नील स्वर्ग

नील स्वर्ग
प्रकृति हर रंग में खूबसूरत होती है , हरी, पीली , लाल या फिर नीली

Friday, January 3, 2014

मुख्य मंत्री अरविन्द केजरीवाल



वैसे मैं आम आदमी पार्टी और अरविन्द केजरीवाल का प्रशंसक हूँ। अरविन्द ने एक बहुत अलग रास्ता दिखाया है देश की जनता को। जब देश की  राजनैतिक पार्टियां अरविन्द को ताने मार रही थी- देश के लिए निर्णय सड़कों  पर बैठ कर नहीं होते , उसके लिए चुनाव जीत कर संसद में आना होता है, अरविन्द ने उस चुनौती को स्वीकार किया और आम आदमी पार्टी को जन्म दिया।  अन्ना बिना किसी वजह के अरविन्द से अलग हो गए।  निर्णय अन्ना  का गलत था , अरविन्द का नहीं।

चुनाव की  भारी  सफलता के लिए भी अरविन्द बधाई के पात्र हैं।  दिल्ली के लोगों ने उनमे विश्वास जताया।  अरविन्द ने बहुत खुले शब्दों में ऐलान किया कि वो किसी भी पार्टी को न तो समर्थन देंगे और न ही लेंगे। इससे उनकी छवि और भी सुधरी। ऐसी घोषणा करते वक़्त शायद अरविन्द ने सोचा होगा की उनकी १५-१६ सीटें आएँगी और शायद किसी भी एक पार्टी को उनके सहयोग की  जरूरत पड़ेगी। लेकिन परिस्थितियां  कुछ अलग रंग लेकर आयी।

जब बी जे पी ने सर्कार बनाने से इंकार कर दिया , इसके बाद अरविन्द कि परीक्षा कि घडी आयी।  यहाँ से मैं अरविन्द के निर्णयों से सहमत नहीं हूँ। उन्होंने जनता से पूछने का एक नाटक किया - क्या उन्हें सर्कार बनानी चाहिए।  अरविन्द भाई , जनता अपना निर्णय चुनाव के माध्यम से दे चुकी होती है।  जिन्होंने आपको वोट दिया वो सर्कार बनाने के लिए ही दिया था, लेकिन तब जब आप के पास पर्याप्त बहुमत होता ।  एक बार जब जनता आप को चुन लेती है तो फिर निर्णय लेने का अधिकार जनता आप के हाथ में सौंप देती है। आपको हर निर्णय के लिए फिर जनता के पास जाने की  जरूरत नहीं होती।

आप अपने दिल से ही पूछ लेते कि जिस  कांग्रेस के विरुद्ध आप  जहर उगल उगल कर जनता के चहेते बने थे , क्या उसी की  बैसाखियों पर आप खड़ा होना चाहते हैं। क्या जनता के एस एम् एस निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।  एस एम् एस का कोई नाम नहीं होता।  कोई भी कहीं से कितने भी एस एम् एस भेज सकता है।  सर्कार बनाना कोई टेलीविजन का रियलिटी शो नहीं है जिसका फैसला जनता के एस एम् एस के आधार पर हो सके।  फिर आप को तो दिल्ली के लोगों से पूछना था , एस एम् एस तो पूरे देश से आते हैं।

कल आपने विधान सभा में एक बार फिर विश्वास प्राप्त करने का नाटक खेला।  क्या आपके पास कोई उत्तर था हर्षवर्धन के तीखे सवालों का ? आपका लिखा लिखाया भाषण अच्छा तो था लेकिन सच्चा नहीं था।  आप बात बात में ये कहते हैं कि आप को किसी का सहयोग नहीं चाहिए , दिल्ली की  जनता को चाहिए। ऐसा था तो फैसला दिल्ली की  जनता पर ही छोड़ते कि दोबारा चुनाव करवा के वो किस तरफ मुड़ेगी - इसका फैसला करती ।

अरविन्द आप मुख्य मंत्री तो जरूर बन गए लेकिन कहीं न कहीं आप लोगों के दिलों की  गद्दी से  नीचे उतर गए।  काउन्ट डाउन शुरू हो चूका है आपकी इस सर्कार के गिरने के लिए।  बचने की  एक ही सूरत है - या तो आप कांग्रेस  बन जाओ या  फिर कांग्रेस को अपने जैसा बना लो।  दूसरी बात तो होने से रही , पहली बात का डरहै , क्योंकि उस दिशा में पहला कदम आप ले चुकें हैं।

मेरी शुभकामनाएं अरविन्द !


Wednesday, January 1, 2014

वो एक अलग नए वर्ष की पूर्व संध्या

नए साल की पूर्व संध्या एक त्यौहार की  तरह मनायी जाती है। पुराने वर्ष को विदाई तथा नए आने वाले वर्ष का स्वागत लोग करते हैं - पार्टी से , नाच गा कर,  परिवार के साथ पर्यटन कर के और संगीत के साथ। मुझे याद आती है वो नव वर्ष की  पूर्व संध्या जब हमने - मैं , बहन सविता , जीजाजी अशोक जी , बेला , रेणु  और मेरे एक मित्र दंपत्ति पोद्दार - ने नव वर्ष का स्वागत किया ईश्वर की भक्ति के साथ।

उस वर्ष मेरे प्रिय अनुज  अनिल ( फुफेरा भाई ) के शरीर में कैंसर का रोग प्रवेश कर चुका  था। अनिल एक बहुत उत्साही युवक था जो जीना चाहता था। जनवरी से दिसंबर तक पूरे वर्ष उसने इस बीमारी से लड़ाई लड़ी। उस रात हम  सब ने मिलकर यज्ञ किया तथा ईश्वर से प्रार्थना की कि अनिल को इस भयंकर रोग से लड़ने कि शक्ति दे और इस रोग से मुक्त कराये। जब  रात के बारह बजे तो हमने उस उदास वर्ष को विदाई दी। एक  नए वर्ष में प्रवेश किया कुछ नयी आशाओं के साथ।

अगले वर्ष अनिल ने जीवन के बस नौ महीने पूरे किये और उसके बाद निकल गया अपनी अगली यात्रा पर। 

Wednesday, August 21, 2013

घटना और प्रतिक्रिया



 पिछले सोमवार , अगस्त १९, २०१३ की घटना ! बिहार के खघरिया जिले में स्थित एक रेलवे स्टेसन धमारा  घाट ! सुबह के करीब पौने आठ बजे का समय। एक तीर्थयात्रियों का समूह रेल की पटरियों के बीचोंबीच चला जा रहा था।  उनके एक तरफ थी प्लेटफार्म पर खड़ी   हुई गाडी - समस्तीपुर से मधेपुरा जाने वाली गाडी ; उनके दूसी तरफ खड़ी   थी मधेपुरा से लौटने वाली गाडी। यानि की ये भीड़ चल रही थी इन दोनों रेल गाड़ियों के बीच स्थित एक पटरी के बीचोंबीच। और तभी उस बीच वाली पटरी पर आ गयी ८० किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से चल रही राज्यरानी एक्सप्रेस। ट्रेन एक जोरदार हॉर्न की आवाज के साथ आई , लेकिन लोगों के पास आस पास छिटकने तक की जगह नहीं थी।  परिणाम स्वरूप ३७ तीर्थयात्री उस रेल के नीचे चटनी की तरह पिस गए। भीड़ का गुस्सा फूट  पड़ा। गुस्साई भीड़ ने राज्यरानी एक्सप्रेस के अलावा एक और पसेंजर गाडी को आग लगा दी। रेल के २० डिब्बे तहस नहस हो गए। रेल के जो अधिकारी सामने आये उन्हें मार पीट के अपनी गिरफ्त में ले लिया।   राज्यरानी एक्सप्रेस के दो ड्राइवर -राजाराम पासवान और सुशिल कुमार सुमन पर भीड़ टूट पड़ी। 

अब इस घटना की समीक्षा करें।  क्या गलती राज्यरानी एक्सप्रेस के दो ड्राइवरों की थी ? बिलकुल नहीं , ट्रेन के ड्राइवर स्टेसन से सिग्नल मिलने पर ही आगे बढ़ते हैं।  क्या गलती सिग्नल देने वाले व्यक्ति की है ? नहीं , क्योंकि उसका काम  वाली अन्य गाड़ियों की स्थिति देख कर सिग्नल देने की होती है।  अगर गलती किसी की है तो है वो मारे गारे तीर्थ यात्रियों के झुण्ड की।  ट्रेन की पटरियों के बीचोंबीच चलना वो भी जब दोनों तरफ दूसरी दो गाड़ियों की दीवारें बनी हो - एक बहुत ही मूर्खतापूर्ण बात है।  इस तरह के झुण्ड की एक और समस्या होती है।  जब दो चार लोग ऐसे रास्ते पर चल पड़ते हैं तो बाकी भीड़ भी उनके पीछे पीछे चल पड़ती है।  इस तरह झुण्ड में चलना उन्हें सुरक्षित होने का गलत आभास देता है।

खैर दुर्घटना तो हुई , लेकिन उसके बाद का भीड़ का गुस्सा ? क्या वो जायज है ? बिलकुल नहीं ! लेकिन गुस्सा जायज या नाजायज नहीं होता।  गुस्सा बस गुस्सा होता है।  जब कोई ऐसी घटना आँखों के सामने घटती है , लोगों के मन का आक्रोश  फट पड़ता है।

आइये अब इस घटना को प्रष्ठभूमि में रख कर चर्चा करें २००२ में घटे गोधरा के रेल काण्ड और उसकी प्रतिक्रिया के  विषय में।  सर्कार द्वारा नियुक्त नानावती कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार २७  फरवरी २००२ को अयोध्या से आने वाली रेल गाडी, जिसमे बहुत बड़ी संख्या में हिन्दू तीर्थयात्री सवार  थे - वो साबरमती एक्सप्रेस जब गुजरात के गोधरा जिले से गुजर रही थी ,तो उस पर एक बहुत बड़ी भीड़ ने पत्थरो से आक्रमण कर दिया।  उनमे से कुछ लोगों ने रेल के डिब्बों के दरवाजे खोल खोल के  उनमे जलती हुई मशालों के साथ पेट्रोल के खुले कनस्तर फेंक दिए।  परिणाम पूरी की पूरी  रेल एक जलती हुई गुफा के रूप में बदल गयी। इस पाशविक अपराध के परिणाम स्वरूप ५९ हिन्दू यात्री पत्थरों और आग के बीच बुरी तरह से मार डाले गए।


नानावती  कमीशन की रिपोर्ट खुलासा करती  है की ये साजिश गोधरा के एक मौलवी हुसैन उमरजी की थी। उसकी साजिश के अनुसार १४० लीटर पेट्रोल ख़रीदा गया।  अब्दुल रजाक मोहम्मद कुरकुर और सलीम पानवाला ने ये पेट्रोल २६ फरवरी की रात को ख़रीदा। इस साजिश पर पूरा कार्यक्रम बना अमन गेस्ट हॉउस में। रेल के डिब्बे S - ६ और S -७ को जबरन खोल कर हसन लालू नाम के व्यक्ति ने जलती हुई मशालें डिब्बों में फेंकी। बाकी सारे काम में शामिल थे - शौकत अली , इमरान शेरी , रफीक बटुक , सलीम जर्दा , जाबिर बहरा और शेरज बाला।  




इसके बाद जो कुछ गुजरात में हुआ वो एक साम्प्रदायिक प्रतिक्रिया थी। इस तरह के घिनौने, बिना किसी कारण के किये गए पैशाचिक  अपराध की प्रतिक्रिया बिलकुल स्वाभाविक थी।इस प्रतिक्रिया तथा फिर उसकी प्रतिक्रिया में ७९० मुसलमान तथा २५४ हिन्दू मारे गए। बेहिसाब संपत्ति का नुक्सान हुआ।


क्या अंतर है दोनों घटनाओं में ? दोनों ही घटनाएँ उदहारण हैं मानविक प्रतिक्रिया का !

नरेन्द्र मोदी पर राजनैतिक कारणों से निरंतर वार किये जाते रहें हैं।  नरेन्द्र मोदी के प्रशासन का असली मापदंड है २००२ के बाद चल रहे ११ वर्षों का राज्य , जिसने इतने बड़े नासूर को दोनों समाजों के दिल से मिटा कर एक सौहार्द का वातावरण तैयार किया।  इन ११ वर्षों में एक भी साम्प्रदायिक दुर्भाव की घटना नहीं हुई।

 



Friday, July 26, 2013

पांच रुपैये में खाना

अगर दिमागी दिवालियेपन  की कोई गरीबी रेखा होती तो कांगेस के बहुत सारे नेता उसके नीचे होते। कल दो बिलकुल ताजा उदहारण सामने आये. घूम फिर कर कांगेस पार्टी में पहुंचे हुए राज बब्बर का कहना है की मुंबई जैसे शहर में कोई भी व्यक्ति बारह रुपैये में भर पेट खाना खा सकता है . इतना ही नहीं उन्होंने बारह रुपैये में मिलने वाले भोजन का पूरा मेनू तक बता दिया - ढेर सारा भात , ढेर सारी दाल और साथ में सब्जी के भी टुकड़े . उनके दूसरे पुराने नेता श्री रशीद मसूद एक कदम और आगे हैं . उनके अनुसार दिल्ली में जामा मस्जिद के बाहर पांच रुपैये में भर पेट खाना मिलता है .

पहले मुंबई की बात करें . मैं एक सामजिक संस्था के साथ जुड़ा हूँ - जिसकी एक प्रमुख गतिविधि है अन्न क्षत्र ! मुंबई के दो मशहूर हस्पताल हैं - जे जे हॉस्पिटल और सेंट जोर्ज हॉस्पिटल . दोनों हस्पतालों के अहाते में धर्मशाला बनी हुई है . इन दोनों में व्यवस्था है कमरों की - दुसरे  शहरों से आने वाले बीमारों के साथ आने वाले परिवार जनों के लिए . पहले इनका नियम ये था की रहने वाले आगंतुकों को अपने भोजन की व्यवस्था खुद करनी पड़ती थी . हर कमरे में एक स्टोव और कुछ बर्तन  थे . हमारी संस्था ने दोनों जगहों पर रसोई और भोजन कक्ष बनाये . रहने वाले लोगों के लिए सुबह का नाश्ता , दोपहर का भोजन और रात का खाना बनाने के लिए ठेकेदार नियुक्त किये . साधारण लेकिन शुद्ध और  ताजा भोजन पूरे दिन की कीमत आती है - ७० रुपैये . आधी कीमत पर हमारी ये संस्था रहने वाले मेहमानों को भोजन करवाती है . बाकी आधी कीमत संस्था अपने संसाधनों से भरती है . ये कीमत तब है जब की जगह का कोई भाडा नहीं ; पानी और बिजली मुफ्त में है , ठेकेदार मामूली मुनाफे पर काम करता है . पूरे हफ्ते का मेनू बोर्ड पर लिखा हुआ है . हम सभी अधिकारीयों में से कोई न कोई हर हफ्ते वहां बिना सूचना के पहुँच जाता है , और सामान्य भोजन करते हैं - जिससे भोजन की गुणवत्ता कभी नहीं गिरती

मेरा अनुरोध है श्री राज बब्बर साहब से की हमें वो १२ रुपैये में भोजन खिलने वाले रसोइये से मिलवा देवें . हमारी संस्था का न केवल पैसा बचेगा बल्कि मेहमानों के लिए कीमत और भी बहुत कम हो जायेगी .

जहाँ तक श्री रशीद मसूद साहब के दावे का सवाल है - मैं कभी जामा मस्जिद नहीं गया ; लेकिन मुंबई में महिम से आते जाते माहिम मस्जिद के बाहर बने ३-४ ढाबों को जरूर देखता हूँ , जिनके दरवाजे पर हर समय २०-३० भिखारी बैठे होते हैं . मस्जिद में आने वाले मुस्लिम धर्मात्मा ढ़ाबे वाले को अपनी क्षमता के अनुसार निर्देश और पैसे दे देते हैं . ढाबे वाले एक छड़ी से गिन गिन कर भिखारियों को अन्दर बुलाते हैं . अगर इसी तरह की किसी व्यवस्था का जिक्र मसूद साहब कर रहें हो तो ये संभव है ।

बात पूरी करने के पहले फिर एक बार जिक्र करूंगा , रांची शहर के रिम्स नामके सरकारी हस्पताल के बाहर  सस्ती रोटी का , जिसके बारे में   मैंने पहले   भी एक लेख यहाँ लिखा था . ये सस्ती रोटी साफ़ सुथरे अलुमिनिम के डब्बे में गरम गरम दी जाती - ७ रोटियां और भरपूर मात्रा में आलू की स्वादिष्ट सब्जी . सिर्फ दस रुपैये में . हस्पताल ने रसोई की जगह दे राखी है जहाँ एक रसोइया गरम गरम भोजन बनाता रहता है और ४-५ महिलाएं रोटी बेलती रहती हैं . दस रुपैये में तो शायद वो अलुमिनियम फोयल का डिब्बा ही आता होगा ; कीमत भरते हैं रांची के समाज सेवी श्री शत्रुघ्नलाल गुप्ता और उनकी पत्नी श्रीमती सुशीला देवी गुप्ता . सिर्फ पैसा ही नहीं बल्कि अपना समय देते हैं - पूरी व्यवस्था को सुचारू रूप से चलने में .
[ http://mahendra-arya.blogspot.in/2012/07/blog-post_07.html ]

समाज में भोजन जैसी जरूरी व्यवस्था को लेकर ये दो रूप हैं सामने - एक है राज बब्बर और रशीद मसूद जैसों की संवेदनहीन घटिया बयान बाजी का , दूसरा है गुप्ता दम्पति जैसे निःस्वार्थ भाव से  भूखों को भोजन कराने  वालों का . एक सिर्फ वोटों की राजनीति कर रहा है और दूसरा  परदे के पीछे रहते हुए लोगों का अज्ञात आशीर्वाद पा रहा है .

Saturday, July 13, 2013

बैंड पार्टी : एक लघु कथा

एक बारात जा रही थी . घोड़ी पर  दुल्हे मियां सेहरा पहन कर शान से बढ़ रहे थे . घोड़ी के सामने बैंड पार्टी जोश में बैंड बजाते हुए चल रही थी . बैंड के आगे दुल्हे के दोस्त नाचने में व्यस्त थे . अच्छे अच्छे सूट  पहन कर पसीने में लथपथ सारे नवयुवक ऐसे नाच रहे थे जैसे जीवन में नाचने का ये अंतिम मौका हो . दुल्हे के ख़ास रिश्तेदार जैसे की जीजा , भाई , मामा नोटों की गड्डी हवा में लहरा रहे थे , और बीच बीच में नोटों को निकल कर हवा में उछाल रहे थे . बैंड पार्टी के नियुक्त एकदो व्यक्ति नोटों को उठा रहे थे .
युवक थे की आगे बढ़ने का नाम ही नहीं ले रहे थे . परिवार के बुजुर्ग उन्हें समझा बुझा कर आगे बढ़ने को कहते थे , कुछ नरम दिल युवक मान जाते , लेकिन एक दो ऐसे थे की सब को रोकते रहते और बोलते - अंकल , ऐसा मौका कब कब मिलता है , थोड़ी देर और प्लीज़ ! ख़ास कर काले कपड़ों में हीरो सा दिखने वाला एक लड़का , जो बहुत अच्छा नाच रहा था , वो आगे बढ़ने ही नहीं दे रहा था . वो बीच बीच में अपनी जेब से नोट निकल कर दुल्हे के सर पर वार  कर बैंड  वालों को भी दे रहा था .

आखिर परेशान होकर दुल्हे के पिता ने दुल्हे से धीरे से कहा - बेटा , मुहूर्त निकल जा रहा है , तुम्हारे ये दोस्त आगे बढ़ने का नाम ही नहीं ले रहे हैं - ख़ास कर वो काले कपड़ों वाला . दुल्हे ने कहा - उसे तो मैं जानता ही नहीं . दुल्हे की पिता ने दुल्हे के एक दो और दोस्तों से पूछा ; उन्होंने भी कहा की उन्हें पता नहीं की वो कौन है ,बल्कि वो लोग सोच रहे थे की उनके दोस्त का कोई रिश्तेदार है .

दुल्हे के पिता ने धीरे से हाथ पकड़ के उस लड़के को बारात से बाहर किया और पुछा - भैया , तुम हो कौन और किस नाते से यहाँ हो ? वो लड़का घबरा गया - अंकल ......अंकल .......मैं तो दुल्हे का दोस्त हूँ . पिता ने कहा - ऐसी एकतरफा दोस्ती तो हमने देखी  नहीं; साफ़ बताओ की कौन हो वर्ना पुलिस में दे दूंगा .

लड़का घबरा गया ; बोला - अंकल पुलिस को मत बुलाइये .मैं कोई चोर उचक्का नहीं हूँ . मैं तो इस बैंड पार्टी का हिस्सा हूँ . मुझे ये लोग तैयार कर के साथ में लाते हैं . हमारी आपस की अंडर  स्टेंडिंग  ये है की जिस बरात में पैसे अच्छे  लुटा रहें हो वहां बारात को बिलकुल धीरे धीरे आगे बढ़ाये और जहाँ माल न मिले वहां औरों को भी जल्दी जल्दी आगे बढ़ाये . आप के यहाँ तो नोटों की बरसात हो रही है . बीच बीच में मुझे भी अपनी जेब से निकाल  कर नोट लुटाने होते हैं , ताकि बाकि सभी को भी जोश आ जाए . बाद में हम सभी अपना अपना हिस्सा पाती बाँट लेते हैं .

दुल्हे के पिता ने हंस कर उसे छोड़ दिया !

Saturday, July 6, 2013

हाइवे का ड्राइवर : सच्ची कहानी

एक था ट्रक ड्राइवर - चंद्रू ! एक ट्रांसपोर्ट कंपनी के लिए ट्रक चलाता  था। ट्रांसपोर्ट कंपनी का मालिक ट्रक पर अपने ग्राहकों के कारखानों से माल लदवा  देता था और रस्ते के खर्च के पैसे देकर चंद्रू को भेज देता था लम्बे लम्बे हाइवे  के लम्बे लम्बे सफ़र पर . ट्रक ड्राइवर की जिंदगी में ट्रक ही उसका घर होता है , जहाँ वो रहता हैं उन तमाम दिनों में जब वो अपने परिवार से दूर रहता है . ट्रक में परिवार की तस्वीर देख देख कर उनके पास होने को महसूस करता है .

ऐसी ही एक यात्रा में चंद्रू अपने ट्रक में किसी दवा  कंपनी का कीमती माल भर के ले जा रहा था . दावा के हलके हलके छोटे छोटे कार्टून भी लाखों रुपैये के होते हैं . माल के ऊपर बंधा होता है मजबूत रस्सियों के नीचे एक मोटा सा तिरपाल , जो माल को बरसात और चोरों से सुरक्षित रखता है . सूरज ढलने के बाद बढ़ चले अँधेरे का समय था . चंद्रू अपनी मस्ती में अपना ट्रक भगाए जा रहा था . हाइवे का एक सुनसान पहाड़ी हिस्सा था . एक मोटर साईकिल पीछे से आई और उसने आगे बढ़ कर ट्रक का रास्ता रोक लिया . उसपर बैठे दो लोगों में से एक उतर कर चंद्रू के कैबिन में घुस गया . उसने अपने कम्बल से एक खतरनाक चाकू निकाला और चंद्रू को धमकी दी - चुपचाप चलते रहो . सामने मोटर साईकिल जा रही थी जिसके कारन चंद्रू धीमी गति से ट्रक को चला पा रहा था . अचानक चंद्रू को आभास हुआ की ट्रक के ऊपर भी कुछ लोग चढ़ गए हैं , लेकिन वो मुड  के कुछ देखने की कोशिश करता , उसके साथ बैठे गुंडे ने चाकू को उसकी गर्दन पर रख दिया और बोला - ज्यादा होशियारी की तो मारे जाओगे . आधे घंटे के बाद उस गुंडे ने ट्रक रुकवाया . उतरते उतरते उसने फिर चंद्रू को धमकी दी - पुलिस में जाने की गक्ति मत करना वर्ना तुम्हारा और हमारा रोज का रास्ता यही है .सारे चढ़े हुए गुंडे उतर गए . चंद्रू ने देखा की पीछे पीछे एक पिक अप वें आ रही थी . उसे समझ में आ गया की गुंडों ने रस्सी काट कर कुछ माल उतार  लिया है . लेकिन वो इतना डरा हुआ था की अगले आधे घंटे तक वो चुपचाप ट्रक चलाता रहा . फिर किसी ढाबे के पास उसने ट्रक खड़ा किया . ट्रक पर चढ़ कर देखा तो पाया की ट्रक के ऊपर के मोटे रस्से को तथा फिर उसके नीचे के तिरपाल को किसी तेज हथियार से काट दिया था , और उसके बीच खाली  जगह से पूरा गड्ढा बना हुआ था . उसने अंदाज लगाया की कम से कम २० कार्टून गायब थे .

उसने ट्रांसपोर्ट के मालिक को फोन किया और सारा  किस्सा बताया . पहले तो ट्रांसपोर्ट के मालिक ने मोटी  मोटी  दस बीस गालियाँ सुनाई और कहा की वो क्या सो रहा था , की उसको माल निकलने का पता नहीं लगा . आखिर मालिक ने कहा की नजदीक के पुलिस स्टेसन पर जाओ और ऍफ़ आई आर दर्ज करवाओ .

चंद्रू पहुंचा पुलिस स्टेसन ! वहां एक हवलदार बैठा हुआ ऊंघ रहा था . चंद्रू ने उसे जगाया और कहा की रपट लिखनी है . उसने कहा - सवेरे आओ , अभी साब बाहर दौरे पर गए हैं . अन्दर से किसी की आवाज आई - " कौन है बे ". हवलदार ने उत्तर दिया - सर कोई ट्रक वाला है . अन्दर से फिर आवाज आई - ठीक है , बोलो सवेरे आये . सवेरे का मतलब १० बजे !

चंद्रू ने बहुत विनती करने की कोशिश की , लेकिन हवलदार बात करने के मुड  में बिलकुल नहीं था . चंद्रू ने अपने मालिक को फोन किया . मालिक ने फिर १० - २० मोटो मोटी  गालियाँ दी आयर फिर सलाह दी की रात भर गाडी के पास पहरा दो और सुबह पुलिस स्टेसन पर जाओ . चंद्रू बेचारा रात भर जाग कर पहरा देता रहा ; न रात का खाना खाया और न एक पल को सोया . सुबह रात भर का जाग उनींदा चंद्रू पहुंचा पुलिस स्टेसन . हवलदार तरोताजा बैठा था . पहले सारी  कहानी सुनी फिर बोला - हम्म्म ! किस्सा तो अछ्छा है, लेकिन साहब को पसंद नहीं आएगा . कोई सस्ता मन्द माल होता तो शायद सस्ते में काम पट जाता। लेकिन इसमें हाथ नहीं डालेंगे . चंद्रू की समझ में कुछ नहीं आया .

डेढ़ घंटे बैठने के बाद सब इन्स्पेक्टर ने बुलाया और बोला - बताओ ? चंद्रू विस्तार से पूरी बात बताने लगा ; एक वाकया बोल भी नहीं था , की सब इन्स्पेक्टर गुस्से में बोला - पूरी रामायण मत सुनाओ , बस बताओ कितने का माल है ? चंद्रू बोल - साहब २० -२२ कार्टून गए हैं , पंद्रह  बीस लाख का तो जरुरे होगा . साल सब की मिली भगत है .

साला , किसको मालूम तुम्हारा स्टोरी कितना सच्चा है ? तुम्ही किया होगा तो ? खैर ये बताओ की किसने किया ?

सर मुझे क्या मालूम ? मैं किसी को नहीं जानता . हाँ , जो मेरे साथ ट्रक में बैठा था उसे पहचान सकता हूँ .

अबे , चोरी किसने की ? वो जो ट्रक के ऊपर चढ़े थे . पहचानना तो उनको पड़ेगा न ? खैर, जाने दो . ये घटना कहाँ हुई ?

सर, मैं इतना डर गया था, की उनके उतरने के बाद आधी घंटा मैं गाडी भगा कर यहाँ आया हूँ . मुझे लगता है कम से कम २० - २५ किलोमीटर के पहले !

सब इन्स्पेक्टर ने जोर से रजिस्टर बंद किया और बोला - साले , भाग यहाँ से ! यहाँ क्या लेने आया है ?

सर, तो मैं क्या करूँ ?

गंगा जी में छलांग लगा दो .

हवलदार जोर जोर से हंसा - सर आपका वो क्या कहते हैं न - हूमर ऑफ़ सेन्स बहुत बढ़िया है .

सब इन्स्पेक्टर - सेन्स ऑफ़ हूमर !

चंद्रू गिडगिडाया - साहब , मेरी मदद करो , मैं गरीब आदमी कहाँ जाऊं ?

सब इन्स्पेक्टर - साल तुम लोगों का प्रोब्लम ये है की तुम लोगों को कोई कानून कायदा मालूम नहीं ; और लेकर निकल पड़ते हो लाखों करोड़ों का माल . अगर तुम्हारा माल चोरी हुआ बीस पच्चीस किलोमीटर पहले तो तुम्हे जाना पड़ेगा चांदपुर पुलिस स्टेसन , क्योंकि हमारे पुलिस स्टेसन की हद तो पिछले दस किलोमीटर से शुरू होती है . अब यहाँ से चलते नजर आओ !

निराश चंद्रू  ने फिर अपने मालिक को फोन किया और फिर वही मोटी  मोटी  गालियों का सन्देश . थका  मांदा , भूखा प्यासा , डरा सहमा , अपमानित चंद्रू वापस गाडी को लेकर पहुंचा चांदपुर पुलिस स्टेसन में . वहां फिर उसका वैसा ही स्वागत हुआ . एक अंतर था - वहां के सब इन्स्पेक्टर ने उसकी कहानी सुनने के पहले २ -४ थप्पड़ रसीद कर दिए . चंद्रू कुछ समझ नहीं पाया .

सब इन्स्पेक्टर बोला - तुम लोग सब साले मिले हुए हो . तुम तुम्हारा ट्रांसपोर्ट और वो दवा  वाला . सबको झूठा ऍफ़ आई आर चाहिए , क्योंकि सेठ लोग को इन्सुरेंस से पैसा मिल जाएगा . तुमको बक्शीश मिल जायेगी , और तुम्हारा ये ऍफ़ आई आर पड़ा रहेगा हमारे गले  में - हमारा रेकोर्ड बिगाड़ने  को ! फोन कर के सेठ से बात कर लो की ऍफ़ आई आर चाहिए तो ५ पेटी लगेगा .

चंद्रू की आँखें फटी की फटी रह गयी . बोला - साहब मैं किस मुंह से इतना पैसा के लिए बोलूं सेठ को ; उसका तो पहले ही कितना नुक्सान हो गया है .

सब इन्स्पेक्टर -सुन बे , सेठ के पैसों की इतनी फ़िक्र है तुझे तो वहीँ जा, यहाँ हमारा टेम  ख़राब न कर !

चंद्रू - साब ! मेरी एक बात मानेंगे ? मैं फोन लगा के देता हूँ , आप ही सेठ से बात कर लो !
चंद्रू अपने मोबाईल फोन से सेठजी का नंबर लगाता  है और बोलता है - सर, चांदपुर पुलिस टेसन से बोल रहा हूँ . यहाँ के बड़े साब आपसे बात करना चाहते हैं .

ये कह कर चंद्रू ने अपना मोबाईल फोन सब इन्स्पेक्टर के हाथ में दे दिया . सब इन्स्पेक्टर ने कहा - देखिये सेठजी , इस तरह के झूठे कम्प्लेन  हमारे पास रोज आते हैं . ये ट्रक ड्राइवर लोग खुद ही माल बेच खाते हैं और फिर चले आते हैं यहाँ शिकायत लिखाने ! बताएं हम क्या करें ?

थोड़ी देर बाद जब बात ख़तम हो जाती है तो सब इन्स्पेक्टर कहता है - हाँ भैया , अब बताओ क्या करें ?

चंद्रू ने डरते डरते पुछा - क्या कहा सेठजी ने ?

सब इन्स्पेक्टर ने कहा - तुम्हारे सेठ ने बोला  की अगर ड्राइवर पर डाउट हो तो साले के मार मार के खाल उधेड़ दो , लेकिन एक ऍफ़ आई आर लिख कर दे दो .

चंद्रू सहम गया . बोला - साहब , आपको मेरे ऊपर डाउट है ?

सब इन्स्पेक्टर थोडा नरम पड़ा - भई , बात ये है - सब को अपनी पड़ी है . जैसे तुम्हारे सेठजी के अपने ऍफ़ आई आर के सामने तुम्हारी कोई कीमत नहीं , तुम्हे अपनी नौकरी के लिए ऍफ़ आई आर चाहिए , वैसे ही हम लोगों को भी अपने प्रोमोसन के लिए हमारा रेकोर्ड क्लीन चाहिए . रही बात लुटेरों की ; तो वो तो ये काम रोज करते हैं . हम सब को जानते भी हैं , लेकिन उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकते . लूट का आधा  हिस्सा इस एरिया के एम पी का है .एम पी की भी मजबूरी है , ये इलाका इतना गरीब है , की चुनाव लड़ने का चंदा  कहाँ से आये !

चंद्रू रोते रोते बोला - साब मैं क्या करूँ ? कहाँ जाऊं ?

सब इन्स्पेक्टर ने कहा - इस फालतू नौकरी को छोड़ो , अपने गाँव जाओ , फॅमिली के साथ रहो . चाहे मेहनत  मजदूरी कर  लो . ऐसे सेठ की नौकरी करके क्या फायदा !

चंद्रू को इन्स्पेक्टर की बात समझ में आ गयी . उसने उसी समय निर्णय ले लिया की उस क्षण के बाद वो कभी किसी ट्रक को नहीं चलाएगा , और न ही उसका बेटा  या पोता  ये काम करेगा .

[ ये संकेतिक कथा है हाइवे पर ट्रक चलने वाले ट्रक ड्राइवरों के जीवन की दुर्दशा के बारे में . उनका जीवन खतरों से भरा होता है . परिवार से दूर बुरे से बुरे मौसम में वो अपने ट्रक से जूझता है . सन्मान या आत्म सन्मान नाम की चीज उसके जीवन में नहीं . इसका परिणाम ये है की आज देश में हर १० ट्रकों के पीछे सिर्फ ८ ड्राइवर उपलब्ध हैं . ये संख्या निरंतर घट रही है . ड्राइवरों की अगली पीढ़ी कभी भी इस पेशे में नहीं आएगी .]