नील स्वर्ग

नील स्वर्ग
प्रकृति हर रंग में खूबसूरत होती है , हरी, पीली , लाल या फिर नीली

Saturday, July 6, 2013

हाइवे का ड्राइवर : सच्ची कहानी

एक था ट्रक ड्राइवर - चंद्रू ! एक ट्रांसपोर्ट कंपनी के लिए ट्रक चलाता  था। ट्रांसपोर्ट कंपनी का मालिक ट्रक पर अपने ग्राहकों के कारखानों से माल लदवा  देता था और रस्ते के खर्च के पैसे देकर चंद्रू को भेज देता था लम्बे लम्बे हाइवे  के लम्बे लम्बे सफ़र पर . ट्रक ड्राइवर की जिंदगी में ट्रक ही उसका घर होता है , जहाँ वो रहता हैं उन तमाम दिनों में जब वो अपने परिवार से दूर रहता है . ट्रक में परिवार की तस्वीर देख देख कर उनके पास होने को महसूस करता है .

ऐसी ही एक यात्रा में चंद्रू अपने ट्रक में किसी दवा  कंपनी का कीमती माल भर के ले जा रहा था . दावा के हलके हलके छोटे छोटे कार्टून भी लाखों रुपैये के होते हैं . माल के ऊपर बंधा होता है मजबूत रस्सियों के नीचे एक मोटा सा तिरपाल , जो माल को बरसात और चोरों से सुरक्षित रखता है . सूरज ढलने के बाद बढ़ चले अँधेरे का समय था . चंद्रू अपनी मस्ती में अपना ट्रक भगाए जा रहा था . हाइवे का एक सुनसान पहाड़ी हिस्सा था . एक मोटर साईकिल पीछे से आई और उसने आगे बढ़ कर ट्रक का रास्ता रोक लिया . उसपर बैठे दो लोगों में से एक उतर कर चंद्रू के कैबिन में घुस गया . उसने अपने कम्बल से एक खतरनाक चाकू निकाला और चंद्रू को धमकी दी - चुपचाप चलते रहो . सामने मोटर साईकिल जा रही थी जिसके कारन चंद्रू धीमी गति से ट्रक को चला पा रहा था . अचानक चंद्रू को आभास हुआ की ट्रक के ऊपर भी कुछ लोग चढ़ गए हैं , लेकिन वो मुड  के कुछ देखने की कोशिश करता , उसके साथ बैठे गुंडे ने चाकू को उसकी गर्दन पर रख दिया और बोला - ज्यादा होशियारी की तो मारे जाओगे . आधे घंटे के बाद उस गुंडे ने ट्रक रुकवाया . उतरते उतरते उसने फिर चंद्रू को धमकी दी - पुलिस में जाने की गक्ति मत करना वर्ना तुम्हारा और हमारा रोज का रास्ता यही है .सारे चढ़े हुए गुंडे उतर गए . चंद्रू ने देखा की पीछे पीछे एक पिक अप वें आ रही थी . उसे समझ में आ गया की गुंडों ने रस्सी काट कर कुछ माल उतार  लिया है . लेकिन वो इतना डरा हुआ था की अगले आधे घंटे तक वो चुपचाप ट्रक चलाता रहा . फिर किसी ढाबे के पास उसने ट्रक खड़ा किया . ट्रक पर चढ़ कर देखा तो पाया की ट्रक के ऊपर के मोटे रस्से को तथा फिर उसके नीचे के तिरपाल को किसी तेज हथियार से काट दिया था , और उसके बीच खाली  जगह से पूरा गड्ढा बना हुआ था . उसने अंदाज लगाया की कम से कम २० कार्टून गायब थे .

उसने ट्रांसपोर्ट के मालिक को फोन किया और सारा  किस्सा बताया . पहले तो ट्रांसपोर्ट के मालिक ने मोटी  मोटी  दस बीस गालियाँ सुनाई और कहा की वो क्या सो रहा था , की उसको माल निकलने का पता नहीं लगा . आखिर मालिक ने कहा की नजदीक के पुलिस स्टेसन पर जाओ और ऍफ़ आई आर दर्ज करवाओ .

चंद्रू पहुंचा पुलिस स्टेसन ! वहां एक हवलदार बैठा हुआ ऊंघ रहा था . चंद्रू ने उसे जगाया और कहा की रपट लिखनी है . उसने कहा - सवेरे आओ , अभी साब बाहर दौरे पर गए हैं . अन्दर से किसी की आवाज आई - " कौन है बे ". हवलदार ने उत्तर दिया - सर कोई ट्रक वाला है . अन्दर से फिर आवाज आई - ठीक है , बोलो सवेरे आये . सवेरे का मतलब १० बजे !

चंद्रू ने बहुत विनती करने की कोशिश की , लेकिन हवलदार बात करने के मुड  में बिलकुल नहीं था . चंद्रू ने अपने मालिक को फोन किया . मालिक ने फिर १० - २० मोटो मोटी  गालियाँ दी आयर फिर सलाह दी की रात भर गाडी के पास पहरा दो और सुबह पुलिस स्टेसन पर जाओ . चंद्रू बेचारा रात भर जाग कर पहरा देता रहा ; न रात का खाना खाया और न एक पल को सोया . सुबह रात भर का जाग उनींदा चंद्रू पहुंचा पुलिस स्टेसन . हवलदार तरोताजा बैठा था . पहले सारी  कहानी सुनी फिर बोला - हम्म्म ! किस्सा तो अछ्छा है, लेकिन साहब को पसंद नहीं आएगा . कोई सस्ता मन्द माल होता तो शायद सस्ते में काम पट जाता। लेकिन इसमें हाथ नहीं डालेंगे . चंद्रू की समझ में कुछ नहीं आया .

डेढ़ घंटे बैठने के बाद सब इन्स्पेक्टर ने बुलाया और बोला - बताओ ? चंद्रू विस्तार से पूरी बात बताने लगा ; एक वाकया बोल भी नहीं था , की सब इन्स्पेक्टर गुस्से में बोला - पूरी रामायण मत सुनाओ , बस बताओ कितने का माल है ? चंद्रू बोल - साहब २० -२२ कार्टून गए हैं , पंद्रह  बीस लाख का तो जरुरे होगा . साल सब की मिली भगत है .

साला , किसको मालूम तुम्हारा स्टोरी कितना सच्चा है ? तुम्ही किया होगा तो ? खैर ये बताओ की किसने किया ?

सर मुझे क्या मालूम ? मैं किसी को नहीं जानता . हाँ , जो मेरे साथ ट्रक में बैठा था उसे पहचान सकता हूँ .

अबे , चोरी किसने की ? वो जो ट्रक के ऊपर चढ़े थे . पहचानना तो उनको पड़ेगा न ? खैर, जाने दो . ये घटना कहाँ हुई ?

सर, मैं इतना डर गया था, की उनके उतरने के बाद आधी घंटा मैं गाडी भगा कर यहाँ आया हूँ . मुझे लगता है कम से कम २० - २५ किलोमीटर के पहले !

सब इन्स्पेक्टर ने जोर से रजिस्टर बंद किया और बोला - साले , भाग यहाँ से ! यहाँ क्या लेने आया है ?

सर, तो मैं क्या करूँ ?

गंगा जी में छलांग लगा दो .

हवलदार जोर जोर से हंसा - सर आपका वो क्या कहते हैं न - हूमर ऑफ़ सेन्स बहुत बढ़िया है .

सब इन्स्पेक्टर - सेन्स ऑफ़ हूमर !

चंद्रू गिडगिडाया - साहब , मेरी मदद करो , मैं गरीब आदमी कहाँ जाऊं ?

सब इन्स्पेक्टर - साल तुम लोगों का प्रोब्लम ये है की तुम लोगों को कोई कानून कायदा मालूम नहीं ; और लेकर निकल पड़ते हो लाखों करोड़ों का माल . अगर तुम्हारा माल चोरी हुआ बीस पच्चीस किलोमीटर पहले तो तुम्हे जाना पड़ेगा चांदपुर पुलिस स्टेसन , क्योंकि हमारे पुलिस स्टेसन की हद तो पिछले दस किलोमीटर से शुरू होती है . अब यहाँ से चलते नजर आओ !

निराश चंद्रू  ने फिर अपने मालिक को फोन किया और फिर वही मोटी  मोटी  गालियों का सन्देश . थका  मांदा , भूखा प्यासा , डरा सहमा , अपमानित चंद्रू वापस गाडी को लेकर पहुंचा चांदपुर पुलिस स्टेसन में . वहां फिर उसका वैसा ही स्वागत हुआ . एक अंतर था - वहां के सब इन्स्पेक्टर ने उसकी कहानी सुनने के पहले २ -४ थप्पड़ रसीद कर दिए . चंद्रू कुछ समझ नहीं पाया .

सब इन्स्पेक्टर बोला - तुम लोग सब साले मिले हुए हो . तुम तुम्हारा ट्रांसपोर्ट और वो दवा  वाला . सबको झूठा ऍफ़ आई आर चाहिए , क्योंकि सेठ लोग को इन्सुरेंस से पैसा मिल जाएगा . तुमको बक्शीश मिल जायेगी , और तुम्हारा ये ऍफ़ आई आर पड़ा रहेगा हमारे गले  में - हमारा रेकोर्ड बिगाड़ने  को ! फोन कर के सेठ से बात कर लो की ऍफ़ आई आर चाहिए तो ५ पेटी लगेगा .

चंद्रू की आँखें फटी की फटी रह गयी . बोला - साहब मैं किस मुंह से इतना पैसा के लिए बोलूं सेठ को ; उसका तो पहले ही कितना नुक्सान हो गया है .

सब इन्स्पेक्टर -सुन बे , सेठ के पैसों की इतनी फ़िक्र है तुझे तो वहीँ जा, यहाँ हमारा टेम  ख़राब न कर !

चंद्रू - साब ! मेरी एक बात मानेंगे ? मैं फोन लगा के देता हूँ , आप ही सेठ से बात कर लो !
चंद्रू अपने मोबाईल फोन से सेठजी का नंबर लगाता  है और बोलता है - सर, चांदपुर पुलिस टेसन से बोल रहा हूँ . यहाँ के बड़े साब आपसे बात करना चाहते हैं .

ये कह कर चंद्रू ने अपना मोबाईल फोन सब इन्स्पेक्टर के हाथ में दे दिया . सब इन्स्पेक्टर ने कहा - देखिये सेठजी , इस तरह के झूठे कम्प्लेन  हमारे पास रोज आते हैं . ये ट्रक ड्राइवर लोग खुद ही माल बेच खाते हैं और फिर चले आते हैं यहाँ शिकायत लिखाने ! बताएं हम क्या करें ?

थोड़ी देर बाद जब बात ख़तम हो जाती है तो सब इन्स्पेक्टर कहता है - हाँ भैया , अब बताओ क्या करें ?

चंद्रू ने डरते डरते पुछा - क्या कहा सेठजी ने ?

सब इन्स्पेक्टर ने कहा - तुम्हारे सेठ ने बोला  की अगर ड्राइवर पर डाउट हो तो साले के मार मार के खाल उधेड़ दो , लेकिन एक ऍफ़ आई आर लिख कर दे दो .

चंद्रू सहम गया . बोला - साहब , आपको मेरे ऊपर डाउट है ?

सब इन्स्पेक्टर थोडा नरम पड़ा - भई , बात ये है - सब को अपनी पड़ी है . जैसे तुम्हारे सेठजी के अपने ऍफ़ आई आर के सामने तुम्हारी कोई कीमत नहीं , तुम्हे अपनी नौकरी के लिए ऍफ़ आई आर चाहिए , वैसे ही हम लोगों को भी अपने प्रोमोसन के लिए हमारा रेकोर्ड क्लीन चाहिए . रही बात लुटेरों की ; तो वो तो ये काम रोज करते हैं . हम सब को जानते भी हैं , लेकिन उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकते . लूट का आधा  हिस्सा इस एरिया के एम पी का है .एम पी की भी मजबूरी है , ये इलाका इतना गरीब है , की चुनाव लड़ने का चंदा  कहाँ से आये !

चंद्रू रोते रोते बोला - साब मैं क्या करूँ ? कहाँ जाऊं ?

सब इन्स्पेक्टर ने कहा - इस फालतू नौकरी को छोड़ो , अपने गाँव जाओ , फॅमिली के साथ रहो . चाहे मेहनत  मजदूरी कर  लो . ऐसे सेठ की नौकरी करके क्या फायदा !

चंद्रू को इन्स्पेक्टर की बात समझ में आ गयी . उसने उसी समय निर्णय ले लिया की उस क्षण के बाद वो कभी किसी ट्रक को नहीं चलाएगा , और न ही उसका बेटा  या पोता  ये काम करेगा .

[ ये संकेतिक कथा है हाइवे पर ट्रक चलने वाले ट्रक ड्राइवरों के जीवन की दुर्दशा के बारे में . उनका जीवन खतरों से भरा होता है . परिवार से दूर बुरे से बुरे मौसम में वो अपने ट्रक से जूझता है . सन्मान या आत्म सन्मान नाम की चीज उसके जीवन में नहीं . इसका परिणाम ये है की आज देश में हर १० ट्रकों के पीछे सिर्फ ८ ड्राइवर उपलब्ध हैं . ये संख्या निरंतर घट रही है . ड्राइवरों की अगली पीढ़ी कभी भी इस पेशे में नहीं आएगी .]


1 comment:

  1. Very true and touchy story.
    But every problem has a solution and if industry start thinking about this, the situation will be different like a Doctor train his/her child to be a doctor and an advocate train his/her child to be an advocate same way a Driver can also train his/her child to be a Driver.

    industry can come together and adopt some villages, arrange the medical and education options for their families, make sure that drivers are getting enough earnings, treated well, can keep separate team to deal with theft and pilferage issues, let driver be a driver only.

    industry can create common support functions across india to help Drivers from small companies who can't afford to have separate teams for these functions.

    you seems to be a sensitive person and if you start I am sure the industry will come after you.

    keep writing.

    Best Regards,

    Arvind Mittal

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