नील स्वर्ग

नील स्वर्ग
प्रकृति हर रंग में खूबसूरत होती है , हरी, पीली , लाल या फिर नीली

Wednesday, August 22, 2012

क्या कहना है , क्या सुनना है

आखिर कांग्रेस ने चैन की सांस ली . अन्ना एंड कंपनी हार मान कर चले गए . जाते जाते ये धमकी दे गए की अब अगला मुकाबला चुनाव के मैदान में होगा . फिर आये बाबा रामदेव . उन्होंने अपनी सभा पहले कांग्रेस को निमंत्रित कर के शुरू की . बाबा भी जानते थे की कांग्रेस जैसी अहंकारी पार्टी के कानों पर जूं  भी नहीं रेंगेगी . उनका अगला दांव था , अन्य सभी राजनैतिक दलों को अपने मंच पर दावत देना . और लोग आये . खूब जम कर आये और जम कर बोले . कांग्रेस को कहने को एक बात मिल गयी की बाबा तो बी जे  पी के ही आदमी हैं . बाबा भी जोरदार गर्जना के साथ हरिद्वार चले गए .

कांग्रेस ने सुख की सांस ली . वो ये समझती है कि  खतरा टल  गया. उनका ये सोचना उस कबूतर की सोच की तरह है जो आँखें बंद कर के कल्पना करे कि  बिल्ली उसके सामने से हट गयी . कांग्रेस का खतरा अन्ना या बाबा नहीं , बल्कि स्वयं कांग्रेस है . एक के बाद एक घोटाला ! कोमनवेल्थ  ! टू  जी ! एअरपोर्ट की जमीन ! और अब कोयला कांड ! सारे एक से बढ़ कर एक ! लाख करोड़ अब भ्रष्टाचार की एक छोटी इकाई बन चुकी है . बतीस रुपैये की कमाई  को गरीबी रेखा की उपरी सीमा  बताने वाले देश में एक एक मंत्री लाख करोड़ की लूट मचा रहा है . और अब तो पानी सर से ऊपर जा चुका  है . पहले के सारे घोटाले तो अलग अलग मंत्रियों की देख रेख में संपन्न हुए थे , और विपक्ष तक भी प्रधानमंत्री को एक विफल लेकिन इमानदार प्रधानमंत्री मानता था . लेकिन इस बार तो सारे छलावे  समाप्त हो चुके हैं  . कोयला विभाग सीधा सीधा मनमोहन सिंह जी के अंतर्गत रहा है . कोयला खानों के सारे आबन्टन  उनके ही हस्ताक्षर से हुए हैं . ऐसे में कोई क्या कहे और क्या सुने . कपिल सिब्बल पालतू मंत्री की तरह कह रहें हैं की हमारे प्रधानमंत्रीजी कुछ भी गलत नहीं कर सकते हैं ; जिसका सीधा सीधा मतलब ये निकलता है की बाकी सारे मंत्री तो कुछ भी गड़बड़ कर सकते हैं लेकिन प्रधानमंत्री जी नहीं .

अन्ना और बाबा अपना अपना आन्दोलन कर के चले  गए - ऐसा कांग्रेस समझती है . आन्दोलन कोई आयोजन नहीं है ,जो 3-4 दिनों के लिए रामलीला मैदान या जंतर मंतर पर होता है . आन्दोलन एक वृक्षारोपण है , जो एक बीज को मिटटी में डालने से शुरू होता है . आन्दोलन उसी ख़ामोशी से आगे बढ़ता है जिस ख़ामोशी से मिटटी के नीचे दबा हुआ बीज अंकुरित होता है  और पनपता है . वो नजर तब आता है जब वो एक ऐसे विशाल पेड़ का रूप धारण कर लेता है , जो कठोर से कठोर तूफानों में भी सर उठाये खड़ा होता है . भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना और बाबा का आन्दोलन भी ऐसे ही एक बीज के रूप में प्रत्येक भारतीय के ह्रदय में पनप रहा है . और इसका विशाल रूप दिखाई देगा जब अगले चुनाव में पूरे देश का जनादेश इस भ्रष्ट सर्कार के खिलाफ दिखाई देगा .

ऐसे में याद आती एक गीत की पंक्तियाँ - ' कुछ न कहो , कुछ भी न कहो ; क्या कहना है , क्या सुनना है ; हमको पता है , तुमको पता है ,समय का ये पल थम सा गया है !'

Friday, August 3, 2012

कुछ तो लोग कहेंगे !

एक कहानी याद आती है . एक बाप और बेटा कहीं यात्रा पर पैदल जा रहे थे . साथ में उनका एक गधा चल रहा था . रस्ते में किसी ने व्यंग किया - देखो , कैसे बेवकूफ है ; दोनों पैदल चले जा रहे हैं , गधे पर नहीं बैठते . दोनों ने सोचा चलो गधे पर बैठ जाते हैं . फिर किसी ने फिकरा कस  दिया  - दो दो मुस्टंडे एक बेचारे निरीह प्राणी पर  लाद   कर जा रहे हैं . बाप ने कहा - बेटा, मैं उतर जाता हूँ , तो बैठा रह . फिर किसी ने फिकरा कसा - क्या जमाना है , जवान बेटा तो गधे पर मजे से बैठा है , बूढा बाप पैदल चल रहा है . बेटा बोला - बापू, लोग ठीक कह रहे हैं ; ये अच्छा नहीं लग रहा . आप बुजुर्ग हैं , आप गधे पर बैठो , मैं नीचे उतरता हूँ . फिर एक व्यंग आ गया - देखो बाप है की कसाई.  इतनी गर्मी में बेटा पैदल चल रहा है , लेकिन जालिम बाप मजे से सवारी कर रहा है . यानि दुनिया तो कुछ न कुछ कहेगी ही .

 
यही हुआ टीम अन्ना के साथ . जब टीम अहिंसक तरीके से अनशन के द्वारा लोकसभा में बैठे प्रतिनिधियों से गुहार कर रहे थे लोकपाल की ; तब लोकसभा में नेताओं के वक्तव्य आते थे ; कोई भी कानून सड़कों पर नहीं बनते . कानून बनते हैं लोकसभा में जहाँ चुने हुए जन प्रतिनिधि देश के हित के निर्णय लेते हैं . कई महानुभावों ने तो तो अन्ना को चुनौती  दे दी , की हिम्मत हो तो हमारी तरह चुनाव लड़ के दिखाओ ; और फिर बनाओ जो कानून तुम्हे बनाना है . एक साल के संघर्ष के बाद टीम अन्ना ने कल सबको चौंका दिया - ये कह के अगर यही रास्ता बचा है तो हम भी तैयार है चुनाव लड़ने के लिए .
 
अब वही सारे  महापुरुष कह रहे हैं की इनका असली अजेंडा तो यही था , सत्ता में आने का ! वाह ! चित्त भी मेरी और पट भी मेरी ! ये बहुत सही विचार है टीम अन्ना  का . एक वर्ष के संघर्ष में उन्होंने अपने लिए ऐसी छवि बना ली है की - किसी भी चिंतनशील व्यक्ति के लिए अन्ना की पार्टी ही पहला विकल्प होगी .
 
हार में से ही जीत का रास्ता निकलता है . इस यु पी ऐ सर्कार ने टीम अन्ना का तिरस्कार  और बहिष्कार करने में कोई कमी नहीं रखी .बेशर्मी से इन बहादुर युवकों के अनशन को भी अनदेखा करते रहे . और इसी परिस्थिति ने जन्म दिया टीम अन्ना के इस नए विचार को .
 
मेरी पूरी सहमति और शुभकामना - इस बहादुर सेनापति की बहादुर टीम को !

Thursday, August 2, 2012

रक्षा बंधन



रक्षा बंधन - एक ऐसा दिन जो याद दिलाता है हर भाई को अपनी बहन की रक्षा करने के  कर्तव्य का ! एक ऐसा दिन जब एक बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बाँध कर जताती है अपना विशवास अपने भाई की शक्ति में ! क्या भाई सिर्फ वो होता है जो उसका अपना सहोदर हो ; या फिर वो जो उसकी रक्षा करे भाई की तरह !

भ्रष्टाचार का प्रेत पूरे देश को निगल रहा है .  पहले इसके निवाले होते थे छोटे छोटे , लेकिन अब ये अजगर बहुत जल्दी  में है सब कुछ खा जाने के लिए  . सत्य वो नहीं है जो मिडिया हमें दिखने की कोशिश कर रही है  ; सत्य वो भी नहीं जो बहुत से तथाकथित बुद्धिजीवी टेलीविजन के वातानुकूलित स्टूडियो में बैठ कर बताते हैं ; सर्कार जो बताती है उसमे सत्य का कोई अंश तक नहीं है . सत्य ये है की चार देशभक्त - अन्ना , अरविन्द, गोपाल और मनीष सिसोदिया अपने प्राणों की बाजी लगाकर एक क्रांति लाने का प्रयास कर रहें हैं , इस देश में . मिडिया को जब कोई दूसरा कारण  नहीं मिलता , उन लोगों के खिलाफ कुप्रचार का , तो ये इल्जाम लगाते  हैं की उनका कोई छिपा हुआ राजनैतिक अजेंडा है . काश कोई राजनैतिक अजेंडा ही होता , कम से कम इस देश के भ्रष्ट राज नेताओं के सामने कोई देशभक्त तो खड़ा होता चुनौती  लेकर .

 आज रक्षा बंधन के दिन मैं आह्वान करता हूँ देश की तमाम बहनों का कि  आपके चार भाई दिल्ली के जंतर मंतर पर बैठे हैं , अनशन पर - सिर्फ आपकी और हम सब की रक्षा के लिए . जाइए और उन सब की कलाइयों   पर बांधिए राखियाँ अपनी भावना को साकार रूप देने के लिए . आपकी राखियों से जहाँ उन सेनानियों को बल मिलेगा , वहीँ देश के तमाम भाइयों को मिलेगी  प्रेरणा इस महायज्ञ में आहुति देने की ! और डरेगी ये सरकार  जो भ्रष्ट नेताओं का बचाव करने में लगी है .

Saturday, July 28, 2012

नारायण ! नारायण ! - एक लघु कथा

नेताजी अपने दफ्तर में बैठे हुए अपना काम कर रहे थे . तभी चपरासी ने कहा - सर , एक युवक आया है किसी गाँव से  , कहता है आपसे मिलना है . नेताजी ने कहा - जाकर पूछो कि  काम क्या है . चपरासी बोला - पूछा  था सर, कहता है कि वो आपका बेटा है .
नेताजी ने नजर उठाये बिना कहा - उसका नाम , पता , जन्म तिथि , उसकी मां  का नाम , उसके गाँव का नाम रजिस्टर में लिखवा लो .
चपरासी बोला - सर लिखवा लेता हूँ, फिर क्या कहना है ?
नेताजी - कहना की हफ्ते भर बाद खबर लो , तब तक हम अपने दौरों का रेकोर्ड चेक कर लेते हैं . हाँ कहना मिडिया विडिया के चक्कर में न पड़े , कुछ पता  चला तो आपस में सलटा  लेंगे. 

Thursday, July 26, 2012

खौफ 26 जुलाई का


 
नमूना 26 जुलाई की बरसात का 
मुंबई की बरसात मुंबई की जीवन रेखा है . इस वर्ष कम हुई तो लगता है की पूरे मुंबई शहर की जल की आपूर्ति नहीं हो पाएगी . लेकिन 2005 की बरसात , और वो भी 26 जुलाई की बरसात- आज भी हर मुम्बईकर  के रौंगटे खड़े कर देती है . बरसात क्या थी मानों प्रलय का एक ट्रेलर था . हर मुम्बईकर  के पास अपनी एक दास्तान  मिलेगी ; मैं आज अपने परिवार की कहानी यहाँ मेरे पाठकों के साथ शेयर करता हूँ .
आधी डूबी  हुई बस उस दिन की दास्ताँ बयान  करती है 

मेरा घर है जुहू में और उन दिनों मेरा दफ्तर होता था मस्जिद बन्दर इलाके में . गाडी से आने जाने में भी सामान्य दिनों में औसतन डेढ़ घंटे का सफ़र हुआ करता . उस दिन मै  और मेरा बेटा पराग एक साथ दोपहर का खाना खा रहे थे - रोज कीतरह करीब दो बजे . बाहर सुबह से ही बरसात बदस्तूर जारी थी . ये हर वर्ष होता है इसलिए कोई ख़ास बात नहीं थी . करीब सवा दौ बजे मेरी पत्नी रेणु  का फोन  आया की जुहू की तरफ बहुत जोरदार बरसात हो रही है , साथ में उसने हलके से कह दिया की कोई विशेष काम न हो तो निकल जाओ . मैंने कहा अगर ऐसे निकालेंगे तो फिर पूरे महीने रोज ही निकलना पड़ेगा .

ये लोग खड़े हैं रेल की पटरियों के दोनों तरफ प्लेटफोर्म पर 
 करीब  15 मिनट बाद फिर उसका फोन आया ; इस बार उसकी आवाज में थोड़ी घबराहट थी ; उसने मजबूती से कहा की दफ्तर जल्दी बंद कर दो और सभी कर्मचारियों को भी जाने दो , और तुम भी निकल पड़ो . मैंने कहा की देखते हैं . फिर मैंने दो चार जगह फोन कर के पुछा तो लगा की बरसात कुछ अधिक ही है . मैंने निर्णय लिया की तीन बजे तक दफ्तर बंद कर के सबकी छुट्टी कर दी जाए . तीन बजे मैं और पराग अपनी गाडी में बैठे ही थे , कि  श्रीमतीजी का  फिर फोन आ गया . इसबार वो पूरी तरह परेशान थी ; बोली की घर के सामने की सड़क पर पानी का स्तर  कमर तक आ गया है . अब अगर मैं निकल गया हूँ तो फिर आगे के रास्ते की परिस्थिति देख कर बढ़ना . ये बात चौंका देने वाली थी क्योंकि जुहू के इलाके में मैंने कभी इस तरह पानी भरते हुए नहीं देखा था .

बाद में ये गाडी पूरी डूब गयी थी 
मैंने अपने ड्राइवर से कहा की ऐसा रूट पकड़ो जहाँ पानी न भरता हो .हमारा रोज का रास्ता था किंग  सर्किल होकर धारावी से हाइवे पर निकलने का ; लेकिन हमें अंदाज था की किंग सर्किल काफी नीचा क्षेत्र है ( मैं 3 साल पहले वहां सारी  रात किसी मित्र के यहाँ बिता चूका थी - इसी वजह से ) ; इसलिए हमने भायकला  से तुलसी पाइप रोड का रास्ता पकड़ा . बरसात इतनी तेज थी की हमें आगे वाली गाडी की सिर्फ लाल बत्ती ही नजर आ रही थी . धीरे 2 करीब घंटे में हम दादर स्टेसन के पुल पर  पहुंचे ; वहां से आगे का नजारा देखा तो होश उड़ गए . वहां से दूर दूर तक गाड़ियों की लाइन लगी थी जो एक इंच भी आगे नहीं बढ़ पा रही थी .

आधी घंटे इन्तजार करने के बाद अपने सेल फोन से सबसे संपर्क करना शुरू किया . पत्नी से लगातार बात हो ही रही थी . उसने सलाह दी की मुझे वहीँ कहीं किसी होटल में या किसी जानकार के यहाँ शरण लेनी चाहिए . मैंने अपने एक रिश्तेदार को फोन किया , क्योंकि मुझे याद आया की उनकी ससुराल इसी इलाके में कहीं है . उन्होंने मुझे वहां तक पैदल चल कर जाने का रास्ता बताया . मैं और पराग गाडी से निकल कर चल पड़े ; ड्राइवर से कहा की गाडी को कहीं ढंग से खड़ा कर के उसी जगह आ जाए .
रेलवे स्टेसनों पर शरण ली रेल यात्रियों ने 

जब हम सडक पर निकले तब हमें अंदाज हुआ बरसात के तीखेपन का . पानी कमर तक पहुँच चुका  था . आगे जाकर देखा तो पाया की सभी गाड़ियों के ड्राइवर अपनी अपनी गाड़ियों को वहीँ लोक कर के चले गए हैं . यानि की उस रस्ते पर कोई भी गाडी अपनी जगह से हिलने की स्थितिमे नहीं थी . हम पहुंचे हमारे गंतव्य पर जहाँ घर की स्त्रियों ने हमारा स्वागत किया . पता चला की घर के पुरुष किसी और जगह पर हमारी ही तरह फंसे हुए हैं . बस इसी एक कारण  ने उस दिन पूरे शहर को एक परिवार के रूप में बदल दिया . हर व्यक्ति आये हुए शरणागत में अपने घर के व्यक्ति - अपने पति . पुत्र देवर आदि को ढूंढ रहा था .

बस अड्डे भी शरण के रूप में ही काम आये 
उस दिन सब कुछ संभव था 
हमारे मेजबान ने हमें बदलने को कपडे दिए ; गरम गरम चाय के साथ पूरियां खिलाई . बरसात के रुकने का इन्तजार करते हुए रात के 11 बज गए , लेकिन बरसात रुकने क नाम नहीं ले रही थी . पत्नी ने वहां से न निकलने की हिदायत दी . लेकिन किसी और के घर पर हम सारी  रात कैसे रुक सकते थे ; वो भी तब जब की उस घर के पुरुष घर में मौजूद नहीं थे . जब हमने वहां से निकलने की बात की तो घर की महिलाओं ने हमें जाने की आज्ञा  नहीं दी . उन्होंने साफ़ साफ़ कह दिया की अब रात में कहीं जाने की जरूरत नहीं ; सुबह अगर मौसम ठीक हुआ तब निकलें . इस प्रकार उन्होंने हमारी उलझन को दूर किया . रात का भोजन वहीँ किया . हमारा ड्राइवर भी आ चूका था , उसने भी वहीँ शरण ली . हम रात को उनके घर पर ही सो गए .

अगली सुबह का नजारा भी बदला नहीं था . एक अंतर ये हुआ की रात में किसी वक़्त घर का छोटा बेटा घर पहुँच चूका था . उन्होंने दोपहर 12 बजे तक हमें निकलने नहीं दिया . उसके बाद हम बिलकुल हाथ जोड़ कर धन्यवाद कर के  निकल गए .गाड़ियाँ थोड़ी थोड़ी निकल चुकी थी . धक्का देकर गाडी को उस रास्ते से बाहर  किसी खाली  सडक तक लाये . भगवन की दया से गाडी स्टार्ट हो गयी . पैदल की स्पीड से गाडी को बंदर तक लाये . वहां पता चला की वहां से आगे गाड़ियाँ बिलकुल बंद है . एक जगह गाडी को खड़ा किया और पैदल चल पड़े जुहू तक जाने के लिए . हमें कम से कम डेढ़ दौ घंटे लगे इस पदयात्रा में . सड़कों पर कमर तक पानी था . लोग उंचाई की जगह पर कतारों में चल रहे थे . उसके दो कारण  थे - एक तो सड़कों के बीच का डीवाइडर   ऊंचा था , दुसरे उस पर चलने  से किसी गड्ढे में पैर फंसने का डर  नहीं था .

पटरियों पर रेंगता जीवन 
जैसे जैसे हम जुहू के पास पहुँचते गए पानी का स्तर  और ऊपर मिलता गया . घर तक हम पहुंचे करीब करीब छाती तक की ऊँचाई के पानी में . घर पहुँच कर पता चला की मेरी बेटी अपने मित्रों के साथ कहीं गयी हुई थी , और वो घर लौटी थी गर्दन तक के पानी में . हमारा मकान चार मंजिला है , हम रहते हैं पहली मंजिल पर ; निचला फ्लोर , हालाँकि  सड़क के स्तर से कम से कम 3 फुट ऊँचाई पर है , फिर भी मेरे मित्र शंकर के घर का सारा फर्नीचर पानी में डूबा पड़ा था .

मुंबई के विभिन्न इलाकों से पता चल रहा था , की लोग सड़कों पर डूब कर मर गए ; कालीना  में मकानों की पहली मंजिल तक पानी चढ़ गया ; एक अकेली बुढिया  जिसने घर की डाइनिंग टेबल पर शरण ली थी , वो पानी के धीरे धीरे बढ़ते रहने से घर में  डूब गयी  ; जुहू में दो बच्चे अपनी गाडी लोक कर के बैठे थे , गाडी का ऐ सी ख़राब हो गया ; और शीशे नीचे करने वाला इलेक्ट्रोनिक सिस्टम काम करना बंद कर दिया , दोनों बच्चे घुटन से गाडी में मर गए - न जाने कितनी घटनाएँ घटी उस दिन !

मेरे घर पर कुछ काम चल रहा था ; 3-4 मिस्त्री रात भर मेरे यहाँ ही रुके थे , पत्नी ने उन्हें भोजन करवाया था . और सबसे विचित्र बात ! इतनी बरसात में जब की सब कुछ बंद हो चूका था - बिजली , टी वी , फोन आदि - हम सबसे अधिक परेशान थे पानी के अभाव  से ! हैं न विचित्र बात ! मकान  के टैंक में पानी समाप्त हो चूका था . पानी चढाने वाली मोटर पानी में पड़ी पड़ी ख़राब हो चुकी थी . आस पास की दुकाने  बंद दी जहाँ पानी की बोतलें खरीद पाते . जब उस दिन कुछ भी कर पाना संभव नहीं था तो मैंने बैठ कर लिखना शुरू किया - एक छोटी सी कविता लिखी . जो इस प्रकार है -

ये कैसी बरसात 
ये कैसी बरसात 
जीवन देने वाली 
गिरी है बन के गाज 

निकले थे लोग 
घर से सुबह 
दिन भर के जीवन के लिए 
लौटे नहीं 
रातों को भी  
आशंकाएं मन में लिए 

काली  थी कैसी रात  
ये कैसी बरसात 
ये कैसी बरसात 




Saturday, July 7, 2012

सस्ती रोटी

भूख के समय पेट रोटी की गुहार करता है . और फिर ऐसी जगह जहाँ आप किसी अपने को हस्पताल में रख कर उसका इलाज करवा रहें हो , तो घर की रोटियां वहां कहाँ ? ऐसे में जो भी हस्पताल के बहार खाने को मिल जाता है उसे इंसान खाने को मजबूर होता है .


लेकिन रांची के राजेंद्र मेडिकल कॉलेज और हस्पताल में आने वाले लोगों के लिए बहुत बढ़िया साधन है - सस्ती रोटी का स्टाल ! सिर्फ दस रुपैये में 7 गरमागरम चपातियाँ , साथ में पेट भर आलू की मजेदार  सब्जी और फिर स्वच्छ बोतलबंद मिनरल वाटर की बोतल मात्र 6 रुपैये में . मरीज की खिचड़ी फोयल पेपर में पैक - सिर्फ 6 रुपैये में . 






मैं को हवाई बातें नहीं कर रहा . मेरी पिछली रांची यात्रा में मैं स्वयं देख कर आया इस समाज सेवा के प्रकल्प को . हस्पताल ने एक छोटा सा शेड दे दिया - जहाँ 4-5 महिलाएं बैठ कर रोटियां सकती रहती हैं . सब्जी बहुत बड़ी मात्र में दोनों समय बना कर रख दी जाती है . रोटी के काउंटर पर एक व्यक्ति हर समय तत्परता से रोटियां परोसने को खड़ा रहता है . 




ये सेवा उपलब्ध करवाने का श्रेय है श्री शत्रुघ्न लाल और श्रीमती सुशीला देवी गुप्ता को . उन्होंने न केवल ये प्रकल्प अपने प्रयासों से शुरू किया , बल्कि घाटा होता है , उसे वो अपना सौभाग्य समझ कर अनुदान के रूप में देते हैं . सिर्फ पैसा देने से कोई योजना नहीं चलती . समय देने वाले भी चाहिए . दोनों पति पत्नी नियम पूर्वक वहां का एक चक्कर लगाते हैं , खुद सारी  व्यवस्था को देखते  हैं . रोज दोनों समय सैंकड़ों भूखे व्यक्ति वहां तृप्त होकर जाते हैं . 





ये देश सर्कार के भरोसे नहीं चल रहा . ये चल रहा है - ऐसे सेवा भावी गुप्ता दम्पति जैसे लोगों के भरोसे।.  

Tuesday, July 3, 2012

कृष्ण लीला - एक लघु कथा

किशन अपने ड्राइंग रूम में टेलीविजन के  चैनल पर भजन सुन रहे थे . वाचमैन ने आकर कहा की कोई आपसे मिलने आये हैं . किशन ने झल्ला कर पुछा - ' नाम तो पूछते कि  कौन है !' बेमन से उठ कर किशन दरवाजे पर आये .सामने एक गरीब आदमी मैली कुचैली जींस पहने खड़ा था ; कई दिनों की बढ़ी हुई दाढ़ी  थी .

किशन ने कहा - ' यस ? क्या काम है ?'

आगंतुक दो पल एकटक किशन को देखता रहा और फिर बोला - ' किशन भैया , नहीं पहचाना ? मैं हूँ सुदामा ! सुदामा शर्मा , तुम्हारा होस्टल का मित्र ! '

किशन ने तुरंत पहचान लिया , एक बार चमक सी उठी उसकी आँख में ; लेकिन दूसरे  ही पल चेहरा बदल    गया . किशन ने कहा - ' आई डोंट रिमेम्बर एनी सुदामा ! सॉरी !' - ये कह कर गेट बंद कर लिया .

अन्दर से रुक्मिणी आई . बोली - ' कौन था जी ?'

किशन ने कहा - ' पता नहीं ; नौकरों का दोस्त होगा कोई ! मैंने कह दिया की ये समय नौकरों से मिलने का नहीं है . '

और इस तरह आज के समय की कृष्ण लीला समाप्त हुई !