नील स्वर्ग

नील स्वर्ग
प्रकृति हर रंग में खूबसूरत होती है , हरी, पीली , लाल या फिर नीली

Thursday, May 24, 2012

पेट्रोल की पोल


 कल रात से सरकार ने अचानक पेट्रोल के दामों में  साढ़े  सात रुपैये प्रति लीटर की भडोतरी कर दी . ये करीब करीब १० प्रतिशत होता है . इतने गंभीर कदम से पूरे देश में हाहाकार  मचा हुआ है . सरकार सफाई देने की नाकाम कोशिशों में लगी है . सरकारी प्रवक्ता टेलीविजन चैनलों पर घडियाली आंसू बहा रहें हैं . कुछ ऐसा दिखावा कर रहें हैं की उनके पास ऐसा दुखद कदम लेने के सिवा कोई चारा नहीं था . सफाई के नाम से जो कुछ परोसा जा रहा है उसमे मुख्य कारण ये बताये जा रहे हैं - तेल कंपनियों  का नुक्सान , रुपैये के मूल्य में आई गिरावट , गरीबों की मदद के लिए अमीरों पर टैक्स ! आइये जरा देखें की सच्चाई क्या है .

आज के समय में भारत अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चा  माल या क्रूड खरीद रहा है करीब सौ डॉलर प्रति बैरल में  . आज के डॉलर के ५६ रुपैये के भाव के हिसाब से एक बैरल का मूल्य होता है ५६०० रुपैये . अगस्त २००८ में भारत ये बैरल खरीद रहा था ५९०० रुपैये में . कारण ये है की उस समय क्रूड का भाव ज्यादा था भले ही रुपैये का मूल्य मजबूत था . आइये आगे बढ़ें - एक बैरल क्रूड का अर्थ है करीब १५० लीटर तैयार पेट्रोल . क्रूड का  आयात कर के उसके पेट्रोल बनाने तक का खर्च होता है करीब १२ डॉलर यानि की ६७२ रुपैये . इसमें सारे खर्च शामिल हैं जैसे की - क्रूड और तैयार माल का ट्रांसपोर्ट , रिफाइनिंग खर्च , तेल कम्पनी का मुनाफा ( करीब १० प्रतिशत) डीलर का कमीशन वगैरह ! अब जरा गणित लगायें की १५० लीटर तैयार माल की कीमत हुई ५६०० रुपैये और ६७२ रुपैये  मिलकर ६२७२ रुपैये ; यानि की अगर किसी किस्म का टैक्स न लगे तो ये दाम उपभोक्ता के हाथों में होगा ४२ रुपैये !और देश में आज तेल बिक रहा है ७७ से लेकर ८१ रुपैये में . ये ४५ - ४९ रुपैये का बोझ अलग अलग टैक्सों का है जैसे की - बेसिक एक्ससाइज ड्यूटी , एडिसनल ड्यूटी . स्पेसल एडिशनल ड्यूटी , सेस , एडिसनल सेस और इन सब  के ऊपर  राज्य सरकारों द्वारा लादा गया मनमाना सेल्स टैक्स .  जब पूरे देश में वैट लागू करने की बात हो रही थी तब बहुत सी राज्य सरकारें इस शर्त पर तैयार हुई थी की पेट्रोल और डीजल वैट के दायरे में नहीं रखा जाएगा . पेट्रोल आदि  राज्य और केंद्र सरकार की दुधारू गायें हैं . इसलिए सरकार का घडियाली आंसू बहाना बेमानी है .

ये तो था पेट्रोल की कीमत पर एक दृष्टिपात ; अब जरा सरकार का दूसरा बहाना भी सुने - तेल कम्पनियों के घाटे की दुहाई ! बात सीधी  है , तेल कम्नियों की रिफाइनिंग की कीमत  कुछ बेहिसाब बढ़ नहीं गयी है, लेकिन उनका बेचने का दाम तो सरकार तय करती है . सरकार बड़ी चालाकी से अपने टैक्सों का पिटारा तो कम करने के लिए खोलती नहीं , कीमतों को कम रखने के लिए विक्रय मूल्य घटा देती है . डीजल या किरोसिन की सब्सिडी भी इसका हिस्सा है .  इसके घातक  परिणाम जो भविष्य पर पड़  रहें हैं वो भी चौंका देने वाले हैं . ऐसी अवस्था में सभी पी एस यु नें नए  रिफाइनिंग प्रकल्पों में पैसा लगाना बंद कर दिया है , या कम कर दिया है . निरंतर घाटे की बात सुन सुन कर कौन करेगा ऐसा निवेश ? नए स्त्रोतों की खोज का काम ठप्प पड़ जाएगा . जिन निवेशकों ने इन कम्पनियों में पैसा लगाया था , वो अपने पैसों की सलामती लिए बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ रहें  हैं . और आम जनता में जिन्होंने इन कम्पनियों के शेयर ले रहें हैं उन्हें इनसे किसी किस्म का डिविडेंड मिलने की आशा नहीं है .

सरकार का अगला बहाना - रुपैये की कीमत में गिरावट ! सही है की पिछले दिनों में रुपैया डॉलर के सामने ५१ रुपैये से बढ़ कर ५६ रुपैये हो गया , यानि की १० प्रतिशत का अंतर ; लेकिन सरकार ये क्यों नहीं बता रही की क्रूड की कीमत भी १२० डॉलर ( प्रति बैरल )  से घट  कर १०० डॉलर हो चुकी है - सीधा सीधा २० प्रतिशत का फायदा ! और रुपैये की गिरावट रोकने के साधन तो रिजर्व बैंक अपनाती ही है ; शायद अभी भी अपनाएगी . सरकार का ये बहाना भी लचर है .

सरकार कहती है की पैसे वालों की सब्सिडी बंद करने का रास्ता चुना है उसने ! कैसी सब्सिडी ? ऊपर दिए आंकड़े बताते हैं की पेट्रोल के वास्तविक मूल्य पर केंद्र और राज्य सरकार ८३ % का टैक्स लादे बैठी हैं - सब्सिडी कौन किसको दे रहा है ? रहा सवाल आमिर गरीब का तो सर्कार की परिभाषाओं का कोई मतलब नहीं . अगर दो पहिया चलने वाले लोग अमीर हैं तो फिर इस सर्कार से क्या उम्मीद की जाए . गोवा की सरकार ने पिछले मार्च में अपने सेल्स टैक्स में से ११ रुपैये की कटौती की - इस उदहारण से ये बात स्पष्ट हो जाती है की कीमतों को कम किया जा सकता था . सरकार चलाना सरकार का काम है , लेकिन अपनी गलत नीतियों से जनता की कमर तोड़ कर सरकार कितने दिन चलने वाली है ?




Tuesday, May 22, 2012

भारत का महाभारत




लोकपाल एक ऐसे फुटबाल मैच का रूप ले चूका है जो कभी ख़त्म ही नहीं होता .लोकपाल बिल उस गेंद की तरह से है जिसे एक तरफ सर्कार ठोकर मारती है तो दूसरी तरफ विपक्ष . मजे की बात ये है की इन दोनों के खेल में गोल होता है हमेशा जनता के ऊपर !

लोकसभा का एक सत्र और निकल गया - लोकपाल पर बकवास के एक और दिन के पश्चात . इस बार भी सर्कार ने चुने  अंतिम दिन इस विषय पर बहस के लिए . सर्कार जानती है की अंत के एक दो दिन इस विषय को टालने के लिए ज्यादा आसान हैं . बिल पास हो या न हो , अगली तारीख तो मिल जाती है सर्कार को. और इस तरह ये यु पी ऐ सर्कार अपना कार्यकाल पूरा करना चाहती  है .
ये ड्रामा पहले हुआ था २९ दिसंबर को जब लोकसभा द्वारा पारित किया हुआ लोकपाल बिल फंस गया राज्यसभा की मझदार में . सर्कार के पास पूरा समर्थन नहीं था अपने द्वारा पेश किये हुए लोकपाल बिल को पास करवाने का . अच्छा ही था , नहीं तो एक लचर सा बिल जनता के मुंह में ठूंस दिया जाता , जो किसी काम का नहीं था . राज्यसभा में इस बिल में सुधार प्रस्तावों का अम्बार लग गया ; जिसमे कुछ प्रस्ताव तो सही मुद्दों पर आधारित थे और बाकी स्थिति को जटिल रूप देने के लिए लाये गए थे . सर्कार ने उस दिन छुट्टी ली ये कह कर की अगले सत्र में इस बिल को पूरे सुधारों के साथ पास किया जाएगा .
वो अगला सत्र भी आ गया . पूरा सत्र निकल गया . कल जब सत्र का अंतिम दिन से पहले वाला दिन था तो सर्कार ने निकाला अपना लोकपाल बिल - बिल में से ! मजे की बात ये थी की इस बार के बिल में लोकसभा में पास किया गए बिल की कई बातें नदारद थी . लोकायुक्त के मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस ने , जो की यु पी ऐ का ही एक घटक दल है , अपना मत सर्कार के विरोध में दिया था , इसलिए इस मुद्दे को ही निकाल दिया सर्कार ने . पारलियामेंत्री  अफयेर्स के राज्य स्तर के मंत्री वी नारायणस्वामी ने बिल को पेश करने की औपचारिकता की . इस बार तो हद हो गयी ; लोकसभा के पास इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर बात करने का  भी मन और समय नहीं था . समाजवादी दल के नेता नरेश अग्रवाल ने एक नया तुर्रा छोड़ दिया एक नया मोशन ला कर के - ' इस बिल को चुनिन्दा समिति ( सेलेक्ट कमिटी ) के पास भेज दिया जाए ; और समिति अपनी रिपोर्ट तीन महीने में पेश करे .'
समाजवादी पार्टी ने तो ऐसे प्रस्ताव रख दिया मानो वो ही सर्कार हो . दरअसल इस विषय पर वो सर्कार नहीं तो सर्कार का मोहरा जरूर थी . चोर चोर मौसेरे  भाई !भारतीय जनता पार्टी ने इसका पुरजोर विरोध किया . अंततः बिल को फिर वापस बिल में डाल दिया गया तीन महीनों के लिए . मजे की बात ये है की अगले सत्र यानि मानसून सत्र में भी समिति की रिपोर्ट पेश की जायेगी सत्र के अंतिम सप्ताह के पहले दिन . यानी की जितना खींच सको खींच लो भैया !
इस चुनिन्दा कमिटी में विबिन्न दलों के प्रतिनिधि के रूप में १५ सदस्य है . ये समिति जिन मुद्दों पर निर्णय लेगी उनमे से महत्व पूर्ण हैं - लोकायुक्त लोकपाल के अंतर्गत  हो या नहीं , सरकारी मदद हासिल करने वाले एन जी  ओ लोकपाल के दात्रे में हो या नहीं , लोकपाल की नियुक्ति में सर्कार के हाथ में विशेष अधिकार हो या नहीं , सी बी आई लोकपाल  के अंतर्गत  हो या नहीं , भ्रष्टाचार के मुद्दे किसी विशेष अदालत में सुने जाय या लोकपाल के सामने - इन सारे मुद्दों पर सहमति बनाए का काम करना है इस समिति को . और वो सहमति कभी बननी नहीं ; न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी   और फिर से एक बार हाथ झाड़ कर सर्कार अपनी मजबूरी बता देगी मानसून सत्र के अंतिम सप्ताह में . यानि की एक्सन रिप्ले !
जनता ये फुटबाल मैच झेलती रहेगी और सर्कार और विपक्ष अपना ये खेल खेलते रहेंगे . क्या प्रजातंत्र का अर्थ ये है की जनता बार बार उन्ही  लोगों को चुनके भेजती रहे जो संसद में बैठ कर इस तरह का तमाशा करते हैं . प्रजातंत्र के नाम पर ये धोखे का खेल चल रहा है १९६८ की संसद से . तब से लेकर अब तक ये बिल हर संसद में लाया गया और हटाया गया .
धृतराष्ट्र सा अँधा ये राष्ट्र , गांधारी की तरह अपनी आँखों पर पट्टी बांधे इस देश की जनता - अपने ही पैदा किये इन कौरवों की ये द्युत क्रीडा देखती रहती है , लेकिन टाइम पास की बहस से अधिक कुछ नहीं करती .  अन्ना हजारे जैसे विदुर की आवाज भी नक्कारखाने में तूती की तरह ही है ! ऐसे में भारत अब महाभारत बन चुका है .