नील स्वर्ग

नील स्वर्ग
प्रकृति हर रंग में खूबसूरत होती है , हरी, पीली , लाल या फिर नीली

Tuesday, June 28, 2016

सिंगापुर : कुछ नए अनुभव



ये मेरी तीसरी यात्रा है सिंगापुर की। हर यात्रा में यहाँ के जीवन की विशेषताएं सीख कर जाता हूँ।  छोटी छोटी बातें जो यहाँ के जीवन को कितना सुरक्षित , सुखद और आरामदायक बन देती है।

मेरी बेटी यहाँ अकेली रहती है ; उसे डेढ़ साल पहले एक अच्छी मल्टी नेशनल कंपनी में यहाँ काम मिल गया।  इसके पहले भी उसे लन्दन तथा शंघाई शहरों से जॉब के ऑफर मिले थे।  मैंने मना कर दिया था।  एक अकेली बिटिया को किसी अनजाने देश में अकेले रहने की अनुमति कैसे दे देते।  लेकिन बात जब सिंगापुर की आई , तो मुझे हाँ कहना ही पड़ा। सिंगापूर में किसी अकेली लड़की के लिए रहना, भारत में कहीं भी रहने से ज्यादा सुरक्षित है। यहाँ के अखबार में कभी कोई अपराध की खबर नहीं आती , क्योंकि ये देश जीरो क्राइम देश है। 

उसके यहाँ रहने के बाद पहली बार उसके पास आया। वो एक बहु मंजिली ईमारत में पांचवे माले पर रहती है।  जब हम उसके साथ उसकी लिफ्ट में चढ़े , उसने अपना कार्ड एक रीडर के सामने घुमाया तो उसमे पांचवे माले का नंबर रोशन हो गया। लिफ्ट सीढ़ी पांचवे माले पर रुकी। उसकी लिफ्ट के सामने मात्र उसका फ्लैट है। यानि की कोई भी व्यक्ति उस ईमारत के पांचवे माले पर तब तक नहीं आ सकता जब तक उसके पास उस माले ले लिए बन हुआ कार्ड न हो। किसी दूसरी मंजिल वाला व्यक्ति सिर्फ अपने नियत माले तक ही जा सकता है , किसी अन्य माले पर नहीं।

टैक्सी ३-४ मिनट के अंदर आपके मकान पर हाजिर हो जाती है।  यहाँ भी उबेर और उसके जैसी अन्य सेवाएं उपलब्ध हैं। टैक्सी वाले को आप बिल्डिंग का नाम या नंबर बता देते हैं तो वो आपको सीधा पहुंचा देता है। एक मजेदार बात ये है , की जैसे हमारे देश में हर मोहल्ले का एक पिन कोड होता है , वैसे यहाँ हर बिल्डिंग का ज़िप कोड होता है। कितना आसान हो जाता है पता। मात्र ६ संख्याओं का एक कोड !

एक और दिलचस्प बात ! जब हम किसी सड़क पर जाते हैं तो उस पर इलेक्ट्रॉनिक बोर्ड लगे होते हैं जिस पर हर बड़ी बिल्डिंग खास कर मॉल आदि वाली बिल्डिंगों के अंदर की पार्किंग के लिए उपलब्ध जगह की संख्या होती है।  यानि की अगर कैथे मॉल के सामने ७ लिखा है तो उसका अर्थ है की उसके अंदर ७ गाड़ियां पार्क करने की जगह बची है। इस सुचना के आधार पर लोग ये फैसला कर पाते हैं की उन्हें गाडी कहाँ पार्क करनी है।

सिंगापुर में आम तौर पर कोई पुलिस वाला नजर नहीं आता।  इसका कारन है की , यहाँ के सामान्य नागरिकों में बहुत से लोगों को पुलिस के सारे अधिकार होतें हैं। आपकी टैक्सी का ड्राइवर , होटल का वेटर , या एक छोटा सा दुकानदार भी पूरे पावर के साथ पुलिस वाला  हो सकता है। अगर कोई कहीं भी किसी प्रकार का अपराध करता है , उसे पकड़ने वाला कोई न कोई पुलिस अफसर भी कहीं आस पास जरूर होगा।

सचमुच एक अद्भुत शहर है सिंगापुर !

Monday, April 4, 2016

मीडिया क्या कर रहा है ?

देश बड़े नए किस्म के ज्वलंत प्रश्नों से जूझ रहा है -

१. नेताजी सुभाष की मौत कैसे हुयी ? कब हुयी ?

२. शनि मंदिर में महिलाएं क्यों न जाएँ ?

३. भारत माता की जय क्यों बोलें ?

४. भाजपा को देशभक्ति करने का क्या अधिकार है ?

५. जम्मू कश्मीर में भारतीय सेना बलात्कार क्यों करती है ?

६. मौलाओं के पास हर प्रश्न के उत्तर में फतवा क्यों होता है ?

७. मुस्लिम महिलाओं का तीन तलाक का विरोध क्यों जायज नहीं है ?

८. आर एस एस - हर मुद्दे पर अपनी राय क्यूँ देती है ?

९. राहुल गांधी हर दुर्घटना पर क्यों अवतरित हो जाते हैं ?

१०. हर सेलिब्रिटी की मृत्यु , हत्या और ख़ुदकुशी - हफ्ते भर की सुर्खियां क्यों खा जाती है ?

११. भारत ने वर्ल्ड कप क्यों नहीं जीता।

१२. भुजबल का क्या होगा ?

१३. कोलकाता में फ्लाई ओवर पल गिरने से राजनैतिक लाभ या हानि किस पार्टी की होगी ?

ये सारे प्रश्न पिछले २ हफ़्तों में प्रतिदिन टेलीविजन का ९५ % समय खा चुके हैं। बच्चे हुए ५ % समय में ये मुद्दे उठते हैं -

१. ये किसान पूरे देश में क्यों आत्महत्या करते हैं ?

२. चीन ने आतंकवाद में मामले में पाकिस्तान का साथ क्यों दिया ?

३. विदेश मंत्रालय के प्रयासों से ४ भारतीय नागरिक सीरिया की जेल से छूट कर भारत कैसे आये।

४. पठानकोट आतंकी हमले की जांच कर रहे , एनआईए के एक अफसर की हत्या क्यों हुयी ?

५. आसाम और पश्चिम बंगाल में विधान सभा के चुनाव शुरू।


फैसला कीजिये , मीडिया क्या कर रहा है ?

Sunday, April 3, 2016

पुल और पार्टियां



पुल टूटने से पहले -

भले ही इस पुल की नींव पिछली सरकार ने रखी थी , लेकिन पूरा किसने किया ? हमने !!!

पुल टूटने के बाद -

इस पुल का ठेका पिछली सरकार ने दिया था , आज अगर ये गिर गया तो कौन जिम्मेवार होगा ? हम ???


Tuesday, March 8, 2016

कन्हैया और अनुपम

 कन्हैया और अनुपम ! व्यंजन और स्वर - दोनों प्रकार के अक्षरों का  प्रथम अक्षर - क और अ ! किसी शब्द के पहले क या क की कोई मात्रा  दीजिये , तो बन  जाता है एक अपशब्द - जैसे कुरूप , कुशासन , कुदृष्टि और क की जगह अ लगा दें तो बन जाता है अति सुन्दर जैसे की - अद्वितीय , अप्रतिम, अनुपम ! खैर ये तो थी एक अलंकारात्मक तुलना ; लेकिन दोनों की तुलना भी कुछ इसी प्रकार की बैठती है।

कन्हैया बिहार के  गाँव से आकर जेएनयु में पढ़ने के लिए दाखिला लेता है , लेकिन कैंपस की राजनीति में हिस्सा लेकर बन जाता है छात्र नेता। देश की खैरात के ऊपर चलने वाले जे ऍन यु में देश को ही गालियां देने वाले लोगों सरगना बन जाता है।

अनुपम उन कश्मीरी पंडितों का प्रतिनिधि है , जिन्हे कश्मीर से रातों रात विस्थापित कर दिया गया था। अनुपम ने अपने जीवन में संघर्ष किया और अपने लिए एक स्थान बनाया भारत के चलचित्र जगत में।

कन्हैया अंग बन जाता है उस सोच  का जो देश को बर्बाद कर देना चाहती है। वो गुट  जो अफजल गुरु और मकबूल बट्ट जैसे देश द्रोहियों को अपना आदर्श मानता है। अफजल गुरु की शहादत को मनाने के लिए वाईस चांसलर पर दबाव डालता है। देशद्रोहियों के साथ मिल कर नारे लगाता है -' भारत की बर्बादी तक जंग चलेगी ', 'अफजल हम शर्मिंदा है , तेरे कातिल जिन्दा है '. इतना ही नहीं इस देश से आजादी के नारे लगाता  है। ये अलग बात है , की जब पुलिस द्वारा पकड़ लिया जाता है तो बहाने बाजी करता है।  अपने कहे हुए नारों को नकारता है। नए फर्जी नारे बनाये जाते हैं।  आजादी - गरीबी से , आजादी - बेरोजगारी से। कन्हैया जरा ये बताये की गरीबी से आजादी पाने के लिए अफजल गुरु की शहादत का क्या सम्बन्ध है ?

अनुपम कश्मीर से पंडितों के विस्थापन दिवस को मनाने के लिए एक अपना वक्तव्य जारी करता है।  पूरे देश द्वारा वो सुना जाता है ; कश्मीरी पंडितों की समस्या पर पूरी  चर्चा  होती है। अनुपम का एक नया रूप देश के सामने आता है।

कन्हैया को जेल से निकलने के लिए जमानत बनती है दस हजार रुपैयों और बहुत सारी  शर्तों पर जो किसी सामान्य अपराधी पर लागू होती है ; लेकिन कन्हैया को हीरो बनाने वाले, इसे कन्हैया की विजय मान  लेते हैं। कन्हैया जेल से निकल कर फिर एक बार जे एन यू में भाषण देता है। एक निरर्थक भाषण - जिसमे मोदी को  कोसने के अलावा कुछ नहीं था।  गरीबी के लिए जिम्मेवार पार्टियां - कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी कन्हैया को अपना हीरो बना लेते हैं। बिकी हुयी मिडिया कन्हैया को बुला कर उसका लम्बा लम्बा इंटरव्यू  लेती है ; जिसे कन्हैया अपनी नयी नयी बनी पहचान का इनाम समझ कर चटखारे लेता है। मतलब  साफ़ है - कन्हैया ने राजनीति में घुसने का  रास्ता बना लिया है।

कुछ दिनों पहले टेलीग्राफ अखबार ने देश में बढ़ती हुयी तथाकथित असहिषुण्ता पर एक चर्चा का कार्यक्रम रखा।  जस्टिस गांगुली और कांग्रेस के सुरजेवाला ने जी भर कर असहिष्णुता के गीत गाये , मोदी सरकार को कोसा।  लेकिन जब अनुपम ने उनकी बातों का स्पष्ट और सीधा उत्तर देना शुरू किया तो सबके तोते उड़ गए। ७-८ मिनट के अपने बेबाक और निर्भीक भाषण से  अनुपम देश की   सोच पर छा  गया।

आज कन्हैया और अनुपम दोनों ही शायद एक राजनैतिक जीवन के दो विपरीत छोरों से अपनी शुरुवात कर  रहे हैं,  लेकिन दोनों के स्तर में वही अंतर है जो राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी में है।






Friday, January 1, 2016

Shortest Story

एक अति लघु कथा

मैंने एक अनजान व्यक्ति से कहा - नया साल मुबारक हो !

उसने उत्तर दिया - क्यों ?

मैं निरुत्तर हो गया।


Wednesday, July 15, 2015

असली सेक्युलर ! - एक लघु कथा



बड़ा विचित्र किस्म का भिखारी था वो। सुबह सुबह उठ कर गले में एक रुद्राक्ष की माला डाल  कर शिव मंदिर के सामने बैठ जाता था। आते जाते लोग उसकी चटाई पर कुछ छुट्टे कुछ रुपैये डाल देते  थे। दोपहर में  गुरूद्वारे के पास  बैठ जाता था ,  सिखों वाली पगड़ी पहन कर।  लोग काफी  पैसे दे जाते थे।  कई बार  वहीँ लंगर में खाना खा लेता था।  शाम को इबादत की  सफ़ेद जाली की टोपी पहन किसी मस्जिद बाहर बैठ जाता था , वहां  भी अच्छी कमाई हो जाती थी। रमजान के दिनों में बिना रोजा रखे शाम के खाने का जुगाड़ हो जाता था। रविवार के दिन  चर्च  के बाहर ईसाई क्रॉस की माला काम आती थी। सबसे बड़ी मौज तो ये थी की उसके दान दाता उसके सभी ठिकानों में से सिर्फ  एक पर जाते थे , इसलिए किसी को उसके मजहब पर कोई शक नहीं होता था। 

एक दिन उसके एक प्रोफ़ेसर  पडोसी ने उससे पुछा - तुम ये अलग अलग भेष बना कर लोगों को और उनके भगवान को ठगते हो ; तुम्हे ऐसा नहीं लगता की भगवान किसी दिन तुमसे बहुत नाराज हो जाएंगे ?

उसने हँसते हुए उत्तर दिया - मैं कहाँ ठगता हूँ ? ठगते तो वो लोग हैं जिन्होंने  भगवान की   अपनी  मनचाही कल्पना से सूरत बना दी ; अपने आपको भक्त दिखाने  के लिए अजीब अजीब वस्तुएं बना ली - जैसे की रुद्राक्ष , इबादत की टोपी और क्रॉस की माला। यहाँ तक की सभी जगह व्यापक निराकार भगवान के रहने के भी घर बना दिए - जैसे की मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे और चर्च।  क्या भगवान  यही सब देखते हैं ? ये सारा दिखावा अपने आप के लिए ही तो होता है। मैं भी वही करता हूँ जो उनको अच्छा लगता है। मेरा गुजारा हो जाता है ; उनकी दान दक्षिणा पूरी हो जाती है। फर्क इतना है की वो दूसरे  धर्मों के लिए बुरा भला कहते हैं , मैं सबका सन्मान करता हूँ, सबको आशीर्वाद और दुवाएँ देता हूँ । अब बताइये की भगवान किससे ज्यादा खुश होंगे , उनसे ये मुझसे !

प्रोफ़ेसर साहब निरुत्तर थे। 




Sunday, June 28, 2015

ललित मोदी का बवंडर



कमाल का देश है हमारा ! नरेंद्र मोदी के निरंतर चल रहे एक के बाद एक देश के उत्थान के कार्यक्रम न मिडिया को दिखते  हैं न विपक्ष को ; लेकिन एक बेमतलब के बेकार से गुजरे हुए इतिहास ललित मोदी की एक एक ट्वीट हेडलाइन बन रहा है।

वो कांग्रेस जो भ्रष्टाचार के कारनामों के नीचे दब कर मर चुकी है ; आज बेमतलब के आरोप लगाते  नहीं थकती।  देश के प्रधानमंत्री के लिए अभद्र शब्दों का प्रयोग करना उन्होंने दिनचर्या बना लिया है।  खीज उठती है जब प्रगति के हर काम में वो रोड़ा अटका रहें हैं।  देश के जीवन के मूल्यवान साठ साल उनके परिवारवाद की भेंट चढ़ गए।  हम दुनिया की रफ़्तार के सामने निरंतर पिछड़ते चले गए। अब जब एक नया प्रशासन देश को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील है , तब उनके पास एक ही काम बचा है - वर्तमान सरकार को नीचा  दिखाने  के लिए ऊल -जुलूल बाते करना।

ललित मोदी प्रकरण को ही लेवें।  पूरी दुनिया में क्रिकेट खेलने वाले देश जानते है , कि  कैसे ललित मोदी ने क्रिकेट के खेल को एक पैसा छापने वाली मशीन 'आई पी एल' के नाम से बनायीं। ललित मोदी इसके कमिश्नर के रूप में देश के हीरो बन गए। इनके साथ सहयोग कर रहा  था , कांग्रेस सरकार का पूरा तंत्र। बहुत से मंत्रियों ने इसका आर्थिक लाभ उठाया। शशि थरूर अगर ज्यादा पैसे बनाने के चक्कर में अपनी एक अलग टीम नहीं बनाते , तो शायद कहानियां नहीं खुलती।

शायद ललित मोदी ने किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति को नाराज कर दिया , जिसके कारण  वो अपनी अति शक्तिशाली अवस्था से हटा दिए गए।  उसके बाद शुरू हो गया उनके खिलाफ आरोपों का सिलसिला।  धीरे धीरे सब पल्ला झाड़ने लगे। ललित देश छोड़ कर लन्दन जा बैठे। वो सारे नेता जिनके ललित से सम्बन्ध थे , देश में उसका विरोध करते लेकिन लन्दन में उनसे मिलकर सहानुभूति करते थे।

अब लीजिये सुषमा स्वराज और वसुन्धरा राजे का प्रकरण।  सुषमा ने कहा की ललित को वो जानती थी और वो उनकी पत्नी की बीमारी के समय ललित की इतनी मदद कर रही थी की वो पुर्तगाल जाकर अपने पत्नी से मिल सके। वसुंधरा राजस्थान से हैं और उनकी पारिवारिक मित्रता मोदी परिवार से रही है ; उस मित्रता के निमित उन्होंने उस समय ललित की मदद करने के लिए सिफारिश की जब वो राजस्थान  की मुख्यमंत्री नहीं थी। दोनों देवियों ने सच्चाई देश के सामने रख दी। लेकिन कांग्रेस को इनका इस्तीफा चाहिए क्योंकि उन्होंने बकौल कांग्रेस एक अपराधी की मदद की है। पहली बात तो ये की क्या ये मदद अपराध की श्रेणी में आती है ? और अगर आती भी है तो क्या इसका दंड पदत्याग है।

अब जरा कांग्रेस अपनी मदद का इतिहास देखे -
१. मायावती पर बहुत आरोप थे आर्थिक और राजनैतिक भ्रष्टाचार के , क्या कांग्रेस ने उनके साथ सौदेबाजी कर के उनकी मदद नहीं की।
२. मुलायम सिंह के खिलाफ बहुत कुछ था , क्या वही सौदेबाजी उनके साथ नहीं हुई।
३. चारा घोटाले के सबसे बड़े अपराधी लालू यादव को तो कांग्रेस ने गोद  ही ले रखा है।
५ . कांग्रेस के तो बहुतेरे मंत्री ही दागदार हैं , उनका क्या ?

ये सारे उदहारण तो सौदे बाजी के हैं लेकिन क्या सोनिया गांधी ने अपने पति की हत्यारिन के लिए सिफारिश कर उनकी फांसी को आजीवन कारावास में नहीं बदलवाया ? उनका तर्क  भी यही था की मानवता के नाते उन्होंने उसकी मदद की। क्या मानवता के लिए इतने जघन्य अपराध के अपराधी की मदद तो उनकी महानता  है , लेकिन उसी मानवता के लिए अगर सुषमा या वसुंधरा ने किसी सामान्य आर्थिक अभियोगी की मदद बिना किसी व्यक्तिगत लाभ इ लिए कर दी तो अपराध हो गया ?

गलती और अपराध  में एक महीन दूरी  है। सुषमा और वसुंधरा के कृत्य उनके  राजनैतिक कद को देखते हुए गलती तो कहला सकती है लेकिन कोई अपराध नहीं। उनकी ये गलती उतनी ही बड़ी गलती है जितनी दिग्विजय सिंह का अंतरराष्ट्रीय अपराधी ओसामा को ओसामाजी कहना। ऐसी गलतियों की सजा उनकी जग हंसाई तो हो सकती है लेकिन इसके अतिरिक्त और कोई दंड नहीं।

कुछ टीवी चैनेल तो आजकल चिता पर भी रोटियां सेकने का प्रयास करते हैं। उनका उद्देश्य है उनका व्यक्तिगत लाभ यानी टी आर पी ! उन्हें उनका लाभ तो जरूर मिल रहा है लेकिन वो लोग देश का बहुत बड़ा नुक्सान कर रहें हैं। पत्रकारिता के चोले में एक डिक्टेटर जैसा रूप अपना कर बैठे हैं ऐसे लोग। समय ही ऐसे लोगों का हिसाब किताब करेगा।