नील स्वर्ग

नील स्वर्ग
प्रकृति हर रंग में खूबसूरत होती है , हरी, पीली , लाल या फिर नीली

Saturday, November 11, 2017

Thursday, May 25, 2017

पीपल , गंगा और गाय


पीपल , गंगा और गाय

कई बार मन में आता है ; क्यों महत्व है इन सब का हिन्दुओं के जीवन में ! यूँ तो महत्व बहुत सारी  वस्तुओं का है , लेकिन क्यों कुछ वस्तुओं या जीवों का विशेष महत्व है ? इस चिंतन में मन में एक बात आयी। हम जीवन पर्यन्त संसार की जिस सामग्री का उपयोग करते हैं , उनका हम किसी न किसी रूप में मूल्य चुकाते हैं।  मसलन हमने एक ग्वाले से दूध खरीदा तो उसे दूध का मूल्य दिया , जिससे वो अपनी गायों के लिए चारे की व्यवस्था करता है।  यानी अपरोक्ष रूप से हमने गाय को उसके दूध का पूरा नहीं तो आंशिक मूल्य चुकाया। अगर हम अपने बाग़ से फल तोड़ कर कहते हैं , तो हम उस बाग़ की रख रखाव का दायित्व निभाते हैं।


लेकिन मृत्यु के बाद क्या ? विदेशों में आजकल एक नयी व्यवस्था निकली हुई है। ऐसी ऐसी कम्पनियाँ खुल गयी हैं , जो एक ऐसी सेवा बेचती है , जिसका उपयोग खरीदने वाला व्यक्ति मरणोपरांत ही कर पाता है। वह सेवा है मनचाहा अंतिम संस्कार ! ये कम्पनियाँ अपने ग्राहक से पूछती हैं - १. किस कब्रिस्तान में उसे दफनाया जाय। २. उसकी कब्र कैसी हो ? ३. क्या उस कब्र पर कोई मकबरा बनाया जाय ? ४. उसके शव को कैसा सूट और टाई पहनाई जाए। ५. उसका ताबूत कैसा बनाया जाय।६. उसकी शोक सभा के लिए किस किस को बुलाया जाय। इत्यादि।  हर वस्तु की फोटो दिखाकर उसका मॉडल नंबर लिख कर कॉन्ट्रैक्ट तैयार कर लिया जाता है। उन सेवाओं का जो भी मूल्य होता है वो उस व्यक्ति को कॉन्ट्रैक्ट बनने के समय चुकाना होता है।  सम्भवतः कोई व्यक्ति इन सब चीजों के भविष्य में सुचारु और इच्छानुसार किये जाने के लिए गवाह भी नियुक्त होता होगा।

भारत के परिपेक्ष्य में अगर हम सोचें तो इस हद की मानसिकता हमारे देश में नहीं है ; क्योंकि हम परिवारवादी लोग हैं। बेटे कितने भी नालायक क्यों न हों , मरणोपरांत रीति रिवाज जग दिखावे के लिए ढंग से पूरे करते हैं।  लेकिन सवाल रीति रिवाज का नहीं है।  सवाल है , उस कर्ज का जो हमारे शव के साथ जुड़ा है। आर्य समाज की अंतिम संस्कार पद्धति के अनुसार एक सामान्य मनुष्य के शव के दाह कर्म के लिए १० मन (३७३ किलो) लकड़ी और ४ मन (१५० किलो घी ) की आवश्यकता होती है। शव के पूरी तरह जल जाने के बाद उसकी अस्थियां गंगा या किसी अन्य नदी में बहा दी जाती है।

इस प्रकार हमारे ऊपर मृत्योपरांत तीन कर्ज होते हैं - पेड़ का कर्ज , गाय का कर्ज और गंगा (नदी) का कर्ज। हर व्यक्ति को ये कर्ज अपने जीवन काल में अग्रिम भुगतान के रूप में चुका देने चाहिए।

१. जीवन में एक पेड़ अवश्य लगाएं।

२. एक गाय को जीवन पर्यन्त पालने की व्यवस्था करें।

३. नदियों को दूषित न करें। और आज के समय में तो हम प्रधान मंत्री मोदी के गंगा सफाई अभियान में भी भाग ले सकते हैं।

जीवन के ये चिंतन हमें प्रेरित करते हैं समाज , देश और प्रकृति के प्रति अपने दायित्व का वहन करने की !

Saturday, April 22, 2017

इति विपक्ष एकता प्रकरणम

विपक्षी दलों की एकता

आपने भी पढ़ा होगा की दो दिन पहले नितीश कुमार  श्रीमती सोनिया गाँधी से मिलने गए । मुद्दा था - राष्ट्रपति चुनाव में पूरा विपक्ष एक होकर अपना उम्मीदवार उतारे। सब कुछ तो मीडिया को भी पता नहीं होता। ये रही अंदर की बात -

नितीश - सोनिया जी , आज मैं एक खास मुद्दे पर आपसे बातचीत करने आया हूँ ; मेरा प्रस्ताव है की हम सभी विपक्ष के लोग एकजुट होकर राष्ट्रपति पद का एक उम्मीदवार चुने और मोदी जी के कैंडिडेट को हरा कर उनका घमंड चकनाचूर करें।
सोनिया - आपका विचार अच्छा है , लेकिन क्या मेरे को कैंडिडेट बनाने से मेरा फोरेन रूट का प्रॉब्लम नहीं आएगा ?
नितीश - बिलकुल आएगा , वर्ना आपसे अच्छा कैंडिडेट कौन होता ! वैसे लालूजी भी बहुत इंटरेस्टेड हैं , लेकिन उनको सबका समर्थन नहीं मिलेगा।  मेरे बारे में आपका क्या ख्याल है ? लोग मुझको पसंद करते हैं।

( तभी लालू का प्रवेश )
लालू - क्यों नितीश भाई , आपने चर्चा कर ली हमारे नाम की ?
नितीश - (फुसफुसा कर ) - मैडम ने ना कर दिया है।
लालू - क्यों मैडम ? जब भी कांग्रेस पर संकट पड़ा है , हमने आपका साथ दिया है।
सोनिया - संकट भी तो आपके कारण पड़ा है !

( अखिलेश का प्रवेश )
अखिलेश - सब को पिताजी की तरफ से नमस्ते !
लालू - और तुम्हारी तरफ से ?
अखिलेश - अंकल , हमारी नमस्ते कौन सुनता है ? यू पी  के चुनाव के बाद से ही हम दोनों नौजवानो के सितारे गर्दिश  में है।
सोनिया - तुमने राहुल को बिना मतलब फँसाया !
अखिलेश - आंटी , जाने दें , किसको किसने फँसाया। फिलहाल मैं एक दरख्वास्त लेकर आया हूँ। जब से हम यू पी चुनाव हारे हैं , पिताजी बौखला गये हैं। हारने का कारण मुझे बताते हैं ; जबकि सच्चाई ये है कि मेरे कारण उनकी इज्जत बच गयी ; वर्ना मुख्यमंत्री वो भी होते तो हारना निश्चित था। जहाँ तहाँ मेरे बारे में उल्टा सुलटा बकते हैं। उनके साथ बैठकर शिवपाल अंकल उन्हें भड़काते हैं।
लालू - भैया , ये तो तुम्हारा आतंरिक मामला है तुम्ही निपटो। ऐसे सभा सोसाइटी में समधी जी की टोपी मत उछालो।
अखिलेश - अरे नहीं लालू अंकल , हम तो बस ये अनुरोध लेकर आये हैं , की  आप सब मिलकर उनको राष्ट्रपति का कैंडिडेट बना दो , तो हमारी जान छूट जाये।
सोनिया - इम्पॉसिबल ! मुलायम वाज  वैरी हार्ड ऑन  राहुल। उसने कांग्रेस के  बारे भी  ग़लत बोलै।

( सीताराम येचुरी का प्रवेश )

सीताराम - कम्युनिस्ट पार्टी का कैंडिडेट बनूँगा मैं। कम्युनिस्ट पार्टी ने कभी कोई पद नहीं माँगा।  बल्कि ज्योति बाबू को प्रधानमन्त्री  बनने से भी रोका।  हमेशा आप लोगों का साथ दिया।  हमारा पोलितब्यूरो ने फैसला किया है ,  कि देश का राष्ट्रपति मुझे बनाया जाय।

(अचानक ममता का प्रवेश )

ममता - अच्छा अब गुण्डो की पार्टी को भी राष्ट्रपति बनना है।  तुमलोगों ने पश्चिम बंगाल को बरबाद कर दिया , अब क्या हिंदुस्तान को बर्बाद करोगे।

(मायावती का प्रवेश )

मायावती - कभी तो दलितों की महिला को भी चांस दो ! मैंने फैसला किया है,  कि अब मैं यूपी की चुनावी राजनीति से सन्यास ले लूँ।
अखिलेश - अरे बुआ , सन्यास तो तुम्हे मोदी जी ने दिला दिया। तुम अपने  भतीजे को गलियाती रह गयी , वो हम दोनों की बजा के चला गया।

तभी सम्बित पात्रा का प्रवेश -

संबित - मुझे मोदीजी ने एक सन्देश देकर भेजा है , की इस बार हमलोग एक नयी मिसाल पेश करेंगे।  हमलोग इस बार किसी विरोधी पार्टी के किसी समझदार वरिष्ठ  नेता को राष्ट्रपति  उम्मीदवार बनाएंगे।  अगर आप लोगों ने कोई उम्मीदवार चुन लिया हो तो उन्हें खबर कर देना।

ऐसा सुनते ही सारे नेता भाग लिए सभा से।  अपनी चिर परिचित कुटिल मुस्कान के साथ संबित्त भी वहां से निकल लिए।
                                          
इति विपक्ष एकता प्रकरणम