी विरोधी पार्टी के किसी समझदार वरिष्ठ  नेता को राष्ट्रपति  उम्मीदवार बनाएंगे।  अगर आप लोगों ने कोई उम्मीदवार चुन लिया हो तो उन्हें खबर कर देना।

ऐसा सुनते ही सारे नेता भाग लिए सभा से।  अपनी चिर परिचित कुटिल मुस्कान के साथ संबित्त भी वहां से निकल लिए।
                                          
इति विपक्ष एकता प्रकरणम

Wednesday, October 12, 2016

खेल ख़त्म पैसा हजम !

  1. लो जी हमने कल फूंक दिए देश के सारे रावण ! कोई भी नहीं बचा। खेल ख़त्म पैसा हजम ! किसे भुलावा देते हैं हर साल ? जिसे जलाते हैं , वो तो सिर्फ एक पुतला था , जिसे बनाकर किसी गरीब के घर का चूल्हा जला होगा। सड़कों पर बाजार लगते हैं रावण के पुतलों के। छोटा रावण , बड़ा रावण , मूंछ वाला रावण , दस सर वाला रावण ! रावण जितना बड़ा - पैसे उतने ज्यादा। छोटे बच्चे , बूढी औरतें , सभी मिलकर बनाते हैं वो बेंत और कागज वाले रावण। भरण पोषण होता है उनके परिवारों का । ऐसे रावणों को मैं क्यों बुरा कहूँ , जो स्वयं जल कर भी गरीब को रोटी देते हैं।                                       
  2. उन रावणों को कौन जलाएगा , जो निर्भया जैसी मासूम बच्चियों का बलात्कार करते हैं ! उन पुलिस के वेश में बैठे जल्लादों को कौन जलाएगा जो गरीब आदमी को फंसा कर थाने में मार डालते हैं। शहाबुद्दीन जैसे खूंखार हत्यारों को जो बेल पर छुड़ा लेते हैं - उनको कौन जलाएगा ? नगर नगर में रावणों की भरमार है ; लेकिन उनके वध के लिए कोई विजयादशमी नहीं आती।

Wednesday, October 5, 2016

देश की प्रतिक्रिया



देश की प्रतिक्रिया

उरी हमले के बाद पाकिस्तान सोशल मिडिया में छाया हुआ है। ब्रह्मपुत्र के जल की धारा में रुकावट डालने से चीन ने अपना खुला समर्थन पाकिस्तान को दे दिया। तब से लगातार ऐसे सन्देश और संवाद व्हाट्सप्प , ट्विटर और फेसबुक पर घूम रहें हैं , की भारत के लोगों को इन दोनों देशों से व्यापारिक या अन्य किसी प्रकार का रिश्ता नहीं रखना चाहिए। यहाँ तक की दिवाली की खरीददारी में चीनी माल का बहिष्कार करना चाहिए।
इस तरह के संवाद देने वाले तो बहुत है , लेकिन इन पर अमल करने वाले ज्यादातर लोग शांत हैं। मेरे एक मित्र सुशील पोद्दार ने उत्तर दिया कि पिछले कई महीनों की खोजबीन और मोलभाव के बाद उन्होंने एक चीनी कंपनी से अपनी फैक्ट्री के लिए कुछ मशीने खरीदने का निर्णय लिया हुआ था ; लेकिन उरी के बाद के घटनाक्रम ने उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने चीन से मशीन  खरीदने का अपना निर्णय बदल दिया। अब उन्हें नए सिरे से किसी और देश के साथ मोलभाव करना है , और ऊंचे दाम देकर वो मशीन लेनी है। मेरे एक अन्य मित्र श्रवण सुरेका ने भी लिखा की उनकी एक व्यापारिक डील करोड़ों रुपये की एक चीनी कंपनी से तय हो चुकी थी ; लेकिन उन्होंने अपनी डील कैंसिल कर दी।

सुशील पोद्दार और श्रवण सुरेका के निर्णय की किसी ने चाहे वाहवाही नहीं की हो , लेकिन ये लोग हमारे देश के असली देशभक्त हीरो हैं  ; मैं इन्हें सैलूट करता हूँ।
दूसरी तरफ हमारे सामने हैं उदहारण स्वरुप करण  जोहर जो पाकिस्तान की और इसके निंदनीय कलाकारों की वकालत इसलिए कर रहें हैं , क्योंकि उनकी आगामी फिल्म ' ऐ दिल है मुश्किल ' उन पाकिस्तानी सितारों के साथ है और पाकिस्तान उनका बहुत बड़ा मार्केट है। .उसी तरह सलमान खान भी वक़ालत कर रहें हैं ये कह कर की कलाकार कोई आतंकवादी नहीं होता। इन दोनों से एक प्रश्न है - क्या उरी के शहीदों में से एक नाम तुम्हारे सगे भाई का होता , तो भी क्या यही फ़रमाते !

मुम्बई हमले के पहले क्या उन पाकिस्तानियों ने लोगों से पूछा था की तुम में से कोई कलाकार तो नहीं है न ? और न हीं देश के जांबाज कमांडो ने पुछा था , की वो लड़ाई किसके लिए लड़ रहे थे।  मैं निंदा  करता हूँ - ऐसे स्वार्थी लोगों की जो कला की आड़ में देश से ऊपर अपने व्यक्तिगत स्वार्थ को महत्व देते हैं।
एक हैं श्रीमान अरविन्द केजरीवाल ! उनका शौक है , मोदी के प्रति दैनिक अपशब्द कहना। सर्जिकल स्ट्राइक से उनकी बोलती बंद हो गयी थी। कई दिन हो गए, चुप बैठे। जब पेट में ज्यादा दर्द हो गया तो टेलीविजन पर आये ; पहले तो मोदी जी को उनकी राजनैतिक इच्छा शक्ति पर सैलूट ठोका और फिर आ गए अपने असली रंग में। कहने लगे की पाकिस्तान हमारे सर्जिकल स्ट्राइक को झूठ बता रहा है , आप उन्हें इसका प्रूफ क्यों नहीं दे देते ! भाई वाह ! पाकिस्तान के प्रचार की वजह तो सर्वविदित थी ; लेकिन आपके विचलित होने की वजह आपका राजनैतिक घटिया चिंतन है।  आपको लगता है , की ये सर्जिकल स्ट्राइक पंजाब के चुनाव में कहीं मोदी जी हीरो न बना दे। मोदी जी तो हीरो हैं जनाब , पंजाब के ही नहीं , देश के ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के। हीरो तो आप भी हैं लेकिन सिर्फ  पाकिस्तानी अखबारों के ! बधाई हो ! दिल्ली सबकुछ देख रही है।

दुसरे महान नेता कांग्रेस से फूटे - श्रीमान संजय निरुपम । उन्हें तो मानो केजरीवाल ने शब्द दे दिए।  आनन फानन में उन्होंने अपनी नापने वाली इंची टेप निकाल ली , मोदी जी का ५६ इंच का सीन नापने के लिए ; कांग्रेस को अपनी जान बचाने  के लिए इस महापुरुष से किनारा करना पड़ा। ऐसे पप्पू ब्रांड नेताओं की कांग्रेस में कमी नहीं।

बोले तो कुछ और भी लेकिन फिर जल्दी जल्दी फैला हुआ रायता समेत लिया। देश की जनता ऐसे राजनीति की आड़ में देशद्रोह करने वालों को कभी माफ़ नहीं करेगी।
अंत में चर्चा एक और व्यक्ति की - मिडिया के महानायक सुभाष चंद्र जी की! उन्होंने खुल कर कहा की उनका  ज़ी टीवी सूत्रधार था पाकिस्तानी सीरिअल्स को जिंदगी नाम के नए चैनल के माध्यम से भारत में लाने का लेकिन वर्तमान स्थिति को देखते हुए उन्होंने सभी पाकिस्तानी कॉन्ट्रैक्ट कैंसल कर दिए हैं और अब कोई भी पाकिस्तानी कार्यक्रम यहाँ प्रसारित नहीं होगा। आर्थिक हानि तो सुभाष चंद्र की भी हुयी है ; लेकिन उन्होंने कला की दुहाई देकर पाकिस्तानी कार्यक्रमों की वकालत नहीं की  !

और अंत  में एक सन्देश हमारे प्रिय प्रधानमंत्री श्री मोदी जी को !

आदरणीय मोदीजी ! पूरा देश हर कदम पर आपके साथ है। पाकिस्तान के साथ जैसा सलूक किया जाना उचित है , वैसा करें। चंद  लोगों बकवास इस देश के सवा सौ करोड़ देश वाशियों के सामने नक्कार खाने की तूती मात्र है।  उन्हें अनसुना कीजिये और विजय पथ पर बढिए - चाहे शांति के मार्ग से और चाहे युद्ध के मार्ग से !
शत शत वंदन !

Wednesday, September 14, 2016

Priya Kaun ?

प्रिय कौन ?

कल एक रिश्तेदार की मृत्यु हो गयी।  जब उनके घर पहुंचा , तो देखा की मृत शरीर एक अर्थी पर लेटाया हुआ था। परिवार के पुरुष उस अर्थी के ऊपर कपडा और रस्सी आदि बाँध रहे थे। महिलाएं शोक विह्वल होकर एक तरफ खड़ी थी। मृत व्यक्ति के पुत्र शोकाकुल होकर रो रहे थे।  समाज के लोग तथा रिश्तेदार अंतिम विदा देने के लिए पहुंचे हुए थे।

मृत व्यक्ति के भाई ,चाचा , साले  तथा अन्य रिश्तेदार अर्थी तैयार करते हुए निर्देश दे रहे थे -

' बॉडी के ऊपर पहले सफ़ेद कपडा डालो फिर रस्सी बांधो '

' बॉडी के शरीर पर कोई आभूषण तो नहीं है न ?'

'बॉडी को जरा आगे सरकाओ। '

यानि की जीवन का एक प्रिय व्यक्ति अब सिर्फ एक शरीर था - एक बॉडी ! जो प्रिय था जिसे हम नाम लेकर बुलाते थे वो तो चला ही गया था।

यही है शायद आत्मा का रहस्य। आत्मा ही प्रियजन है , आत्मा ही पिता , पति या भाई है।  शरीर तो एक अस्थायी पहचान है उस आत्मा की।

मन की बहुत सी गुत्थियां सुलझ गयी !


Tuesday, July 26, 2016

कुंठा : फ़िल्मी गानों के माध्यम से

कुंठा जीवन की एक सच्चाई है।  असफलता जन्म देती है , निराशा को और निराशा ह्रदय की कुढ़न बन कर बन जाती है - कुंठा। असफलता के कई कारण हो सकते है - खेल कूद , पढ़ाई , व्यापार या प्यार।  फिल्मों से मिलने
 वाले उदाहरण प्रायः प्रेम की असफलता के कारण ही होते हैं। 

इस गीतों भरी बातचीत में हम देखेंगे कुंठा के बदलते हुए स्वरुप।  जब कोई व्यक्ति अपने प्रिय या प्रिया को अपने आप से दूर करने का प्रयास करते हुए देखता है , तो जिस कुंठा का जन्म होता है , उसे कहते हैं ईर्ष्या ! कुंठित मन चीत्कार कर उठता है - और नहीं बस और नहीं , ग़म के प्याले और नहीं !

और जब वह दुराव जीवन के सबसे बड़े नुक्सान में बदल जाता है ; जब उसकी प्रियतमा किसी और की हो जाती है ; तब कुंठा अपने पूरे प्रचंड स्वरुप में आ जाती है। वो समाज चिंता छोड़ कर सीधे सीधे दोष देता है अपनी प्रियतमा को उसका नाम लेकर - ओ मेरी महुआ  तेरे वादे क्या हुए ?


और फिर वो विदा होती है अपने गाँव से , उस समय उस प्रेमी का ह्रदय टुकड़े टुकड़े हो जाता है। उसे अपने टूटे हुए सपने टूटे हुए फूल से और अपनी मीत आँखों में शूल सी चुभती है !


उसकी कुंठा उसे दीवाना बना देती है। वो गली गली भटकता है - ये दुनिया ये महफ़िल मेरे काम की नहीं !


थक हार कर रातों को सोने की कोशिश में अपनी तन्हाई में आवाज देता है - कोई लौट दे मेरे बीते हुए हुए दिन !


और कुंठा का अंतिम स्वरुप उभरता है , पूरे समाज और पूरी दुनिया के प्रति आक्रोश के रूप में। वो चीत्कार कर उठता है - जला दो इसे फूंक डालों ये दुनिया , मेरे सामने से हटालो ये दुनिया ; तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनिया !







Sunday, July 10, 2016

सिंगापुर : पर्यावरण



पर्यावरण की सुरक्षा जीवन के हर काम में निहित होनी चाहिए। एक मजेदार बात ; ख़ास कर हम भारत में रहने वालों के लिए। एक दिन मैंने देखा की हमारी गली में एक मकान के सामने के एक कंक्रीट मिक्सर की गाडी आकर खड़ी थी।  उसका मिक्सर वाला टैंक घूम रहा था।  हमारे देश में इस तरह की गाडी खड़ी होती है किसी निर्माणाधीन ईमारत के पास। मुझे समझ में नहीं आया की ये यहाँ क्या कर रही है !

बाद में जब मैं नीचे गया और उस ईमारत के सामने से गुजरा तो देखा की उसके अहाते में एक मिस्त्री अपने औजार लेकर जमीन की सतह एक हिस्से को ठीक कर रहा था। तब मुझे समझ में आया की इस देश में चाहे कोई छोटी सी मरम्मत ही क्यों न करनी हो , सीमेंट ओर कंक्रीट का गारा खुले में नहीं बनाया जाता है।  ये डिपो से कंक्रीट मिक्सर में डाल कर भेजा जाता है।

अब बताइए , ऐसे देश में कहाँ से किसी प्रकार का प्रदुषण फैलेगा !