नील स्वर्ग

नील स्वर्ग
प्रकृति हर रंग में खूबसूरत होती है , हरी, पीली , लाल या फिर नीली
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Tuesday, August 30, 2011

धन्यवाद फेसबुक

कल दफ्तर में बैठा था , जब पूना से एक मित्र नितिन का फोन आया । नितिन मेरा सहपाठी था इन्जिनेअरिंग कोलेज के दिनों का । १९७५ से १९७९ तक हम साथ पढ़े और होस्टल में रहे । नितिन की तरह और भी कम से कम १५०-२०० सहपाठी थे । मिलना सब से रोज होता था , गहरी मित्रता कुछ लोगों से ही थी । कोलेज छोड़ने के बाद से सारे सम्पर्क टूट गए । सिर्फ ४-५ गहरे मित्रों से ही संपर्क बना रहा । ५-६ महीनों पहले फेसबुक पर एक पुराने सहपाठी ने याद किया । धीरे धीरे हमारा उन दिनों के सहपाठियों का एक ग्रुप बन गया । सब के स्वरुप बदल चुकें हैं । कुछ लोग याद आ रहे थे , कुछ को नाम से याद कर पाना भी मुश्किल हो रहा था । लेकिन एक कड़ी जुडी ३२ साल पुराने मित्रों से ।

कल जब नितिन का फोन आया तो उसने बताया की हमारा एक और सहपाठी प्रताप गुहा अपनी पत्नी के साथ रांची से पूना जा रहा था ; रांची से विमान से मुंबई पहुंचा , लेकिन मुंबई के हवाई अड्डे पर उतरने के बाद उसकी पत्नी को स्ट्रोक आ गया । स्ट्रोक का अर्थ होता है , मष्तिस्क के अन्दर जोरदार झटका और संभावित रक्त-स्त्राव । इसका परिणाम जानलेवा भी हो सकता है । नितिन ने मुझे प्रताप का नंबर दिया और बताया की हवाई अड्डे के डॉक्टर उसको नानावटी हस्पताल ले जा रहें हैं एक अम्बुलेंस में ।

मैं तुरंत अपने दफ्तर से निकला , और १५ मिनट में पहुँच गया हस्पताल । वहां पहुँच कर कैजुअल्टी में पता किया तो मालूम हुआ की एक महिला थोड़ी ही देर पहले हवाई अड्डे से वहां लायी गयी और उन्हें आई सी यू में भरती किया गया है । फोन कर के प्रताप से संपर्क साधा । प्रताप तुरंत ही मेरे पास पहुंचा । जब मैंने अपना नाम बताया तो मुझसे लिपट गया और रोने लगा । बोला - कभी सोचा नहीं था की जीवन में तुमसे इस तरह मुलाकात होगी । ऐसे समय में किसी भी व्यक्ति के लिए किसी अपने का साथ होना कितना महत्वपूर्ण होता है ये मैंने उस समय जाना ।

मैं दिन भर उस के साथ रहा । सारे दिन की डाक्टरी जांचों के बाद ये तय हो गया की उसकी पत्नी सुपर्णा खतरे से बाहर है । रात भर प्रताप वहीँ रहा । सुबह उससे बात हुई , अभी फिर मिलने जा रहा हूँ ।

इस घटना को यहाँ लिखने का कारण है , फेसबुक जैसी आधुनिक संपर्क की सुविधाओं के लाभ की चर्चा करना । फेसबुक की वजह से आज मैं देश के विबिन्न शहरों में अपने मित्रों के सम्पर्क में हूँ । पता नहीं कब किस शहर में प्रताप की तरह किसी अपने की जरूरत पड़ जाए ।