नील स्वर्ग

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प्रकृति हर रंग में खूबसूरत होती है , हरी, पीली , लाल या फिर नीली

Saturday, July 4, 2026

 

संयुक्त परिवार - एक कथा

 


पहले हमारे परिवार बहुत बड़े होते थे।  चाचा ताऊओं के परिवार इकट्ठा रहते थे।  सभी के बच्चे आपस में भाई बहन और दोस्त बन कर रहते थे।  ताऊ बन जाते थे बड़े पापा , और चाचा होते थे छोटे पापा।  पापा तो पापा थे ही।  दादा दादी पूरे परिवार के सिरमौर होते थे।  कोई बड़ा निर्णय उनकी अध्यक्षता के बिना नहीं लिया जाता था।  नयी दुकान खरीदना , घर का रंग रोगन , बड़े को इंजीनियरिंग के लिए दूसरे शहर भेजना , छोटे को गर्मी की छुट्टियों में स्कूल के ग्रुप टूर में भेजना , बिटिया के लिए सम्बन्ध ढूंढ़ना आदि निर्णय ऐसे ही लिए जाते थे।  कई बार कुछ निर्णय किसी के लिए अप्रिय भी होते , तो भी क्षण भर की प्रतिक्रिया के बाद सभी को सब कुछ मान्य हो जाता।  आज कहाँ गया वो संयुक्त परिवार ?

 

संयुक्त परिवार तभी तक संयुक्त रहता है , जब तक सबका दुःख और सबका सुख साझा होता है।  घर की सारी  दौलत साझी होती है।  जब कोई भी व्यक्ति अपना कुछ व्यक्तिगत बना लेता है , तो वहीं से दरार पड़नी शुरू हो जाती है।  स्वार्थ एक संक्रामक रोग की भांति घर में व्याप्त होता चला जाता है।  हर व्यक्ति अपने स्वार्थ को दूसरे  के उदाहरण से सही बताता है।  जब सबकी जमा पूंजी अपनी बनने लगती है , तब उसके बाद अगला नंबर आता है , संयुक्त जिम्मेवारियों का। हर व्यक्ति हर जिम्मेवारी को दूसरे पर डालने की कोशिश करता है।  ख़ास कर जहाँ कोई बड़ा खर्च आता है , तो सभी पल्ला झाड़ने लगते हैं।  फिर वही तर्क - हमारे समय में हमें कौन देने वाला है !

 

अगला विभाजन बच्चों में शुरू होता है।  मेरे बच्चे तो अच्छे अंग्रेजी स्कूल में पढ़ेंगे।  खर्चा हम खुद दे देंगे।  ताई जी घोषणा कर देती है , की उनका बिट्टू विदेश में पढ़ने जाना चाहता है।  अब कोई कैसे रोक सकता है ! पैसे का सवाल तो साझे खाते में खड़ा होता है।  बेटियों के विवाह में होने वाले खर्च बँट  जाते हैं। घर में १-२ की जगह ४-५ गाड़ियां आ जाती है।  ड्राइंग रूम के टेलीविजन की जगह सबके कमरों में अपना अपना टेलेविज़न आ जाता है।  रसोई भी एक नहीं रह पाती।  सबको अपनी अपनी पसंद के व्यंजन चाहिए।  चाची कहती है , मेरे बच्चे तो अंडा खाना चाहते हैं।  बस इस आधार पर उनका एक नया रसोई घर बन जाता है।  शुरू में इसे व्यक्तिगत पैंट्री कहा जाता है ; लेकिन धीरे धीरे वो व्यक्तिगत रसोई का रूप ले लेता है।  अब सबको चाहिए ऐसी व्यवस्था !

 

इस पूरे बिखराव का सबसे बड़ा शिकार होते हैं - घर के बुजुर्ग दादा दादी ! वो तो जीवन के संध्याकाल में परिवार के सौहार्द का आनंद ले रहे थे , लेकिन धीरे धीरे उनकी पैरों के नीचे से धरती कब खिसक जाती है , उन्हें पता ही नहीं चलता।  सबके भोजन अलग बन रहें हैं , ऐसे में  वो असहाय होकर प्रतीक्षा करते हैं अपने भोजन की।  जो बेटे शाम को दफ्तर से लौटकर उनके पास १-२ घंटे बिताते थे , वो अब थकान का बहाना बना कर सीधे अपने कमरे की तरफ बढ़ जाते हैं।  चाय उनके कमरे में ही चली जाती है।  कोई ये नहीं पूछता की घर के बुजुर्गों को क्या चाहिए।  बच्चे भी अब रामायण महाभारत की कहानियां सुनने नहीं आते।  दौड़ते दौड़ते कमरे में आते हैं और गुड मॉर्निंग , गुड नाईट बोलकर भाग जाते हैं। 

 

दादाजी को दिखाई कम देता है ; दादीजी को सुनाई कम देता है।  इसलिए उनके कमरे में टेलीविजन की क्या जरूरत !  लेकिन जो उनकी जरूरत है उसका क्या ? उनकी जरूरत है समय पर भोजन , दवायें , जरूरत के अनुसार डॉक्टर से मुलाकात , विशेष अवसरों पर मंदिर जाने का मन , और हाथ में थोड़े बहुत रुपये , जो वो बच्चों को जन्मदिन के उपहार के रूप में हाथ में पकड़ा देते। और सबसे बड़ी जरूरत होती हैं , उनके परिवार जनों का समय ; जो घटते घटते विलुप्त प्रायः हो जाता है।     जिन्होंने अपने जीवन के सारे साल , सारी  कमाई , सारा प्यार - अपने इस भरे पूरे परिवार पर लुटा दिया ,  वही अब खाली  हाथ , दुखी मन और बेबस निगाहों से अपनों की राह तकते हैं। 

 

और अंतिम कुठाराघात ! बेटों ने मिलकर निर्णय ले लिया , इस बड़े से घर को बेच कर तीन छोटे फ्लैट खरीद लेने चाहिए।  किसी ने उनसे सलाह नहीं ली।  उनसे उनकी मन की इच्छा नहीं पूछी। बस  फ़रमान जारी कर दिया।  उस रात ऐसा कार्यक्रम बना की पूरा परिवार एक साथ डाइनिंग टेबल पर दादा जी और दादीजी के साथ भोजन करेगा।  दादाजी की पसंद का भरवा करेला , और दादी की पसंद की पकोड़ियों वाली कढ़ी बनाई गयी। बच्चे भी प्यार से दादा दादी बोल कर उनकी गोद  में आ बैठे। 

 

भोजन के बाद मीठी खीर खाते  समय बड़े पापा ने पूरी बात बताई।  पहले तो सबके बढ़ते परिवार और बड़े होते बच्चों की समस्या बताई।  सबको अपना प्राइवेट स्पेस चाहिए - ये बताया।  फिर बताया की दूर दूर रहने से प्रेम ज्यादा बढ़ता है।  इन सारी  बातों पर गौर करके उन्होंने ये फैसला लिया है की इस घर को बेच कर आने वाली धन राशि के तीन भाग कर दिए जायें।  तीनों बेटे अपने अपने हिस्से के धन से अपना एक फ्लैट खरीद लें।  थोड़ा हिचक कर बड़े पापा बोले - इस व्यवस्था में आपका भी समुचित ध्यान रखा गया है।  आप जिस बेटे के साथ रहना चाहें , उस बेटे को बाकी दो भाई अपने हिस्से से थोड़ा धन दे देंगे , जिससे वो अपने फ्लैट में एक कमरा आपका भी रखें। 

 

खिसियानी सी मुस्कराहट के साथ बड़े ने कहा - क्यों ठीक है न पापा जी !

बाकी दोनों भाइयों ने हाँ में हाँ मिलाई - हाँ पापा , बहुत सूझ बूझ के साथ भैया ने ये रास्ता निकाला है। 

 

दादाजी ने खीर का प्याला पहले ही नीचे रख दिया था।  खड़े होकर बोले - दो दिन का समय दे दो।  सोच विचार कर बताऊँगा। 

तीनों भाइयों को दादाजी का ये उत्तर अच्छा नहीं लगा।  बहुओं के चेहरे से तो नाराजगी टपकने लगी थी।  बड़े भैया ने स्थिति संभाली - क्यों नहीं पिताजी , आपकी सम्पति है , आप पूरा सोच विचार कर लीजिये।  सबकी आपस में खुसुर पुसुर चल रही थी। 

 

दो दिनों बाद दादाजी ने तीनों बेटों और तीनों बहुओं को शाम के ५ बजे अपने कमरे में बुलाया।  बुलाकर कहा - मैंने तुम्हारी समस्याओं पर पूरा विचार किया।  सभी सही कहते हो। दुःख इस बात का है तुम लोगों ने हमारी समस्या पर कोई विचार नहीं किया।  तुम सब के साथ रहते हुए भी हम एक वृद्धाश्रम की तरह रह रहें हैं , तुम सब अलग अलग रहोगे , तो फिर कोई हमारी तरफ झाँक के भी नहीं देखेगा। 

 

बड़े  ने गंभीर आवाज में कहा - तो आपने क्या फैसला किया पापा जी। 

 

दादाजी बोले मेरा फैसला अभी आता ही होगा।  तभी दरवाजे की घंटी बजी।  दादाजी के परम मित्र अधिवक्ता ब्रिज मोहन पधारे। 

 

दादाजी बोले - बृजमोहन मेरा कागज लाये हों क्या ?

 

बृजमोहन ने हामी भरते हुए एक फाइल दादाजी को दे दी।  दादाजी ने पहले उसे पढ़ा , फिर उसपर अपना तथा दादीजी का साइन कर दिया। 

 

दादाजी उस कागज़ को देखते हुए बोले - मेरी सम्पति ये मकान है।  मैंने बृजमोहन की निगरानी में तुम लोगों को इस सम्पति को बेचने के लिया कहा है।  जितना पैसा आएगा , उसके पांच हिस्से होंगे।  चार हिस्सों से चार बराबर के फ्लैट ख़रीदे जाएंगे।  पांचवां हिस्सा तुम्हारी माँ और मेरे नाम की एफडी में निवेश किया जाएगा।  उसका मासिक ब्याज हमारे जॉइंट खाते में आता रहेगा , जिससे हमारा अपना जीवन चल सके।  तुम सब को एक एक फ्लैट मिलेगा और एक फ्लैट मुझे और तुम्हारी माँ को मिलेगा।  तुम्हारे पास तुम्हारी आमदनी के साधन हैं , उससे तुम अपना निर्वाह करोगे। 

 

हमारी मृत्यु के बाद हमारे फ्लैट का निर्णय हम करेंगे , तुम सब के व्यवहार के अनुरूप।  तुम्हारी कोई बाध्यता नहीं है , की तुम लोग हमसे कभी मिलने आओ, या हमारी देख भाल करो। 

 

मेरा ये फैसला मेरी उम्र के सभी माता पिता को भी राह दिखायेगा।  हमारे बच्चे हमारे अपने होते हैं।  हमारा सब कुछ उनके लिए ही होता है ; लेकिन ये सब सही है , जब की हमारे बच्चे भी हमें हमेशा अपना  समझें। हमारी ममता हमारे बच्चों के लिए सच्ची होती है , लेकिन जीवन की सच्चाई  ये भी है , कि ममता के प्रवाह में बिलकुल कंगाल होकर आप नहीं बैठें।  

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